मथुरा में अवैध कॉलोनियों और अनधिकृत निर्माण का बढ़ता जाल, कार्रवाई के बावजूद प्रशासनिक निगरानी और जवाबदेही पर बड़े सवाल

Saturday, September 26, 2026 - 23:23
Updated: 4 hours ago
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मथुरा में अवैध कॉलोनियों और अनधिकृत निर्माण का बढ़ता जाल, कार्रवाई के बावजूद प्रशासनिक निगरानी और जवाबदेही पर बड़े सवाल
मथुरा में अवैध कॉलोनियों और अनधिकृत निर्माण का बढ़ता जाल, कार्रवाई के बावजूद प्रशासनिक निगरानी और जवाबदेही पर बड़े सवाल

मथुरा। श्रीकृष्ण की नगरी मथुरा-वृंदावन में तेजी से बढ़ते शहरीकरण के साथ अनधिकृत कॉलोनियों, बिना स्वीकृत मानचित्र के निर्माण, आवासीय भूखंडों पर व्यावसायिक गतिविधियों, होटल और अतिथि गृहों, दुकानों, सार्वजनिक भूमि पर अतिक्रमण, अग्नि सुरक्षा नियमों के उल्लंघन और पर्यावरणीय मानकों की अनदेखी के मामले लगातार सामने आ रहे हैं। उपलब्ध सरकारी अभिलेखों, न्यायालयीन रिकॉर्ड और वर्ष 2025-26 में प्रकाशित समाचारों को एक साथ देखा जाए तो मथुरा की शहरी विकास व्यवस्था की एक जटिल तस्वीर सामने आती है। एक ओर मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण और जिला प्रशासन द्वारा बड़े पैमाने पर ध्वस्तीकरण, सीलिंग, नोटिस और जांच की कार्रवाई की गई है, वहीं दूसरी ओर अदालतों, स्थानीय नागरिकों और विभिन्न शिकायतों के माध्यम से यह सवाल भी उठता रहा है कि जब अनधिकृत निर्माण शुरू होता है तो उसे शुरुआती स्तर पर क्यों नहीं रोका जाता और जिन मामलों में निर्माण लगातार आगे बढ़ता रहता है, उनमें जिम्मेदारी किसकी तय होती है।

मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण के अनुसार लगभग एक वर्ष की अवधि में 63 अनधिकृत कॉलोनियों के खिलाफ ध्वस्तीकरण की कार्रवाई की गई। इन कॉलोनियों का कुल क्षेत्रफल करीब 75 हेक्टेयर बताया गया है। अप्रैल से नवंबर 2025 के बीच 24 अनधिकृत कॉलोनियों पर कार्रवाई की गई, जिनका क्षेत्रफल 33.04 हेक्टेयर था और इनकी अनुमानित भूमि कीमत करीब 164.20 करोड़ रुपये बताई गई। इसके बाद 2026 के पहले सात महीनों में 39 अनधिकृत कॉलोनियों पर कार्रवाई की गई, जिनका क्षेत्रफल 41.99 हेक्टेयर और अनुमानित भूमि कीमत 209.95 करोड़ रुपये बताई गई। दोनों अवधियों को जोड़ने पर लगभग 75.03 हेक्टेयर भूमि, 63 कॉलोनियां और करीब 374.15 करोड़ रुपये की अनुमानित भूमि कीमत सामने आती है। यह आंकड़ा मथुरा जिले में मौजूद सभी अनधिकृत कॉलोनियों का सर्वेक्षण नहीं है, बल्कि विकास प्राधिकरण द्वारा की गई कार्रवाई का आंकड़ा है। फिर भी यह आंकड़ा इस बात का संकेत देता है कि मथुरा-वृंदावन क्षेत्र में अनधिकृत कॉलोनी विकसित करना एक व्यापक शहरी समस्या बन चुका है।

मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण की आधिकारिक वेबसाइट पर स्वीकृत और अस्वीकृत कॉलोनियों की अलग-अलग सूचियां उपलब्ध हैं। इनमें मथुरा के अलग-अलग क्षेत्रों की कई कॉलोनियां अनधिकृत श्रेणी में दर्ज हैं। लाजपत नगर के पीछे स्थित अवधपुरी का नाम भी अनधिकृत कॉलोनियों की सूची में दर्ज है। इसका महत्व इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि किसी भी व्यक्ति के लिए जमीन या भूखंड खरीदने से पहले यह देखना जरूरी है कि संबंधित कॉलोनी का मानचित्र स्वीकृत है या नहीं, भूमि का उपयोग किस श्रेणी में है और निर्माण के लिए संबंधित प्राधिकरण की अनुमति उपलब्ध है या नहीं।

