350 साल पुरानी परंपरा: जन्माष्टमी पर भगवान कृष्ण को पालने में झुलाने उमड़ती है भीड़, काशी से आते हैं नए वस्त्र
चतरा। झारखंड के चतरा जिले के पत्थलगड़ा प्रखंड के बरवाडीह-दुम्बी गांव स्थित ठाकुरबाड़ी मंदिर में जन्माष्टमी का पर्व करीब 350 साल पुरानी परंपरा के साथ मनाया जाता है। यहां जन्माष्टमी की मध्यरात्रि में भगवान श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप को पालने में झुलाने की विशेष रस्म निभाई जाती है। इस परंपरा में शामिल होने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु मंदिर पहुंचते हैं और भगवान को पालने में झुलाने के लिए अपनी बारी का इंतजार करते हैं।
बताया जाता है कि ठाकुरबाड़ी में जन्माष्टमी मनाने की यह परंपरा 17वीं शताब्दी में तिवारी परिवार ने शुरू की थी। इसी दौरान परिवार की ओर से ठाकुरबाड़ी मंदिर का निर्माण कराया गया था। मंदिर में राधा-कृष्ण, सीता-राम समेत कई देवी-देवताओं की अष्टधातु से बनी प्राचीन प्रतिमाएं स्थापित हैं। पीढ़ियां बदलती रहीं, लेकिन तिवारी परिवार और स्थानीय लोगों की आस्था इस परंपरा से आज भी जुड़ी हुई है।
काशी से आते हैं भगवान के नए वस्त्र
जन्माष्टमी से पहले ठाकुरबाड़ी मंदिर को विशेष रूप से सजाया जाता है। मंदिर में स्थापित भगवान श्रीकृष्ण, राधा रानी और अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमाओं को नए वस्त्र और आभूषण पहनाए जाते हैं। भगवान के लिए नए वस्त्र काशी यानी बनारस से मंगाए जाते हैं। वस्त्र पहुंचने के बाद पुजारी विधि-विधान से प्रतिमाओं की साफ-सफाई कर उन्हें नए वस्त्र धारण कराते हैं।
मध्यरात्रि में शुरू होती है पालना झुलाने की रस्म
जन्माष्टमी की रात मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं की भीड़ बढ़ने लगती है। मध्यरात्रि में तिवारी समाज के लोगों के साथ बड़ी संख्या में श्रद्धालु मंदिर में एकत्र होते हैं। वैदिक मंत्रोच्चारण के बीच भगवान श्रीकृष्ण और राधा रानी की पूजा-अर्चना की जाती है। इसके बाद भगवान श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप को पालने में विराजमान कराया जाता है।
पालना झुलाने की रस्म शुरू होते ही श्रद्धालुओं में उत्साह बढ़ जाता है। लोग अपनी बारी का इंतजार करते हैं और भगवान के बाल स्वरूप को पालने में झुलाकर सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। इस दौरान मंदिर परिसर में भक्ति और आस्था का विशेष माहौल देखने को मिलता है।
रातभर गूंजते हैं सोहर और पारंपरिक गीत
जन्माष्टमी की रात ठाकुरबाड़ी मंदिर में महिलाएं सोहर और भगवान श्रीकृष्ण के जन्म से जुड़े पारंपरिक गीत गाती हैं। भजन और लोकगीतों के बीच रातभर भक्तिमय वातावरण बना रहता है। अगले दिन भगवान श्रीकृष्ण को जगाने की विशेष रस्म निभाई जाती है। जागरण के बाद श्रद्धालुओं के बीच महाप्रसाद वितरित किया जाता है।
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