2 अक्टूबर से देशव्यापी प्रदर्शन का ऐलान, सीजेपी ने ज्ञानेश कुमार से मांगा इस्तीफा; एसआईआर को लेकर 13 करोड़ नाम हटाने का दावा
नई दिल्ली। चुनाव आयोग और विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर चल रहे विवाद के बीच कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की है। पार्टी के संस्थापक अभिजीत दीपके ने कहा कि यदि ज्ञानेश कुमार शनिवार तक इस्तीफा नहीं देते हैं तो 2 अक्टूबर, गांधी जयंती से मुंबई में देशव्यापी प्रदर्शन शुरू किया जाएगा। इसके बाद आंदोलन को देश के अलग-अलग शहरों तक ले जाने की बात कही गई है।
सीजेपी ने चुनाव आयोग के खिलाफ ‘इलेक्शन कमीशन ठीक करो’ अभियान भी शुरू किया है। पार्टी का दावा है कि एसआईआर के दौरान 30 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की प्रारंभिक मतदाता सूचियों से 13 करोड़ से अधिक नाम बाहर किए गए हैं। यह आंकड़ा और इससे जुड़े आरोप सीजेपी के दावे हैं, जिनकी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
सीजेपी का कहना है कि ज्ञानेश कुमार के कार्यकाल के दौरान मतदाता सूची और एसआईआर से जुड़े फैसलों ने मतदाताओं के अधिकार को लेकर सवाल खड़े किए हैं। पार्टी ने ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे के अलावा एसआईआर पर तत्काल रोक लगाने और मतदाता सूचियों को जनवरी 2025 की स्थिति में वापस लाने की मांग भी रखी है। साथ ही एसआईआर से जुड़े फैसलों की स्वतंत्र जांच की मांग की गई है
दीपके ने इससे पहले 48 घंटे के भीतर इस्तीफा देने का अल्टीमेटम दिया था। अब उन्होंने कहा है कि इस्तीफा नहीं होने पर 2 अक्टूबर से मुंबई से आंदोलन शुरू होगा और इसे देश के दूसरे शहरों तक ले जाया जाएगा। दिल्ली में अनिश्चितकालीन धरने और ‘जंतर-मंतर 2.0’ जैसे प्रदर्शन की भी घोषणा की गई है।
सीजेपी ने एसआईआर के तहत अलग-अलग राज्यों में मतदाता सूची से बड़ी संख्या में नाम बाहर किए जाने का दावा किया है। पार्टी का कहना है कि इतनी बड़ी संख्या में नाम हटाए जाने की प्रक्रिया कानूनी, पारदर्शी और समीक्षा योग्य होनी चाहिए। हालांकि, नाम हटाए जाने के आंकड़ों और इसके पीछे लगाए गए आरोपों को पार्टी के दावों के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
यह विवाद ऐसे समय सामने आया है जब चुनाव आयोग के भीतर एसआईआर और मतदाता सूची से जुड़े कुछ फैसलों को लेकर मतभेद की रिपोर्ट भी सामने आई है। रिपोर्टों के मुताबिक, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने कुछ फैसलों पर आपत्तियां दर्ज की थीं। चुनाव आयोग की ओर से इन मतभेदों को निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा बताया गया है।
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