लखनऊ के कारोबारी गौरव श्रीवास्तव पर अंतरराष्ट्रीय रक्षा सौदों को लेकर सवाल, 13.9 अरब डॉलर के प्रस्तावों पर छिड़ी बहस
भारतीय मूल के कारोबारी गौरव श्रीवास्तव एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय सुर्खियों में हैं। अंतरराष्ट्रीय खोजी रिपोर्टों और अमेरिका में चल रहे दीवानी मुकदमों के आधार पर उन पर इंडोनेशिया के रक्षा क्षेत्र से जुड़े अरबों डॉलर के प्रस्तावित सौदों में प्रभावशाली भूमिका निभाने के आरोप लगे हैं। हालांकि, गौरव श्रीवास्तव ने इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज किया है और उन्हें अपने पूर्व कारोबारी साझेदार की दुर्भावनापूर्ण साजिश बताया है।
रिपोर्टों के अनुसार, गौरव श्रीवास्तव ने स्वयं को अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए से जुड़ा प्रभावशाली व्यक्ति बताया था। आरोप है कि इसी पहचान के आधार पर उन्होंने इंडोनेशिया के तत्कालीन रक्षा मंत्री और वर्तमान राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो तक पहुंच बनाई। इसके बाद उनके नाम से लगभग 13.9 अरब अमेरिकी डॉलर मूल्य के रक्षा प्रस्ताव सामने आए, जिनमें 36 लड़ाकू विमान, ब्लैक हॉक हेलीकॉप्टर, सैन्य कमांड एवं कंट्रोल सिस्टम सहित अन्य रक्षा उपकरण शामिल बताए गए।
मामले ने उस समय नया मोड़ लिया जब उनके पूर्व कारोबारी सहयोगी नील्स ट्रोस्ट ने अमेरिका की अदालत में उनके खिलाफ दीवानी मुकदमे दायर किए। मुकदमों में आरोप लगाया गया कि गौरव श्रीवास्तव ने सीआईए से जुड़े होने का दावा कर प्रभावशाली संपर्कों का इस्तेमाल किया और कारोबारी साझेदारों को भ्रमित किया। अदालत में रिकॉर्डेड बातचीत और अन्य दस्तावेज भी प्रस्तुत किए गए, जिनके आधार पर कई अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थानों ने खोजी रिपोर्टें प्रकाशित कीं।
रिपोर्टों में यह भी दावा किया गया कि रक्षा क्षेत्र का सीमित अनुभव रखने वाली कंपनियों के माध्यम से इंडोनेशिया के साथ एफ-15 लड़ाकू विमान, यूएच-60 ब्लैक हॉक हेलीकॉप्टर और आधुनिक सैन्य कमांड सिस्टम जैसी परियोजनाओं के प्रारंभिक प्रस्ताव तैयार किए गए थे। हालांकि बाद में अमेरिका ने इंडोनेशिया को एफ-15 विमानों की संभावित बिक्री को मंजूरी दी, लेकिन उस आधिकारिक प्रक्रिया में गौरव श्रीवास्तव की कंपनियां शामिल नहीं रहीं।
गौरव श्रीवास्तव ने सभी आरोपों से इनकार करते हुए कहा है कि उनके खिलाफ पूर्व कारोबारी साझेदार द्वारा उन्हें बदनाम करने के उद्देश्य से झूठा अभियान चलाया जा रहा है। अब तक किसी आपराधिक अदालत ने उन्हें इन आरोपों में दोषी नहीं ठहराया है और न ही किसी न्यायिक निर्णय में यह माना गया है कि उन्होंने इंडोनेशिया सरकार के साथ किसी प्रकार की धोखाधड़ी की है।
फिलहाल यह मामला अमेरिकी अदालतों में लंबित है। ऐसे में आरोपों की न्यायिक पुष्टि होना अभी बाकी है। हालांकि इस प्रकरण ने अंतरराष्ट्रीय रक्षा सौदों में पारदर्शिता, निजी मध्यस्थों की भूमिका, राजनीतिक संपर्कों के प्रभाव और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े निर्णयों की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल जरूर खड़े कर दिए हैं।
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