भ्रष्टाचार से मुक्ति के लिए सख्त कार्रवाई के साथ जरूरी है जागरूक समाज
भानु प्रकाश शर्मा
सरकार भ्रष्टाचार के खिलाफ भले कितने अभियान चला ले, लेकिन इसे जड़ से खत्म कर पाना बहुत ही दुष्कर काम है। ऐसा इसलिए है कि हमने भ्रष्टाचार को एक तरह से आत्मसात कर लिया है और मान बैठे हैं कि यह हमारे समाज, प्रशासन और सरकारों का अभिन्न हिस्सा बन चुका है। ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल इंडिया ने इस साल भारत में भ्रष्टाचार को लेकर बड़ा सर्वे कराया था। इस सर्वे के नतीजे बताते हैं कि साल भर में इक्यावन फीसद लोगों ने घूस देकर अपने काम करवाए। सबसे ज्यादा यानी छब्बीस फीसद लोगों को संपत्ति और भूमि संबंधी कामों के लिए घूस देनी पड़ी। बीस फीसद लोगों को पुलिस में पैसे खिलाने पड़े। इसी तरह नगर निगम, बिजली विभाग, जल विभाग, आरटीओ दफ्तर और अस्पताल ऐसे ठिकाने हैं जहां बिना लेन-देन के काम करा पाना संभव नहीं है और इन महकमों से आमजन का सीधा साबका पड़ता है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि देश में निचले स्तर पर किस कदर भ्रष्टाचार पसरा है और लोग पैसे देकर काम कराने को मजबूर होते हैं।
कहने को ज्यादातर सेवाएं ऑनलाइन कर दी गई हैं और इसका मकसद भी यह है कि लोगों को भ्रष्टाचार से मुक्ति मिल सके। लेकिन व्यावहारिक रूप से यह संभव नहीं हो पा रहा है। बड़ी समस्या यह है कि घूसखोरी और भ्रष्टाचार से संबंधित शिकायतों के लिए हमारे पास पुख्ता तंत्र का अभाव है। ज्यादातर लोगों को यह पता नहीं होता कि ऐसे मामलों की शिकायतें कहां की जाएं। जहां जांच होती भी है, वहां इसकी प्रक्रिया इतनी लंबी और जटिल है कि शिकायतकर्ता को इस तरह का कदम उठाना महंगा पड़ा जाता है। सरकारी दफ्तरों के चक्कर न काटने पड़ें और काम न रुके, इस डर के मारे लोग भी छोटे-मोटे कामों के लिए घूस देकर पिंड छुड़ाना बेहतर समझते हैं। पुलिस थाने और अदालतों में भ्रष्टाचार के किस्से कौन नहीं जानता? भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए सरकार को तो अपने स्तर पर कड़े कदम उठाने ही होंगे, साथ ही समाज को भी जागरूक बनने की जरूरत है।
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