मथुरा में अनधिकृत निर्माण का मामला अब केवल स्थानीय शिकायतों तक सीमित नहीं रहा है। वर्ष 2026 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय तक मामला पहुंचा और न्यायालय ने मथुरा में अनधिकृत निर्माण रोकने की व्यवस्था, प्रशासनिक नीति और अधिकारियों की जवाबदेही से जुड़े सवाल उठाए। एक मामले में अनधिकृत निर्माणों की सूची में शामिल 23 संपत्तियों के संबंध में यह सवाल सामने आया कि क्या सभी समान मामलों में समान कार्रवाई की जा रही है। न्यायालय ने प्राधिकरण से इन संपत्तियों पर की गई कार्रवाई का विस्तृत विवरण मांगा और पिछले वर्षों में दर्ज अनधिकृत निर्माणों तथा उन्हें रोकने की वर्तमान नीति और मानक प्रक्रिया के बारे में भी जानकारी मांगी। न्यायालय में लगाए गए आरोपों को अंतिम निष्कर्ष नहीं माना जा सकता, लेकिन यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि न्यायालय ने प्राधिकरण से कार्रवाई का विस्तृत और तुलनात्मक विवरण मांगा।

इस न्यायालयीन घटनाक्रम ने मथुरा की शहरी व्यवस्था के सामने एक मूल सवाल खड़ा किया है। सवाल केवल यह नहीं है कि कितनी अवैध कॉलोनियां तोड़ी गईं, बल्कि यह भी है कि वे इतनी बड़ी कैसे हो गईं कि वहां सड़क, चारदीवारी, बिजली के खंभे, भूखंडों की नींव और भवन बनने के बाद ध्वस्तीकरण की स्थिति पैदा हुई। किसी निर्माण को पूरा होने के बाद तोड़ना एक कार्रवाई है, लेकिन उसे पहली ईंट रखे जाने के समय रोकना दूसरी और अधिक महत्वपूर्ण प्रशासनिक जिम्मेदारी है।

गोवर्धन मार्ग पर लगभग 35 हजार वर्गमीटर भूमि में विकसित की जा रही कॉलोनी का मामला इसी सवाल को सामने लाता है। प्रकाशित रिपोर्टों के अनुसार वहां बिना स्वीकृत मानचित्र के सड़क, चारदीवारी और बिजली के खंभे लगाए गए और कॉलोनी विकसित करने का काम आगे बढ़ाया गया। इसके बाद वहां 12 कुटीरनुमा भवन, निगरानी मीनार, कार्यालय और मुख्य द्वार सहित कई निर्माण किए जाने की बात सामने आई। मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण ने संबंधित पक्षों के खिलाफ उत्तर प्रदेश नगर योजना एवं विकास अधिनियम के तहत कार्रवाई शुरू की। नोटिस जारी होने के बावजूद निर्माण जारी रहने की बात भी रिपोर्टों में सामने आई। बाद में प्राधिकरण के स्तर पर कार्रवाई करते हुए 12 कुटीरनुमा भवनों, निगरानी मीनार और कार्यालय को सील किया गया। शिकायतकर्ता की ओर से यह आरोप भी लगाया गया कि क्षेत्रीय अभियंता को पहले कई बार शिकायत दी गई थी। यह आरोप स्वतंत्र जांच से सिद्ध नहीं माना जा सकता, लेकिन इससे यह सवाल जरूर उठता है कि शिकायत और वास्तविक प्रवर्तन कार्रवाई के बीच कितना समय लगा।

यमुना खादर और अहिल्यागंज खादर क्षेत्र भी अनधिकृत कॉलोनियों के मामलों में सामने आए हैं। अहिल्यागंज खादर क्षेत्र में करीब 4 हजार वर्गमीटर भूमि पर सड़क और चारदीवारी बनाकर कॉलोनी विकसित करने का मामला सामने आया। इसके अलावा लगभग 10 हजार वर्गमीटर क्षेत्र में विकसित की जा रही दूसरी कॉलोनी के खिलाफ भी कार्रवाई की गई। इन मामलों में नोटिस और आदेश के बाद भी निर्माण जारी रहने पर ध्वस्तीकरण किया गया। स्थानीय स्तर पर यह आरोप भी सामने आया कि यमुना खादर क्षेत्र में लगातार नई अनधिकृत कॉलोनियां विकसित हो रही हैं और शिकायतों के बाद कार्रवाई में समय लगता है। यह स्थानीय आरोप है और इसे प्रशासन द्वारा प्रमाणित तथ्य के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता।

सौंख रोड पर भी बड़े क्षेत्र में विकसित की जा रही कॉलोनियों के खिलाफ कार्रवाई की गई। जून 2026 में अशोक पाइप फैक्टरी के सामने करीब 40 हजार वर्गमीटर क्षेत्र में विकसित की जा रही कॉलोनी पर कार्रवाई की रिपोर्ट सामने आई। प्राधिकरण के अनुसार कॉलोनी को बिना वैधानिक स्वीकृति विकसित किया जा रहा था और पहले ही ध्वस्तीकरण आदेश जारी किया जा चुका था। संबंधित पक्ष की ओर से यह कहा गया कि जमीन पहले ही बेच दी गई थी और कॉलोनी के विकास से उसका संबंध नहीं था। यह पक्ष भी मामले का हिस्सा है और वास्तविक जिम्मेदारी निर्धारित करने के लिए भूमि बिक्री, विकास कार्य और निर्माण से जुड़े अभिलेखों की जांच आवश्यक है। इसी कार्रवाई में सौंख रोड पर सलेमपुर क्षेत्र में लगभग 3 हजार वर्गमीटर भूमि पर सड़क और नाली बनाकर विकसित की जा रही दूसरी कॉलोनी को भी ध्वस्त किया गया। दोनों मामलों को मिलाकर करीब 43 हजार वर्गमीटर भूमि कार्रवाई के दायरे में आई।

