मेधा रूपम मामले की सुनवाई और जस्टिस शर्मा के बेटे के चुनाव आयोग से संबंध को लेकर उठे सवाल, रोस्टर पर भी चर्चा
नई दिल्ली। नोएडा की जिलाधिकारी मेधा रूपम की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई के बाद न्यायिक औचित्य और मामले की सूचीबद्धता को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं। 23 सितंबर को न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा और न्यायमूर्ति एनके सिंह की पीठ ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस आदेश पर अंतरिम रोक लगाई, जिसमें मेधा रूपम से जुड़े मामले में पांच लाख रुपये के मुआवजे और वेतन से वसूली का निर्देश दिया गया था।
मामला अप्रैल में नोएडा में हुए श्रमिक प्रदर्शन के दौरान एक छात्रा की राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत हिरासत से जुड़ा है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हिरासत के आदेश को रद्द करते हुए मेधा रूपम और अन्य अधिकारियों के संबंध में प्रतिकूल टिप्पणियां की थीं तथा मुआवजे का निर्देश दिया था। सुप्रीम कोर्ट में मेधा रूपम और उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से इन आदेशों को चुनौती दी गई।
इसी घटनाक्रम के बीच मामले की सूचीबद्धता को लेकर भी सवाल सामने आए। एक रिपोर्ट के अनुसार, 13 जुलाई 2026 से प्रभावी रोस्टर में निवारक हिरासत से जुड़े मामलों की नियमित सुनवाई न्यायमूर्ति शर्मा की पीठ के अधिकार क्षेत्र में नहीं थी। वहीं, श्रमिक प्रदर्शन से जुड़े अन्य मामलों की सुनवाई न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष पहले से चल रही थी। इसी वजह से मेधा रूपम की याचिका के न्यायमूर्ति शर्मा की पीठ के समक्ष सूचीबद्ध होने को लेकर सवाल उठाए गए।
इस मामले से जुड़ा एक अन्य तथ्य भी चर्चा में आया है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा के बेटे का मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में चुनाव आयोग से पेशेवर संबंध रहा है। ऐसे में न्यायमूर्ति शर्मा द्वारा चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े मामले की सुनवाई और मेधा रूपम की याचिका की सुनवाई को एक साथ रखकर न्यायिक औचित्य तथा संभावित हितों के टकराव को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं। हालांकि, केवल पारिवारिक पेशेवर संबंध अपने आप में यह साबित नहीं करता कि किसी न्यायिक निर्णय पर उसका प्रभाव पड़ा।
23 सितंबर को न्यायमूर्ति शर्मा ने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से संबंधित कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं के मामले में इसे संविधान पीठ के समक्ष भेजे जाने की आवश्यकता बताई। रिपोर्टों के अनुसार, उनका मत था कि संसद की कानून बनाने की शक्ति और संविधान के अनुच्छेद 324(2) से जुड़े महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्नों पर दो सदस्यीय पीठ के बजाय बड़ी पीठ द्वारा विचार किया जाना चाहिए।
उसी दिन न्यायमूर्ति शर्मा की अध्यक्षता वाली पीठ ने मेधा रूपम की याचिका पर भी अंतरिम राहत दी। सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश के कुछ हिस्सों पर रोक लगाई, जिसमें मेधा रूपम के वेतन से पांच लाख रुपये की वसूली और संबंधित प्रतिकूल टिप्पणियां शामिल थीं।
अब इस पूरे घटनाक्रम में मुख्य सवाल न्यायिक निष्पक्षता के प्रत्यक्ष आभास, मामलों की सूचीबद्धता और संभावित हितों के टकराव से जुड़े हैं। यह स्पष्ट नहीं है कि न्यायमूर्ति शर्मा ने संबंधित सुनवाइयों के दौरान अपने बेटे के चुनाव आयोग से पेशेवर संबंध का कोई खुलासा किया था या नहीं। उपलब्ध रिपोर्टों में इस संबंध में कोई स्पष्ट जानकारी सामने नहीं आई है।
इसलिए फिलहाल इन तथ्यों से किसी अनुचित प्रभाव का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। हालांकि, मामले की सूचीबद्धता और न्यायमूर्ति शर्मा के पारिवारिक पेशेवर संबंध को लेकर उठे सवालों के कारण न्यायिक औचित्य और पारदर्शिता पर सार्वजनिक चर्चा जरूर तेज हुई है।
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