अघोरपीठ बाबा सत्यनाथ मठ कादीपुर में सैकड़ों वर्षों से मनायी जाती है मसाने की होली

श्याम चन्द्र श्रीवास्तव

Monday, March 2, 2026 - 23:56
Updated: 6 months ago
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अघोरपीठ बाबा सत्यनाथ मठ कादीपुर में सैकड़ों वर्षों से मनायी जाती है मसाने की होली

कादीपुर (आरएनआई) मसान की होली भारत के वाराणसी के बाद अघोरपीठ बाबा सत्यनाथ मठ अल्देमऊ नूरपुर कादीपुर सुलतानपुर के आदिगंगा गोमती तट स्थित महाश्मशान में मनाया जाने वाला एक विशिष्ट होली उत्सव है। यह मुख्य होली उत्सव से पहले होलिका दहन के दिन यहां मनाया जाता है।मठ के पीठाधीश्वर अवधूत उग्रचण्डेश्वर कपाली बाबा ने बताया कि मसान की होली का अर्थ है "श्मशान की होली" या "भभूत होली"। वाराणसी में भगवान शिव के भक्त सदियों से इस परंपरा का पालन करते आ रहे हैं।उसी के क्रम में यहां महाश्मशान में शैव मतावलंबियों, अघोरियों,भक्तों के साथ होलिका दहन से पूर्व मसान में भस्म, भभूत होली मनाई जाती है। यहां अबकी बार मसाने की होली 2 मार्च 2026 को सांयकाल 7 बजे से प्रारंभ होकर रात्रिकालीन सम्पन्न होगी। इस दिन भगवान महाश्मशानाथ अर्थात भोलेनाथ अपने गणों - भूत, प्रेत, पिशाच, यक्ष, गंधर्व और राक्षसों के साथ राख से होली खेलते हैं। शिवपुराण और दुर्गा सप्तशती में इसकी झलक मिलती है। यह उत्सव जीवन की क्षणभंगुरता, मोह-माया से मुक्ति और मृत्यु पर विजय का प्रतीक है।

यहां अघोर पीठ बाबा सत्यनाथ मठ में पारंपरिक तौर पर मसान होली को भगवान शिव के गणों का त्योहार माना जाता है।भगवान शिव के गण उनके रहस्यमय सेवक हैं और उन्हें अक्सर आत्माएं,भूत और तपस्वी बताया जाता है।असल में इसमें मुख्य रूप से अघोरी,नागा साधु, संन्यासी और भगवान शिव के स्थानीय भक्त शामिल होते हैं।अघोरी यहां श्मशान घाट पर इकट्ठा होते हैं और चिताओं की राख से होली खेलते हैं.सामान्य भक्त अबीर गुलाल और भस्म से खेलते हैं।

आम लोग भी इस अनोखे नजारे को देखने के लिए बड़ी संख्या में इकट्ठा होते हैं. हालांकि मसान होली कोई टूरिस्ट शो नहीं है।यह काफी आध्यात्मिक और संवेदनशील धार्मिक रस्म है जो यहां महाश्मशान पर होती है।मसान होली की जड़ें शैव पौराणिक कथाओं में है।मान्यता के मुताबिक रंगभरी एकादशी पर भगवान शिव देवी पार्वती का गौना कराने के बाद काशी लौटे थे।उन्होंने शहर में देवताओं और भक्तों के साथ होली मनाई।हालांकि उनके प्रिय गण जिन्हें शमशान की आत्मा और प्राणी माना जाता है इस रंगीन उत्सव में हिस्सा नहीं ले सके।

माना जाता है कि अगले दिन शिव रंगों के बजाय राख का इस्तेमाल करके उनके साथ होली खेलने के लिए शमशान गए थे।यह काम ईश्वरीय समानता और सभी तरह के अस्तित्व को स्वीकार करने का प्रतीक है।भस्म या फिर चिता की राख का इस्तेमाल करने का काफी गहरा मतलब होता है।यह वैराग्य और इस आखिरी सच को दिखाता है कि हर इंसान का शरीर राख बन जाता है। शमशान में होली मना कर, भक्त सांकेतिक रूप से मौत के डर पर जीत हासिल करते हैं और मौत को जीवन के चक्र का एक स्वाभाविक हिस्सा मानते हैं।

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