अगस्त 2026 में जैत, सुनरख बांगर और देवी आटस क्षेत्रों में भी तीन अनधिकृत कॉलोनियों पर कार्रवाई हुई। जैत में करीब 18 हजार वर्गमीटर, सुनरख बांगर में करीब 3 हजार वर्गमीटर और देवी आटस में करीब 12 हजार वर्गमीटर क्षेत्र में विकास कार्य किया जा रहा था। तीनों को मिलाकर करीब 33 हजार वर्गमीटर भूमि पर कार्रवाई हुई। रिपोर्टों के अनुसार वहां चारदीवारी, प्रवेश द्वार, भूखंडों की नींव, सड़क और इंटरलॉकिंग जैसे निर्माण हटाए गए। प्राधिकरण के अनुसार इन मामलों में पहले से ध्वस्तीकरण आदेश जारी किए गए थे और निर्धारित समय में निर्माण नहीं हटाए जाने के बाद प्रवर्तन कार्रवाई की गई।

यह केवल कॉलोनियों का मामला नहीं है। मथुरा-वृंदावन में आवासीय क्षेत्रों में होटल, अतिथि गृह, आश्रम और अन्य व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के संचालन को लेकर भी बड़ी कार्रवाई सामने आई है। वृंदावन के रुक्मिणी विहार और चैतन्य विहार क्षेत्रों में मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण, जिला प्रशासन, नगर निगम और अग्निशमन विभाग की संयुक्त टीमों ने कई भवनों की जांच की। जांच के दौरान आवासीय भूखंडों पर व्यावसायिक गतिविधियों, स्वीकृत मानचित्र से जुड़ी कमियों और अग्नि सुरक्षा मानकों के पालन से जुड़े सवाल सामने आए। इसके बाद कई भवनों पर सीलिंग की कार्रवाई की गई।

चैतन्य विहार क्षेत्र में 19 होटल, अतिथि गृह, आश्रम और अन्य व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के खिलाफ कार्रवाई की रिपोर्ट सामने आई। इनमें अग्निशमन अनापत्ति प्रमाण पत्र का अभाव, स्वीकृत मानचित्र की समस्या, आवासीय क्षेत्र में व्यावसायिक गतिविधियां और भवन सुरक्षा से जुड़ी कमियां प्रमुख रूप से सामने आईं। इसी अभियान के दौरान एक अस्पताल की भी जांच हुई। रिपोर्ट में अस्पताल के कुछ कक्षों के उपयोग और अग्नि सुरक्षा व्यवस्था को लेकर कमियां दर्ज की गईं। अस्पताल को तत्काल सील करने के बजाय दस्तावेज और अनुपालन प्रस्तुत करने का अवसर दिए जाने की जानकारी सामने आई।

रुक्मिणी विहार और चैतन्य विहार क्षेत्रों में अलग कार्रवाई में 11 भवनों पर सीलिंग की रिपोर्ट भी सामने आई। इनमें कई होटल और अतिथि गृह शामिल थे। इससे यह सवाल और महत्वपूर्ण हो जाता है कि आवासीय भूखंडों पर व्यावसायिक गतिविधियां शुरू होने के समय संबंधित विभागों की निगरानी किस स्तर पर होती है और क्या भवन बनने तथा व्यावसायिक संचालन शुरू होने से पहले उसकी जांच होती है।

गोविंद नगर और महाविद्या क्षेत्र में भी होटल और अतिथि गृहों के खिलाफ कार्रवाई की गई। एक अभियान में छह होटल और अतिथि गृह सील किए गए तथा 10 अन्य प्रतिष्ठानों को नोटिस दिए गए। अधिकारियों ने अग्नि सुरक्षा मानकों, स्वीकृत मानचित्र, भवन की निर्धारित खुली जगह और भूमि उपयोग से संबंधित अभिलेख मांगे। इससे यह स्पष्ट होता है कि मथुरा में अनधिकृत निर्माण का प्रश्न केवल भवन की अनुमति तक सीमित नहीं है, बल्कि भूमि उपयोग और सुरक्षा मानकों से भी जुड़ा हुआ है।

श्रीकृष्ण जन्मभूमि के आसपास होटल और अतिथि गृहों पर कार्रवाई के बाद व्यापारियों के विरोध का मामला भी सामने आया। प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार दो अतिथि गृहों की सील कथित रूप से तोड़े जाने के बाद अधिकारियों और व्यापारियों के बीच विवाद हुआ और पुलिस को हस्तक्षेप करना पड़ा। व्यापारियों की ओर से कहा गया कि वे अग्निशमन अनापत्ति और अन्य मानकों को पूरा करने के लिए विभागों के चक्कर लगा रहे थे, लेकिन उनकी फाइलें लंबित थीं। यह व्यापारियों का पक्ष है और इसे स्वतंत्र रूप से सिद्ध प्रशासनिक लापरवाही नहीं माना जा सकता। फिर भी यह मामला सीलिंग, अनुपालन और विभागीय प्रक्रियाओं के बीच पैदा होने वाली व्यावहारिक समस्याओं को सामने लाता है।

