वाराणसी में 400 करोड़ के अस्पताल का मामला: बीआर शेट्टी की कंपनी के प्रोजेक्ट से लेकर बैंक ऑफ बड़ौदा के 5,700 करोड़ रुपये के समझौते तक उठे सवाल
वाराणसी। वाराणसी में करीब 400 करोड़ रुपये की लागत से 500 से 600 बेड का सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल बनाने की योजना को लेकर एक बार फिर सवाल उठ रहे हैं। यह परियोजना यूएई के एनआरआई कारोबारी बीआर शेट्टी की कंपनी ‘बीआर लाइफ’ से जुड़ी थी। प्रस्ताव के तहत कबीर चौरा मठ की जमीन पर अस्पताल बनाए जाने की योजना थी और इसके लिए समझौता भी किया गया था।
योजना के अनुसार अस्पताल का निर्माण सितंबर 2019 तक पूरा किया जाना था, लेकिन निर्धारित समय बीतने के बाद भी परियोजना जमीन पर आगे नहीं बढ़ सकी। प्रारंभिक कार्यों के लिए करीब 24 करोड़ रुपये की सरकारी राशि जारी किए जाने का भी उल्लेख सामने आया है। इसके बावजूद अस्पताल का निर्माण पूरा नहीं हो सका।
इसी बीच वर्ष 2020 में बीआर शेट्टी द्वारा स्थापित एनएमसी हेल्थ वित्तीय संकट में फंस गई। कंपनी के खातों की जांच के बाद अरबों डॉलर के पहले से घोषित न किए गए कर्ज और वित्तीय अनियमितताओं का खुलासा हुआ। बाद में एनएमसी समूह से जुड़े मामले में कई देशों में कानूनी कार्रवाई शुरू हुई।
इस कानूनी विवाद में बैंक ऑफ बड़ौदा भी शामिल हुआ। एनएमसी समूह के संयुक्त प्रशासकों ने बैंक पर वित्तीय लेनदेन और कर्ज से जुड़ी व्यवस्थाओं में कथित लापरवाही के आरोप लगाए थे। बैंक ने इन आरोपों को स्वीकार नहीं किया था। मामला अबू धाबी ग्लोबल मार्केट और ब्रिटेन की अदालतों तक पहुंचा।
जुलाई 2026 में बैंक ऑफ बड़ौदा ने एनएमसी समूह के संयुक्त प्रशासकों के साथ 600 मिलियन डॉलर यानी करीब 5,700 करोड़ रुपये के समझौते की घोषणा की। बैंक के अनुसार यह समझौता लंबे समय से चल रहे कानूनी विवाद को समाप्त करने के लिए किया गया और इसमें बैंक की ओर से किसी तरह की देनदारी या गलत काम स्वीकार नहीं किया गया है।
समझौते के बाद बैंक ऑफ बड़ौदा के शेयरों में भी गिरावट दर्ज की गई। हालांकि, 5,700 करोड़ रुपये का भुगतान सीधे तौर पर करदाताओं के पैसे की ‘लूट’ या किसी घोटाले में दोष सिद्ध होने के रूप में पेश करना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा, क्योंकि यह एक कानूनी समझौता था और बैंक ने किसी गलत काम की जिम्मेदारी स्वीकार नहीं की है।
वाराणसी की अस्पताल परियोजना और एनएमसी से जुड़े बाद के विवाद दो अलग-अलग घटनाक्रम हैं। दोनों के बीच संबंधों और सरकारी धन के इस्तेमाल को लेकर उठाए जा रहे सवालों पर तथ्यात्मक जांच जरूरी है। फिलहाल उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर बैंक ऑफ बड़ौदा का 5,700 करोड़ रुपये का भुगतान एनएमसी से जुड़े कानूनी विवाद के निपटारे का हिस्सा था।
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