“क्या इस बार भी पहाड़ काटकर बचाना पड़ेगा गोपालपुरा तालाब?”—सिस्टम पर उठे सवाल
गुना (आरएनआई) यूं तो 30 जुलाई 2025 को गुना शहर में आई बाढ़ से बड़ी त्रासदी को टालने के लिए डब्ल्यूआरडी के इंजीनियर मुकेश जैन साहब को सिर्फ धन्यवाद नहीं बल्कि पुरस्कार देना चाहिए था। जिनकी सूझबूझ से भीषण बारिश में गोपालपुरा का तालाब फूटने से बच गया था। तालाब ओवरफ्लो होने से पार की मिट्टी में बीचोंबीच कटाव शुरू हो गया था। बड़ी तबाही रोकने के लिए इंजीनियर जैन पर निर्णय लेने के लिए कुछ मिनट का ही समय था।
उन्होंने अपनी नौकरी पर जोखिम मोल लिया और तालाब किनारे की पहाड़ी का कोना जेसीबी से काट कर तालाब के पानी का निकास मार्ग बनवाया। यदि कुछ मिनट की देरी होती तो निश्चित ही तालाब फूट जाता और तब शहर में नुकसान कई गुना ज्यादा होता। शहर में 20 फुट हाइट तक पानी चंद मिनटों में घुसता। सैकड़ों जानें जा सकती थीं और करोड़ों की संपत्ति तबाह होती। ईश्वर की अनुकम्पा से बड़ा नुकसान बहुत कम नुकसान पर टल गया।
लेकिन इसके बाद सिस्टम का तमाशा देखिए! इतने बड़े हादसे के बाद भी हालात जस के तस हैं। केंद्रीय मंत्री और मुख्यमंत्री ने पिछले वर्ष बाढ़ के बाद प्रभावित क्षेत्र का दौरा किया था। कई जगह विरोध प्रदर्शन हुए थे। चक्काजाम हुए थे। जनप्रतिनिधियों ने संवेदनाएं व्यक्त कीं थीं। सुधार, सुरक्षा और साथ देने के आश्वासन दिए गए थे। तालाब की खामियां दूर करने के वादे थे और नदी नालों के बहाव क्षेत्र से अतिक्रमण हटाने के इरादे भी थे।
गोपालपुरा का तालाब फिर से जनजीवन के लिए खतरा न बने और भारी बारिश में उसके फूटने की आशंका समाप्त की जा सके, इसे ध्यान में रखकर जल संसाधन विभाग ने तालाब की मरम्मत और पार की ऊंचाई बढ़ाने के साथ अन्य आवश्यक सुधार कार्य कराना जरूरी पाया। इसके लिए आवश्यक राशि 2.93 करोड़ रुपए की जरूरत होने की डीपीआर बनाकर विभाग को भेजी, मंजूर हुए सिर्फ 25 लाख।
विदित ही है कि जल संसाधन विभाग के मंत्री तुलसी सिलावट हैं। श्री सिलावट, केंद्रीय मंत्री श्री सिंधिया के सबसे विश्वसनीय हैं। फिर भी श्री सिंधिया के संसदीय क्षेत्र में जिसे श्री सिंधिया अपना परिवार मानते हैं, वहां आई बाढ़ जैसी त्रासदी के बाद भी भविष्य सुधारने के लिए तालाब को सुरक्षित बनाने के लिए बजट न मिलना हतप्रभ करता है।
ऐसे ही गुनिया, पनरिया, ओड़िया आदि नालों/नदी की सफाई के नाम पर साल भर से चल रहा ड्रामा भी किसी से छुपा नहीं है। रसूखदारों,अवैध कॉलोनाइजरों और नेताओं के दवाब में नाले में स्थित एक भी अतिक्रमण नहीं हटाए गए न ही तालाब की सरकारी जमीन मुक्त हुई। वहीं नाले के मिट्टी को खोदकर नाले में ही किनारों पर डाला जा रहा है जो बारिश में फिर से नाले में ही सरक कर भर जाएगी। इस ड्रामे पर विधायक पन्नालाल शाक्य जी कई बार मंच से मुखर हो चुके हैं। लेकिन यहां किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता।
अब तो जो भी उम्मीद है वो केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया से ही है जो भी माफियाओं के खिलाफ हैं और पूर्व में मीटिंग में भी कह चुके हैं कि भूमाफिया कोई भी हो चाहे नेता या मेरे परिवार का सदस्य या नजदीकी भी हो तो कार्यवाही की जाए, में इसका पक्षधर नहीं हूं कि कार्यवाही में बख्शा जाए।क्योंकि अब जनता मुखर है चुनावों में सवाल करती है। यहां एक सवाल और खटकता है कि आखिर उनकी मेहनत के मोल को सिस्टम के लोग समझने तैयार क्यों नहीं है। और ऐसा भी क्यों है कि जनता के बीच ईमानदारी से काम करने वाले और फील्ड में कुछ अच्छा करने की चाहत रखने वाले अफसर ही बहाना मिलते ही क्यों हटा दिए जाते हैं, चाहे अशोकनगर से डीएम आदित्य सिंह हों या गुना से पूर्व कलेक्टर ही क्यों न हो? जबकि चिकनी चुपड़ी बातें करने वाले जनता के अलावा सबको पसंद आते हैं और जमे रहते हैं।
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