सितंबर 2026 में सौंख रोड के भादल क्षेत्र में चार दुकानों और गोवर्धन में लगभग 450 वर्गमीटर क्षेत्र में संचालित एक होटल पर सीलिंग कार्रवाई की रिपोर्ट सामने आई। भादल में लगभग 200 वर्गमीटर भूमि पर बिना स्वीकृत मानचित्र के चार व्यावसायिक ढांचे बनाए जाने की बात सामने आई। गोवर्धन के जतीपुरा-गाठोली मार्ग पर करीब 450 वर्गमीटर क्षेत्र में होटल संचालित होने और मौके पर वैध स्वीकृतियों से संबंधित दस्तावेज प्रस्तुत न किए जाने के बाद कार्रवाई की गई।

मथुरा नगर निगम से जुड़ा गोविंदपुर का मामला प्रशासनिक समन्वय के सवाल को और गंभीर बनाता है। खसरा संख्या 74क, 74ख, 75क और 75ख से जुड़ी भूमि में नगर निगम और अन्य सहखातेदारों के नाम दर्ज होने तथा भूमि विवाद न्यायालय में लंबित होने की जानकारी सामने आई। इसके बावजूद 4 अक्टूबर 2023 को नगर निगम की ओर से कॉलोनी विकसित करने के लिए अनापत्ति प्रमाण पत्र जारी किए जाने की रिपोर्ट सामने आई। बाद में मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण के सचिव ने 6 दिसंबर 2023 को नगर निगम को पत्र भेजकर न्यायालयीन विवाद का उल्लेख किया और अनापत्ति प्रमाण पत्र पर आपत्ति दर्ज की। रिपोर्ट के अनुसार नगर निगम की ओर से इस पत्र का जवाब नहीं दिया गया। बाद में पार्षदों की शिकायत के बाद नगर आयुक्त ने जांच के आदेश दिए।

यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां प्रश्न केवल कॉलोनी की वैधता का नहीं बल्कि भूमि स्वामित्व, न्यायालयीन विवाद, नगर निगम की अनापत्ति और विकास प्राधिकरण की स्वीकृति के बीच समन्वय का है। यदि एक विभाग भूमि को लेकर न्यायालय में अपना पक्ष रख रहा हो और उसी भूमि पर विकास के लिए दूसरे स्तर पर अनापत्ति जारी हो जाए तो आम खरीदार के लिए वास्तविक स्थिति समझना कठिन हो जाता है।

मथुरा में सार्वजनिक भूमि और पार्कों पर अतिक्रमण की शिकायतें भी सामने आई हैं। सितंबर 2026 में पागलबाबा मंदिर के पास गिर्राज नगर आवासीय कल्याण समिति के निवासियों ने कॉलोनी के पार्क की भूमि पर कथित कब्जे और निर्माण की शिकायत की। निवासियों ने नगर निगम पहुंचकर ज्ञापन दिया। नगर निगम अधिकारियों ने कहा कि स्वीकृत मानचित्र और लेआउट से मिलान करने के बाद स्थिति स्पष्ट होगी। यदि भूमि पार्क के रूप में स्वीकृत पाई जाती है और उस पर अवैध निर्माण पाया जाता है तो कार्रवाई की जाएगी। इसलिए इस मामले को भी जांच पूरी होने से पहले सिद्ध अवैध कब्जा नहीं कहा जा सकता।

जैत क्षेत्र से जुड़े एक न्यायालयीन मामले में सरकारी भूमि और चकमार्ग पर अतिक्रमण का प्रश्न भी सामने आया। न्यायालयीन रिकॉर्ड में खसरा संख्या 1116 और 1120 का उल्लेख है। सीमांकन रिपोर्ट के अनुसार एक भूखंड पर संबंधित पक्ष का अतिक्रमण नहीं पाया गया, जबकि दूसरे भूखंड के 0.0021 हेक्टेयर क्षेत्र पर अतिक्रमण दर्ज किया गया। इसके बाद उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता की धारा 67 के तहत कार्यवाही शुरू हुई और वाद संख्या T202601500110496 दर्ज किया गया। इसी मामले से जुड़े खसरा संख्या 1117 पर बने अतिथि गृह के संबंध में मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण की ओर से नगर योजना एवं विकास अधिनियम की धारा 27 के तहत नोटिस जारी किए जाने का उल्लेख भी न्यायालयीन रिकॉर्ड में है। संबंधित पक्ष द्वारा निर्माण का शमन मानचित्र प्रस्तुत किए जाने की जानकारी भी अदालत के सामने रखी गई।

