सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी, कहा- फुटपाथ पर पहला हक पैदल चलने वालों का
सुप्रीम कोर्ट ने फुटपाथ को लेकर अहम टिप्पणी करते हुए कहा है कि सड़कों पर पैदल चलने वालों के लिए सुरक्षित और स्पष्ट रूप से चिह्नित जगह होना जरूरी है। अदालत ने कहा कि फुटपाथ मानव जीवन का अभिन्न हिस्सा हैं और उन पर पैदल यात्रियों का अधिकार सर्वोपरि है।
सोमवार को जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को मामले में पक्षकार बनाया और केंद्र सरकार के निर्देशों के पालन को लेकर उनसे जवाब मांगा। पीठ ने कहा कि जहां सड़क है, वहां पैदल चलने वालों के लिए अलग और स्पष्ट जगह उपलब्ध होनी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि फुटपाथ पर अतिक्रमण नहीं होना चाहिए और इसे वाहन मार्ग से सुरक्षित तरीके से अलग किया जाना चाहिए, ताकि पैदल चलने वाले लोग बिना किसी डर के आवागमन कर सकें।
19 जून के फैसले में भी कोर्ट ने कहा था कि चिह्नित फुटपाथ पर चलना नागरिक का मौलिक अधिकार है। यह संविधान के अनुच्छेद 19(1)(डी) के तहत आवागमन की स्वतंत्रता और अनुच्छेद 21 के तहत जीवन तथा व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार से जुड़ा है। कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि फुटपाथ पर पैदल चलने वालों का अधिकार मोटर वाहनों की आवाजाही से ऊपर है।
अदालत ने यह भी कहा कि नगर निकायों, शहरी विकास प्राधिकरणों और पंचायतों की जिम्मेदारी है कि वे फुटपाथ का निर्माण, सीमांकन और रखरखाव सुनिश्चित करें। साथ ही फुटपाथ को अतिक्रमण से मुक्त रखना भी संबंधित स्थानीय निकायों की जिम्मेदारी है।
सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक, यदि किसी नागरिक के फुटपाथ के अधिकार का उल्लंघन होता है तो वह संवैधानिक और कानूनी उपायों का सहारा ले सकता है। ऐसे मामलों में परिस्थितियों के अनुसार मुआवजे की मांग भी की जा सकती है।
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