अघोर परंपरा में गुरु-शिष्य का रिश्ता गहन, भक्त का मार्ग पूर्ण भक्ति पर आधारित

Sunday, September 7, 2025 - 14:53
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अघोर परंपरा में गुरु-शिष्य का रिश्ता गहन, भक्त का मार्ग पूर्ण भक्ति पर आधारित

कादीपुर (आरएनआई)। अघोर परंपरा में गुरु-शिष्य और भक्त की भूमिका को लेकर अक्सर सवाल उठते हैं। इस परंपरा में शिष्य और भक्त दोनों ही साधना और आध्यात्मिकता से जुड़े होते हैं, लेकिन उनकी राहें अलग मानी जाती हैं।

शिष्य का मार्ग – सत्य और ज्ञान की खोज
अघोर परंपरा में शिष्य गुरु से ज्ञान प्राप्त करने के लिए विद्यार्थी की तरह होता है। वह सवाल करता है, सत्य की खोज करता है और अज्ञानता से मुक्ति पाना चाहता है। शिष्य गुरु को केवल शिक्षक नहीं, बल्कि आध्यात्मिक संरक्षक मानता है। इस रिश्ते में आस्था तो है, लेकिन अंध-विश्वास नहीं। शिष्य का उद्देश्य अनुभव और ज्ञान के आधार पर मोक्ष की ओर बढ़ना होता है।

भक्त का मार्ग – आस्था और समर्पण
इसके विपरीत, भक्त का मार्ग पूरी तरह आस्था पर आधारित होता है। भक्त अपने आराध्य या देवी-देवता में गहरी श्रद्धा रखता है और कर्मकांडों का पालन बिना सवाल किए करता है। उसकी साधना में सवालों की जगह भक्ति और समर्पण का भाव होता है। भक्त प्रभु की आराधना में लीन होकर अक्सर अकेलेपन में भी भक्ति करता है। 

संक्षेप में अंतर
जहाँ शिष्य का मुख्य उद्देश्य ज्ञान प्राप्त कर अज्ञानता से मुक्ति पाना है, वहीं भक्त का लक्ष्य ईश्वर में अटूट आस्था और भक्ति का अभ्यास है। शिष्य सवाल पूछकर सत्य को समझना चाहता है, जबकि भक्त अपने आराध्य की महिमा का निस्वार्थ भाव से स्वीकार करता है।

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Subir Sen

Founder, RNI News

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