'एक थे शिवराज, दूसरे नरोत्तम': धैर्य बनाम विरोध की राजनीति पर चर्चा
दतिया उपचुनाव चुनाव में भाजपा द्वारा नरोत्तम मिश्रा को टिकट न दिए जाने पर उनके द्वारा बवाल मचाया गया, दतिया बंद कराया गया हाईवे जाम किया गया जिससे जनता को काफी परेशानी झेलनी पड़ी।
यह खबर पढ़कर मुझे वह वाक्या याद आ गया जब विधानसभा चुनाव के बाद शिवराज सिंह को पुनः मुख्यमंत्री ना बना कर पर्ची से मोहन यादव को मुख्यमंत्री बना दिया गया तब शिवराज सिंह चौहान द्वारा एक परिपक्व राजनीतिज्ञ या जनसेवक की भांति इसे सहजता से स्वीकार कियागया, फलस्वरूप वे आज केंद्र में मंत्री होकर, राजनीति के शिखर पर भाजपा में लगभग टॉप 10 में है।
नरोत्तम मिश्रा ने जो बवाल मचाया है और दबाव बनाया है इसका असर मेरे अनुसार कथित रूप से विश्व की सबसे बड़ी पार्टी भाजपा पर पड़ने वाला नहीं है, हां नरोत्तम मिश्रा का भविष्य हासिये पर जा सकता है, यह तय है, इसलिये दादा को धैर्य से काम लेना चाहिए।
अतः मैं कहना चाहूंगा कि जन सेवा के बहाने से स्वयं के लिए राजनीति करना अपने परिवार को आगे बढ़ाना, यह सब छड़िक लाभ दे सकता है लेकिन दीर्घकालीन राजनीति के लिए शिवराज सिंह जैसा धैर्य आवश्यक है।
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