2018 की जजों की प्रेस कॉन्फ्रेंस से चुनाव आयोग विवाद तक, उठे सिस्टम और वोट के अधिकार पर सवाल
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठ जजों की 2018 की ऐतिहासिक प्रेस कॉन्फ्रेंस का संदर्भ देते हुए चुनाव आयोग की मौजूदा कार्यप्रणाली और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर सवाल उठाए गए हैं। लेख में दावा किया गया है कि उस समय न्यायपालिका के भीतर उठी चिंताओं के बावजूद व्यवस्था में अपेक्षित बदलाव नहीं आया और अब चुनाव आयोग के भीतर से सामने आ रही असहमति को भी इसी व्यापक संदर्भ में देखा जाना चाहिए।
12 जनवरी 2018 को तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के कार्यकाल के दौरान सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठ न्यायाधीशों—जे. चेलमेश्वर, रंजन गोगोई, मदन बी. लोकुर और कुरियन जोसेफ—ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर न्यायपालिका के प्रशासन और मामलों के आवंटन से जुड़े मुद्दे सार्वजनिक किए थे। यह घटना भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में एक असाधारण घटनाक्रम के रूप में दर्ज हुई।
अब इसी घटना का उदाहरण देते हुए लेख में सवाल उठाया गया है कि संस्थाओं के भीतर से जब असहमति की आवाज सामने आती है तो उसके बाद व्यवस्था में कितना बदलाव होता है। लेख में चुनाव आयोग को लेकर भी इसी तरह की चिंता व्यक्त की गई है और दावा किया गया है कि आयोग के भीतर से उठने वाले सवालों पर सार्वजनिक बहस होनी चाहिए।
लेख में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर गंभीर आरोप लगाए गए हैं और उन्हें एक राजनीतिक समूह के पक्ष में काम करने वाला बताया गया है। हालांकि ये आरोप लेख में व्यक्त राजनीतिक दावे हैं और इन्हें स्थापित तथ्य के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता। निर्वाचन आयोग की आधिकारिक जानकारी के अनुसार ज्ञानेश कुमार वर्तमान में मुख्य चुनाव आयुक्त हैं और उन्होंने 19 फरवरी 2025 को 26वें मुख्य चुनाव आयुक्त के रूप में कार्यभार संभाला था।
लेख में चुनावी मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर को लेकर भी गंभीर सवाल उठाए गए हैं। आरोप लगाया गया है कि जहां किसी मतदाता के विपक्ष में मतदान करने की आशंका हो, वहां मतदाताओं के नाम हटाए जा रहे हैं। दूसरी ओर, निर्वाचन आयोग का कहना है कि एसआईआर का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कोई पात्र मतदाता मतदाता सूची से बाहर न रहे और कोई अपात्र व्यक्ति उसमें शामिल न हो। आयोग ने 2026 में एसआईआर को पारदर्शी तरीके से संचालित किए जाने की बात कही है।
लेख में यह भी सवाल उठाया गया है कि यदि किसी नागरिक को लगता है कि उसका नाम मतदाता सूची से हट गया है तो वह अपने अधिकार की रक्षा कैसे करेगा। निर्वाचन आयोग के आधिकारिक मतदाता सेवा पोर्टल पर मतदाता अपना नाम खोजने, आवेदन की स्थिति देखने और मतदाता सूची में विवरण अपडेट कराने जैसी सुविधाओं का उपयोग कर सकते हैं।
लेखक ने अपने तर्क में कहा है कि लोकतंत्र में सबसे महत्वपूर्ण अधिकारों में से एक मताधिकार है और यदि नागरिक अपने मताधिकार को लेकर आशंकित महसूस करने लगे तो इसका असर लोकतांत्रिक व्यवस्था पर पड़ता है। इसी संदर्भ में न्यायपालिका, चुनाव आयोग, मीडिया और प्रशासन जैसी संस्थाओं की भूमिका पर भी सवाल उठाए गए हैं।
लेख में मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था पर भी कई गंभीर आरोप लगाए गए हैं। इसमें दावा किया गया है कि सरकार के कार्यकाल में नागरिकों के अधिकार लगातार कमजोर हुए हैं और राजनीतिक तथा संस्थागत व्यवस्था में सत्ता के केंद्रीकरण की स्थिति बनी है। इन दावों को लेख के विचार और आरोप के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
लेख का केंद्रीय सवाल हालांकि राजनीतिक दलों से आगे बढ़कर नागरिकों की भूमिका पर है। इसमें कहा गया है कि लोकतंत्र केवल संस्थाओं से नहीं चलता, बल्कि नागरिकों की जागरूकता और अपने संवैधानिक अधिकारों के प्रति सजगता भी उसकी महत्वपूर्ण आधारशिला है।
लेख में 2018 की न्यायाधीशों की प्रेस कॉन्फ्रेंस और वर्तमान चुनाव आयोग विवाद को जोड़ते हुए यह तर्क दिया गया है कि संस्थाओं के भीतर से उठने वाली चिंताओं को गंभीरता से लिया जाना चाहिए। साथ ही मतदाता सूची, मताधिकार और चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता को लेकर सार्वजनिक विश्वास बनाए रखना लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण बताया गया है।
निर्वाचन आयोग स्वयं को संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत स्थापित स्वायत्त संवैधानिक प्राधिकरण बताता है और चुनाव प्रक्रिया के संचालन की जिम्मेदारी उसके पास है। ऐसे में चुनावी प्रक्रिया को लेकर उठने वाले आरोपों और दावों की जांच आधिकारिक रिकॉर्ड, संबंधित संस्थाओं के जवाब और उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर किया जाना महत्वपूर्ण रहेगा।
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