मथुरा-वृंदावन में भवन निर्माण के नियमों से आगे बढ़कर पर्यावरणीय अनुपालन से जुड़े मामले भी न्यायालयों तक पहुंचे हैं। पारस प्राइड, रुक्मिणी विहार आवासीय योजना, वृंदावन से जुड़े 2024 के इलाहाबाद उच्च न्यायालय के अभिलेख में संयुक्त समिति की जांच रिपोर्ट का उल्लेख है। रिपोर्ट के अनुसार परियोजना का कुल आवासीय क्षेत्र लगभग 6,997.90 वर्गमीटर और निर्मित क्षेत्र 13,593.04 वर्गमीटर था।

संयुक्त समिति की रिपोर्ट में उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की अनापत्ति प्रमाण पत्र, मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण के अधिभोग प्रमाण पत्र, भूजल अनुमति, वर्षा जल संचयन, सीवेज, डीजल जनरेटर की निकासी और हरित क्षेत्र से जुड़े कई बिंदु दर्ज किए गए। रिपोर्ट में दो बोरवेल के लिए केंद्रीय भूजल प्राधिकरण की अनुमति नहीं होने, वर्षा जल संचयन की व्यवस्थाओं के अवरुद्ध और दूषित पाए जाने तथा बिना उपचारित सीवेज के निकास का उल्लेख था। स्वीकृत योजना में 4,191.852 वर्गमीटर हरित पट्टी का उल्लेख था और उसके विकास को लेकर भी सवाल दर्ज किए गए। निरीक्षण के समय परियोजना क्षेत्र में केवल दो पौधे पाए जाने की बात रिपोर्ट में दर्ज थी और ठोस कचरे के लिए अलग व्यवस्था के संबंध में भी कमी बताई गई।

हालांकि इस मामले में विकासकर्ता की ओर से बाद में पर्यावरणीय अनुपालन से संबंधित दस्तावेज प्रस्तुत करने और कुछ आरोपों से असहमति जताने की बात न्यायालयीन रिकॉर्ड में मौजूद है। इसलिए संयुक्त समिति की रिपोर्ट में दर्ज कमियों को संबंधित पक्ष के खिलाफ अंतिम अपराध सिद्धि के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा। यह मामला फिर भी इस बात को सामने लाता है कि किसी भवन या आवासीय परियोजना की वैधता केवल भवन मानचित्र तक सीमित नहीं होती, बल्कि पर्यावरण, जल, सीवेज और हरित क्षेत्र जैसे कई अन्य नियम भी लागू होते हैं।

मथुरा में नियमितीकरण या शमन की प्रक्रिया को लेकर भी सवाल उठे हैं। कुछ निर्माणों में नियमों के अंतर्गत निर्धारित शुल्क और शर्तों के आधार पर निर्माण संबंधी उल्लंघनों को नियमित या शमन करने की व्यवस्था हो सकती है। लेकिन भूमि उपयोग, सार्वजनिक सड़क, हरित क्षेत्र, निर्धारित खुली जगह और अन्य गंभीर उल्लंघनों पर अलग नियम लागू होते हैं। मथुरा, वृंदावन, गोवर्धन, छटीकरा और बरसाना क्षेत्रों में भवनों के शमन और नियमितीकरण से संबंधित प्रक्रिया को लेकर प्रकाशित खबरों में सवाल उठाए गए हैं। कुछ रिपोर्टों में कर्मचारियों पर अतिरिक्त लाभ लेने के आरोप भी लगाए गए, लेकिन इन आरोपों की स्वतंत्र जांच या न्यायालयीन पुष्टि के बिना उन्हें प्रमाणित भ्रष्टाचार नहीं माना जा सकता।

मथुरा में अनधिकृत निर्माण के मामलों को मोटे तौर पर कई श्रेणियों में देखा जा सकता है। पहली श्रेणी में बिना स्वीकृत लेआउट के भूमि को छोटे-छोटे भूखंडों में बांटकर कॉलोनी विकसित करना शामिल है। दूसरी श्रेणी में बिना स्वीकृत भवन मानचित्र के मकान, दुकान, कार्यालय, होटल, अतिथि गृह और अन्य भवन बनाना आता है। तीसरी श्रेणी में आवासीय भूमि का व्यावसायिक उपयोग शामिल है। चौथी श्रेणी में सड़क, पार्क, हरित पट्टी या अन्य सार्वजनिक उपयोग की भूमि पर कथित अतिक्रमण शामिल है। पांचवीं श्रेणी में अग्नि सुरक्षा मानकों और आवश्यक अनापत्ति प्रमाण पत्र के बिना होटल, अतिथि गृह और अन्य प्रतिष्ठानों का संचालन आता है। छठी श्रेणी में पर्यावरण, भूजल, सीवेज और वर्षा जल संचयन से जुड़े नियमों का पालन न करना शामिल है। सातवीं श्रेणी में स्वीकृत मानचित्र और वास्तविक निर्माण के बीच अंतर और आठवीं श्रेणी में अलग-अलग सरकारी विभागों के अभिलेखों के बीच संभावित असंगति सामने आती है।

मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण की कार्रवाई के आंकड़े बताते हैं कि प्रवर्तन का स्तर काफी बड़ा है। अप्रैल से नवंबर 2025 के बीच 24 कॉलोनियां और 2026 के पहले सात महीनों में 39 कॉलोनियां कार्रवाई के दायरे में आईं। कुल 63 कॉलोनियां और लगभग 75.03 हेक्टेयर भूमि इन आंकड़ों में शामिल है। अनुमानित भूमि मूल्य करीब 374 करोड़ रुपये बताया गया है। इसके अलावा अलग-अलग अभियानों में 35 हजार वर्गमीटर की अनधिकृत कॉलोनी में 12 कुटीरनुमा भवनों और अन्य निर्माणों को सील किया गया, अहिल्यागंज खादर में करीब 4 हजार और 10 हजार वर्गमीटर की दो कॉलोनियों पर कार्रवाई हुई, जैत, सुनरख बांगर और देवी आटस में करीब 33 हजार वर्गमीटर क्षेत्र में कार्रवाई हुई और सौंख रोड पर लगभग 43 हजार वर्गमीटर क्षेत्र में दो कॉलोनियों के खिलाफ कार्रवाई हुई।

व्यावसायिक क्षेत्र में भी कार्रवाई के आंकड़े सामने आए हैं। वृंदावन के विभिन्न क्षेत्रों में 11 भवनों पर सीलिंग की रिपोर्ट है। चैतन्य विहार में 19 होटल, अतिथि गृह, आश्रम और अन्य प्रतिष्ठानों के खिलाफ कार्रवाई की गई। गोविंद नगर क्षेत्र में छह होटल और अतिथि गृह सील किए गए तथा 10 अन्य प्रतिष्ठानों को नोटिस दिए गए। सितंबर में चार दुकानों और लगभग 450 वर्गमीटर क्षेत्र में संचालित एक होटल पर भी सीलिंग की कार्रवाई हुई।

इन आंकड़ों को देखकर यह कहना सही नहीं होगा कि प्रशासन कुछ नहीं कर रहा। इसके विपरीत, उपलब्ध रिकॉर्ड में बड़े पैमाने पर ध्वस्तीकरण और सीलिंग की कार्रवाई दर्ज है। लेकिन इसी के साथ यह सवाल भी बना रहता है कि इतनी बड़ी संख्या में कॉलोनियों और भवनों को कार्रवाई के स्तर तक पहुंचने से पहले क्यों नहीं रोका जा सका। यदि सड़क, चारदीवारी, बिजली के खंभे, प्लॉट की नींव, होटल, अतिथि गृह और व्यावसायिक प्रतिष्ठान विकसित हो चुके हैं तो यह सवाल स्वाभाविक रूप से उठता है कि निर्माण के दौरान निगरानी व्यवस्था किस स्तर पर सक्रिय थी।

प्रशासन के सामने सबसे बड़ी चुनौती ध्वस्तीकरण के बाद दोबारा निर्माण रोकना भी है। विकास प्राधिकरण की समीक्षा में ध्वस्तीकरण के बाद कुछ स्थानों पर दोबारा निर्माण शुरू होने की शिकायतों का उल्लेख हुआ है। यदि किसी जमीन पर एक बार कार्रवाई हो जाती है और कुछ समय बाद उसी जगह फिर सड़क, चारदीवारी, प्लॉटिंग या भवन निर्माण शुरू हो जाता है तो केवल एक बार की कार्रवाई स्थायी समाधान नहीं बनती।

इस पूरी स्थिति में आम नागरिक सबसे कमजोर पक्ष हो सकता है। किसी व्यक्ति ने यदि अनधिकृत कॉलोनी में अपनी जीवनभर की बचत से भूखंड खरीद लिया और बाद में उस कॉलोनी के खिलाफ ध्वस्तीकरण कार्रवाई हो गई तो उसका आर्थिक नुकसान हो सकता है। ऐसे भूखंडों पर बैंक ऋण, भवन निर्माण अनुमति, बिजली-पानी, पंजीकरण और भविष्य में संपत्ति के हस्तांतरण से जुड़ी समस्याएं भी सामने आ सकती हैं। इसलिए अनधिकृत कॉलोनी केवल विकास प्राधिकरण के नियमों का उल्लंघन नहीं बल्कि आम लोगों की संपत्ति और आर्थिक सुरक्षा से जुड़ा विषय भी है।

इसी कारण प्रशासनिक व्यवस्था के सामने यह महत्वपूर्ण प्रश्न है कि किसी नई कॉलोनी की पहचान कितने समय में होती है, शिकायत मिलने के बाद स्थल निरीक्षण कितने दिनों में होता है, निरीक्षण के बाद नोटिस कब जारी होता है, नोटिस के बाद निर्माण वास्तव में रुकता है या नहीं, निर्माण जारी रहने पर सीलिंग कितनी जल्दी होती है, ध्वस्तीकरण आदेश और वास्तविक ध्वस्तीकरण के बीच कितना समय लगता है, कितने मामलों में प्राथमिकी दर्ज होती है, कितने मामलों में अभियोजन चलता है, कितने मामलों में शमन या नियमितीकरण किया जाता है और कितने मामलों में शमन मानचित्र अस्वीकार किया जाता है।

