काशी में अवधूत बाबा कीनाराम की 427वीं जयंती पर योगिनी चक्र एवं श्मशान पीठ पूजन, साधना परंपरा का दिखा अनूठा स्वरूप
वाराणसी। परम पूज्य अवधूत बाबा कीनाराम जी की 427वीं जयंती के अवसर पर अघोर चतुर्दशी पर्व पर हरिश्चंद्र घाट स्थित अघोर पीठ में विशेष धार्मिक एवं आध्यात्मिक आयोजन किया गया। परम पूज्य अवधूत उग्र चंडेश्वर कपाली बाबा, पीठाधीश्वर, के सानिध्य में योगिनी चक्र पूजन एवं श्मशान पीठ पूजन संपन्न हुआ। आयोजन में साधकों और श्रद्धालुओं ने अघोर परंपरा से जुड़े विभिन्न धार्मिक एवं आध्यात्मिक अनुष्ठानों में सहभागिता की।

अघोर साधना परंपरा में श्मशान को केवल मृत्यु का स्थान नहीं, बल्कि जीवन, मृत्यु और आत्मतत्व के गहन चिंतन के आध्यात्मिक स्थल के रूप में देखा जाता है। काशी का हरिश्चंद्र घाट प्राचीन काल से ही विभिन्न धार्मिक और साधना परंपराओं से जुड़ा रहा है। अघोर चतुर्दशी के अवसर पर यहां आयोजित श्मशान पीठ पूजन को इसी प्राचीन आध्यात्मिक परंपरा की महत्वपूर्ण कड़ी माना जाता है।


आयोजन के दौरान मंत्र-जप, पूजन और विभिन्न आध्यात्मिक विधियों के माध्यम से साधना परंपरा के प्रति श्रद्धा व्यक्त की गई। इस अवसर पर कपाली बाबा ने अघोर साधना की परंपरा और उसके आध्यात्मिक पक्ष पर प्रकाश डालते हुए कहा कि अघोर दर्शन में जीवन के बाहरी भेदभाव से ऊपर उठकर समत्व, करुणा और आत्मबोध को महत्वपूर्ण माना गया है।
योगिनी चक्र पूजन भी आयोजन का प्रमुख आकर्षण रहा। अघोर एवं शाक्त साधना परंपराओं में योगिनी शक्तियों को शक्ति के विभिन्न स्वरूपों और आध्यात्मिक ऊर्जा से जोड़ा जाता है। इस अवसर पर 12 वर्ष की साधना पूर्ण कर चुके साधकों को मुंडमाला दीक्षा तथा 24 वर्ष की साधना पूर्ण कर चुके साधकों का पूर्णाभिषेक पूजन किया गया। इन अनुष्ठानों को साधना की दीर्घकालिक परंपरा से जुड़ा महत्वपूर्ण संस्कार बताया गया।



श्मशान पीठ पूजन के माध्यम से साधना परंपरा में जीवन की नश्वरता, भय और मृत्यु के बोध से ऊपर उठकर आत्मचिंतन की ओर बढ़ने के दर्शन को सामने रखा गया। हरिश्चंद्र घाट पर हुए इस आयोजन ने काशी की उस आध्यात्मिक संस्कृति की झलक प्रस्तुत की, जहां गंगा तट, मंदिर, घाट और श्मशान अलग-अलग धार्मिक एवं साधना परंपराओं को अपने भीतर समेटे हुए हैं।
अघोर चतुर्दशी के इस विशेष आयोजन को लेकर साधकों और देश-विदेश से आए श्रद्धालुओं में विशेष उत्साह देखने को मिला। योगिनी चक्र पूजन एवं श्मशान पीठ पूजन के माध्यम से काशी की प्राचीन अघोर साधना परंपरा, आध्यात्मिक चेतना और सनातन धार्मिक विरासत के प्रति श्रद्धा व्यक्त की गई। आयोजन ने काशी की बहुआयामी आध्यात्मिक परंपरा के एक अनूठे स्वरूप को भी सामने रखा।
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