संभल हिंसा मामला: सुप्रीम कोर्ट ने मुल्ला अफरोज की NSA हिरासत रद्द की, यूपी सरकार पर 10 लाख रुपये का जुर्माना
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने संभल हिंसा मामले में मुल्ला अफरोज की नेशनल सिक्योरिटी एक्ट (NSA) के तहत की गई प्रिवेंटिव डिटेंशन को रद्द कर दिया है। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने मंगलवार को मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि किसी आरोपी का कबूलनामा अकेले उसे एनएसए के तहत हिरासत में रखने का आधार नहीं बन सकता। कोर्ट ने गैरकानूनी हिरासत आदेश पारित करने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार पर 10 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति को एहतियाती हिरासत में लेने वाले अधिकारी को मामले से जुड़ी अन्य परिस्थितियों पर भी स्वतंत्र रूप से विचार करना जरूरी है। अदालत ने पाया कि मुल्ला अफरोज के मामले में अधिकारियों ने सभी संबंधित परिस्थितियों पर उचित विचार नहीं किया और अपनी शक्तियों का गलत इस्तेमाल किया। इसी आधार पर कोर्ट ने उसकी प्रिवेंटिव डिटेंशन को रद्द कर दिया।
उत्तर प्रदेश पुलिस ने अक्टूबर 2025 में संभल में वर्ष 2024 में हुई सांप्रदायिक हिंसा में कथित भूमिका के आरोप में मुल्ला अफरोज के खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत कार्रवाई की थी। इसके बाद उसे एहतियाती हिरासत में रखा गया था। मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने हिरासत के आधार और अधिकारियों द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया की जांच की और इसे कानून के अनुरूप नहीं पाया।
अदालत ने गैरकानूनी प्रिवेंटिव डिटेंशन का आदेश पारित करने के लिए राज्य सरकार पर 10 लाख रुपये का जुर्माना लगाया। फैसला सुनाते समय जस्टिस दीपांकर दत्ता ने अपने लॉ क्लर्क को भी श्रद्धांजलि दी, जिनका निधन उनके 27वें जन्मदिन से चार दिन पहले हो गया था।
नेशनल सिक्योरिटी एक्ट केंद्र और राज्य सरकारों को ऐसे मामलों में किसी व्यक्ति को एहतियाती हिरासत में लेने की शक्ति देता है, जहां संबंधित व्यक्ति की गतिविधियों से भारत की सुरक्षा या अन्य निर्धारित सार्वजनिक हितों को खतरा होने की आशंका हो। इसके तहत हिरासत की अधिकतम अवधि 12 महीने तक हो सकती है, हालांकि परिस्थितियों के अनुसार इसे इससे पहले भी समाप्त किया जा सकता है। ऐसे मामलों में हिरासत के आदेश की समीक्षा के लिए हाईकोर्ट के पूर्व जज की अध्यक्षता वाले सलाहकार बोर्ड की व्यवस्था है। NSA के तहत कार्रवाई प्रिवेंटिव डिटेंशन होती है, इसलिए यह सामान्य आपराधिक गिरफ्तारी से अलग होती है।
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