इसके साथ यह जानकारी भी सार्वजनिक होनी चाहिए कि कितने आवासीय भूखंडों पर व्यावसायिक गतिविधियां मिलीं, कितने होटल और अतिथि गृह बिना आवश्यक अग्निशमन स्वीकृति के मिले, कितने मामलों में नगर निगम और विकास प्राधिकरण के अभिलेखों में अंतर पाया गया, कितने मामलों में सरकारी या सार्वजनिक उपयोग की भूमि पर अतिक्रमण मिला और कितने मामलों में अधिकारियों के खिलाफ विभागीय जांच शुरू हुई तथा उनका परिणाम क्या रहा।

मथुरा में अनधिकृत निर्माण की निगरानी कई सरकारी संस्थाओं से जुड़ी है। मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण के साथ नगर निगम, जिला प्रशासन, राजस्व विभाग, अग्निशमन विभाग और कुछ मामलों में प्रदूषण नियंत्रण तथा भूजल से संबंधित विभागों की भूमिका होती है। होटल और अतिथि गृहों की कार्रवाई में कई विभागों को संयुक्त रूप से काम करना पड़ा। गोविंदपुर के मामले में नगर निगम और विकास प्राधिकरण के बीच अभिलेखों और अनुमति को लेकर विवाद सामने आया। इससे स्पष्ट है कि शहरी विकास की निगरानी केवल एक विभाग के भरोसे नहीं चल सकती।

भूमि अभिलेख, स्वीकृत मानचित्र, भूमि उपयोग, भवन निर्माण, अग्नि सुरक्षा, पर्यावरण, सीवेज, भूजल और सार्वजनिक भूमि से संबंधित जानकारी एक-दूसरे से जुड़ी हुई है। यदि एक विभाग के पास किसी भूमि के विवादित होने की जानकारी है लेकिन दूसरे विभाग को उसका पता नहीं है, तो अनुमति और निर्माण के बीच विरोधाभास पैदा हो सकता है। ऐसी स्थिति में सबसे अधिक नुकसान आम नागरिक को हो सकता है।

मथुरा में राजनीतिक दलों और स्थानीय नागरिकों की ओर से भी विकास प्राधिकरण की कार्यप्रणाली को लेकर सवाल उठाए गए हैं। जुलाई 2026 में स्थानीय कांग्रेस नेताओं ने आरोप लगाया कि कई क्षेत्रों में बिना स्वीकृत मानचित्र के निर्माण जारी हैं और कुछ विवादित भूमि पर भी निर्माण हो रहे हैं। विकास प्राधिकरण की ओर से कहा गया कि शिकायत मिलने पर निर्माण रुकवाया गया और आगे भी शिकायत के आधार पर कार्रवाई की जाएगी। यहां भी राजनीतिक आरोप और प्रशासन का जवाब दोनों को साथ रखना आवश्यक है और किसी आरोप को स्वतंत्र जांच के बिना अंतिम तथ्य नहीं माना जा सकता।

अधिकारियों की भूमिका को लेकर भी शिकायतें सामने आई हैं। एक मामले में मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण के एक सहायक अभियंता के खिलाफ शिकायत की खबर प्रकाशित हुई जिसमें आरोप लगाया गया कि उन्होंने सील किए गए अतिथि गृह में कमरा मांगने का प्रयास किया। शिकायत के बाद स्पष्टीकरण मांगे जाने और जांच शुरू होने की बात सामने आई। यह केवल शिकायत और जांच का मामला है और जांच का अंतिम परिणाम उपलब्ध होने तक इसे अधिकारी के खिलाफ सिद्ध कदाचार नहीं माना जा सकता।

मथुरा में अब सबसे महत्वपूर्ण आवश्यकता एक ऐसी पारदर्शी व्यवस्था की है जिसमें प्रत्येक अनधिकृत निर्माण के बारे में सार्वजनिक रूप से यह जानकारी उपलब्ध हो कि निर्माण कहां हुआ, खसरा संख्या क्या है, भूमि का उपयोग क्या है, मानचित्र स्वीकृत है या नहीं, कॉलोनी स्वीकृत है या नहीं, शिकायत कब मिली, निरीक्षण कब हुआ, नोटिस कब जारी हुआ, सीलिंग आदेश कब हुआ, ध्वस्तीकरण आदेश कब हुआ, वास्तविक कार्रवाई कब हुई, प्राथमिकी दर्ज हुई या नहीं, शमन या नियमितीकरण की स्थिति क्या है और कार्रवाई के बाद भूमि की वर्तमान स्थिति क्या है।

यदि ऐसी जानकारी सार्वजनिक होती है तो यह भी स्पष्ट हो सकता है कि कौन-से मामले तेजी से निपटाए गए और किन मामलों में कार्रवाई लंबे समय तक लंबित रही। इससे प्रशासनिक व्यवस्था पर लगाए जाने वाले आरोपों की वस्तुनिष्ठ जांच भी संभव होगी और अधिकारियों की वास्तविक कार्यप्रणाली का रिकॉर्ड भी सामने आएगा।

