‘लंबे समय तक जेल में रहना जमानत का आधार नहीं’, सुप्रीम कोर्ट ने उमर खालिद और शरजील इमाम को राहत देने से किया इनकार

Monday, January 5, 2026 - 12:53
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‘लंबे समय तक जेल में रहना जमानत का आधार नहीं’, सुप्रीम कोर्ट ने उमर खालिद और शरजील इमाम को राहत देने से किया इनकार

नई दिल्ली (आरएनआई)। सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2020 के दिल्ली दंगा मामले में आरोपी उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत देने से इनकार कर दिया है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट कहा कि केवल लंबे समय तक जेल में बंद रहना जमानत का स्वतः आधार नहीं बन सकता, खासकर जब आरोप गंभीर हों और यूएपीए जैसे कानून के तहत मामला दर्ज हो।

जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की पीठ ने अपने फैसले में कहा कि उमर खालिद और शरजील इमाम की स्थिति इस मामले के अन्य आरोपियों से अलग है। कोर्ट ने यह भी कहा कि ट्रायल में देरी को “ट्रंप कार्ड” की तरह इस्तेमाल कर वैधानिक सुरक्षा प्रावधानों को कमजोर नहीं किया जा सकता। ऐसा करने से कानून द्वारा तय की गई शर्तें स्वतः निष्प्रभावी हो जाएंगी, जो न्यायिक संतुलन के लिए ठीक नहीं है।

अदालत ने माना कि दोनों आरोपियों के खिलाफ गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम कानून (यूएपीए) के तहत प्रथम दृष्टया गंभीर आरोप बनते हैं और इस स्तर पर उन्हें जमानत देना उचित नहीं होगा। हालांकि, कोर्ट ने इसी मामले के अन्य आरोपियों गुलफिशा फातिमा, मीरान हैदर, शिफा उर रहमान, मोहम्मद सलीम खान और शादाब अहमद को जमानत दे दी।

इससे पहले 10 दिसंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने सभी आरोपियों की जमानत याचिकाओं पर सुनवाई के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था और दोनों पक्षों से दस्तावेज जमा कराने को कहा था। आज आए फैसले में कोर्ट ने स्पष्ट किया कि गंभीर राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों में केवल हिरासत की अवधि को आधार बनाकर राहत नहीं दी जा सकती।

उमर खालिद के पिता इलियास ने फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उन्हें इस पर कुछ नहीं कहना है और अदालत का फैसला सबके सामने है।

दिल्ली पुलिस ने अदालत में कहा था कि उमर खालिद, शरजील इमाम और अन्य आरोपी फरवरी 2020 में हुई हिंसा की साजिश में शामिल थे। पुलिस के अनुसार, नागरिकता संशोधन कानून और एनआरसी के खिलाफ चल रहे प्रदर्शनों की आड़ में यह हिंसा भड़काई गई, जिसमें 53 लोगों की मौत हुई और 700 से अधिक लोग घायल हुए थे।

दिल्ली के उत्तर-पूर्वी इलाकों में फरवरी 2020 में हुई इस हिंसा को देश की राजधानी में हाल के वर्षों की सबसे गंभीर सांप्रदायिक घटनाओं में से एक माना जाता है, और यह मामला अब भी देश की न्यायिक और राजनीतिक बहस के केंद्र में बना हुआ है।

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