PM-CM बर्खास्तगी विधेयक पर संसदीय समिति की कवायद तेज, विपक्ष शासित राज्यों से भी मांगी जाएगी राय; कर्नाटक-तेलंगाना को न्योता
नई दिल्ली (आरएनआई) — भ्रष्टाचार के आरोपों में प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्रियों को पद से हटाने से जुड़े प्रस्तावित कानून पर संसदीय समिति ने अपनी जांच तेज कर दी है। इस क्रम में समिति ने विपक्ष शासित राज्यों की राय जानने का फैसला किया है और इसके तहत कर्नाटक और तेलंगाना को अपने विचार रखने के लिए आमंत्रित किया जाएगा।
भाजपा सांसद अपराजिता सारंगी की अध्यक्षता वाली संसदीय समिति ‘संविधान (एक सौ तीसवां संशोधन) विधेयक, 2025’ की जांच कर रही है। बुधवार को समिति ने मध्य प्रदेश सरकार का पक्ष सुना, जिसने विधेयक का पूर्ण समर्थन किया। राज्य की ओर से मुख्य सचिव ने समिति के सामने प्रस्तुति दी और कहा कि सरकार प्रस्तावित प्रावधानों से पूरी तरह सहमत है।
बैठक में पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च और इंडियन लॉ इंस्टीट्यूट जैसे कानूनी अनुसंधान संगठनों के प्रतिनिधि भी शामिल हुए। इन संगठनों ने विधेयक के कुछ प्रावधानों से असहमति जताते हुए संशोधन के सुझाव दिए, हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि विधेयक लाने की मंशा पर कोई सवाल नहीं है।
सूत्रों के अनुसार, समिति के सदस्यों ने सर्वसम्मति से यह तय किया कि केवल सत्तारूढ़ दल शासित राज्यों ही नहीं, बल्कि विपक्षी दलों द्वारा शासित राज्यों की राय भी सुनी जानी चाहिए। इसी वजह से कर्नाटक और तेलंगाना को बुलाने पर सहमति बनी है। इसके अलावा केरल और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों को भी बाद के चरण में आमंत्रित किया जाएगा, क्योंकि वहां निकट भविष्य में विधानसभा चुनाव प्रस्तावित हैं।
लगभग तीन घंटे चली बैठक में प्रत्येक प्रतिनिधि को अपने विचार रखने के लिए पर्याप्त समय दिया गया। अपराजिता सारंगी ने बताया कि यह समिति की छठी बैठक थी और अगली बैठक 10 मार्च को होगी। अब तक समिति के समक्ष 14 संगठनों और दो राज्यों ने अपने विचार रखे हैं। इससे पहले राजस्थान भी इस विधेयक का समर्थन कर चुका है।
गौरतलब है कि प्रस्तावित संविधान संशोधन विधेयक में यह प्रावधान किया गया है कि यदि प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या केंद्र/राज्य सरकार का कोई मंत्री गंभीर आपराधिक मामलों में गिरफ्तार होकर हिरासत में लिया जाता है—जिनमें पांच साल या उससे अधिक की सजा का प्रावधान है—तो उन्हें पद से हटाया जा सकेगा और रिहाई के बाद दोबारा पद पर नियुक्ति नहीं होगी। इस विधेयक को लेकर सियासी बहस तेज होने के आसार हैं, खासकर विपक्ष शासित राज्यों की प्रतिक्रिया के बाद।
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