मथुरा में उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर यह कहना उचित है कि अनधिकृत कॉलोनियों और निर्माणों के खिलाफ बड़े पैमाने पर कार्रवाई हो रही है। साथ ही यह भी स्पष्ट है कि कई मामलों में शिकायत, निर्माण, नोटिस, सीलिंग, ध्वस्तीकरण, भूमि विवाद, अग्नि सुरक्षा, पर्यावरण और विभागीय समन्वय जैसे मुद्दे एक साथ सामने आए हैं। इसलिए समस्या को केवल “अवैध निर्माण गिराने” के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा।

मथुरा की असली चुनौती निर्माण शुरू होने से पहले उसकी पहचान और रोकथाम है। यदि कोई कॉलोनी बनने से पहले ही रुक जाती है तो न तो करोड़ों रुपये की भूमि पर अनधिकृत विकास होता है, न आम लोग वहां भूखंड खरीदते हैं और न बाद में बुलडोजर चलाने की जरूरत पड़ती है। इसी तरह यदि आवासीय भूखंड पर होटल या व्यावसायिक भवन बनने से पहले भूमि उपयोग की जांच हो जाए तो बाद की सीलिंग और विवाद की स्थिति कम हो सकती है।

इसलिए मथुरा के सामने अब सवाल केवल यह नहीं है कि कितनी कॉलोनियां ध्वस्त हुईं या कितने भवन सील हुए। सवाल यह है कि कितने निर्माण शुरू होने से पहले रोक दिए गए, कितनी शिकायतों पर समयबद्ध कार्रवाई हुई, कितने मामलों में नोटिस के बावजूद निर्माण जारी रहा, कितने मामलों में प्राथमिकी और अभियोजन हुआ, कितने मामलों में नियमितीकरण किया गया और कितने मामलों में कार्रवाई के बाद दोबारा निर्माण हुआ।

उपलब्ध आंकड़ों में 63 अनधिकृत कॉलोनियों और लगभग 75 हेक्टेयर भूमि पर कार्रवाई का रिकॉर्ड मथुरा में समस्या के पैमाने को दिखाता है। करीब 374 करोड़ रुपये की अनुमानित भूमि कीमत इस मामले के आर्थिक पक्ष को सामने लाती है। होटल, अतिथि गृह, दुकानों, आवासीय भवनों, सार्वजनिक भूमि, पार्क, चकमार्ग और पर्यावरणीय नियमों से जुड़े अलग-अलग मामलों से पता चलता है कि समस्या केवल एक तरह के निर्माण तक सीमित नहीं है।

प्रशासन ने कार्रवाई की है और कई मामलों में ध्वस्तीकरण तथा सीलिंग के आदेश लागू किए हैं। लेकिन न्यायालय द्वारा नीति और जवाबदेही पर पूछे गए सवाल, स्थानीय शिकायतें, कार्रवाई में कथित देरी, ध्वस्तीकरण के बाद दोबारा निर्माण की शिकायतें और विभागों के बीच सामने आए विवाद यह बताते हैं कि रोकथाम और जवाबदेही का प्रश्न अभी भी महत्वपूर्ण है।

मथुरा के लिए अब सबसे महत्वपूर्ण आवश्यकता केवल कार्रवाई के आंकड़े जारी करने की नहीं बल्कि कार्रवाई से पहले और कार्रवाई के बाद की पूरी प्रक्रिया को सार्वजनिक करने की है। कहां निर्माण हुआ, किस भूमि पर हुआ, अनुमति थी या नहीं, शिकायत कब हुई, निरीक्षण कब हुआ, कार्रवाई कब हुई, देरी क्यों हुई, मामला किस अधिकारी के पास था, जिम्मेदारी किसकी थी और कार्रवाई के बाद उस भूमि की वर्तमान स्थिति क्या है—इन सवालों के जवाब सार्वजनिक होने चाहिए।

क्योंकि जब कोई अनधिकृत कॉलोनी पूरी तरह विकसित हो जाती है, भूखंड बिक जाते हैं, मकान खड़े हो जाते हैं और होटल या व्यावसायिक प्रतिष्ठान वर्षों तक संचालित होने लगते हैं, तब बाद की कार्रवाई केवल निर्माणकर्ता को प्रभावित नहीं करती। उसका असर उन आम लोगों पर भी पड़ सकता है जिन्होंने अपनी जमा पूंजी लगाकर वहां जमीन, मकान या दुकान खरीदी होती है।

मथुरा में इसलिए असली परीक्षा केवल बुलडोजर चलाने की नहीं है। असली परीक्षा यह है कि प्रशासन अनधिकृत निर्माण को पहली ईंट से पहले पहचान पाए, शिकायत मिलने पर समय पर कार्रवाई करे, सभी मामलों में समान नियम लागू करे, विभागों के बीच अभिलेखों का समन्वय सुनिश्चित करे और जहां वास्तविक प्रशासनिक चूक साबित हो वहां जिम्मेदारी भी तय करे। यही व्यवस्था मथुरा-वृंदावन के तेजी से बदलते शहरी स्वरूप को अधिक व्यवस्थित, सुरक्षित और कानूनी बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकती है।

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Founder, RNI News

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