‘जरूरत पड़ी तो पांच साल तक लड़ने को तैयार’, भारत में ईरानी नेता के प्रतिनिधि का बड़ा बयान
नई दिल्ली (आरएनआई)। पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच भारत में ईरान के सर्वोच्च नेता के प्रतिनिधि अब्दुल मजीद हकीम इलाही ने बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा कि यदि जरूरत पड़ी तो ईरान पांच साल तक भी संघर्ष करने के लिए तैयार है। उनका कहना है कि ईरान अपनी जमीन और संप्रभुता की रक्षा के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार है।
इलाही ने खाड़ी देशों में अमेरिका समर्थित ठिकानों को निशाना बनाए जाने को ईरान की मजबूरी बताया। उन्होंने कहा कि ईरान ने यह कदम आत्मरक्षा के तहत उठाया है, ताकि उन ठिकानों से होने वाले हमलों को रोका जा सके जिनका इस्तेमाल तेहरान के खिलाफ किया जा रहा था। उनके अनुसार अमेरिका ने ईरान के आसपास 33 से 45 सैन्य अड्डे बना रखे हैं और तेहरान ने पड़ोसी देशों से अनुरोध किया था कि इनका इस्तेमाल ईरान के खिलाफ न होने दिया जाए, लेकिन हमले जारी रहे।
उन्होंने अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के उस दावे को भी खारिज किया जिसमें कहा गया था कि संघर्ष के बीच ईरान बातचीत के लिए तैयार है। इलाही ने स्पष्ट कहा कि इस समय ईरान अमेरिका से किसी भी तरह की वार्ता नहीं करना चाहता। उनका कहना था कि अमेरिका ने ही युद्ध शुरू किया है और पहले भी बातचीत के दौरान ईरान पर हमले किए गए हैं।
इलाही ने यह भी स्वीकार किया कि पश्चिम एशिया के मौजूदा हालात के कारण ऊर्जा संकट पैदा हुआ है, जिससे लोगों को गैस, पेट्रोल और तेल की कमी का सामना करना पड़ रहा है। उन्होंने कहा कि इस स्थिति से किसी को खुशी नहीं है, लेकिन ईरान को अपनी रक्षा के लिए कदम उठाने पड़ रहे हैं। उन्होंने वैश्विक नेताओं से भी अमेरिका पर युद्ध रोकने के लिए दबाव बनाने की अपील की।
भारत के साथ संबंधों को लेकर इलाही ने कहा कि ईरान भारत के साथ गहरे और मजबूत रिश्ते चाहता है। उन्होंने बताया कि ईरान के दिवंगत सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई भारत से विशेष लगाव रखते थे और दोनों देशों के बीच सहयोग बढ़ाने पर जोर देते थे। इलाही के अनुसार खामेनेई भारतीयों की ईमानदारी, वफादारी और बुद्धिमत्ता की सराहना करते थे और चाहते थे कि भारत और ईरान के संबंध हमेशा मजबूत बने रहें।
इलाही ने यह भी बताया कि तनावपूर्ण हालात के बावजूद खामेनेई ने अपना घर छोड़कर किसी सुरक्षित बंकर में जाने से इनकार कर दिया था। उन्होंने अपने सहयोगियों और सुरक्षा अधिकारियों की सलाह भी नहीं मानी। उनका मानना था कि जब तेहरान के करीब 1.9 करोड़ नागरिक खतरे के बीच रह रहे हैं तो उन्हें भी उनके बीच ही रहना चाहिए।
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