पानी के फिल्टर से लेकर आरओ और एल्कलाइन वाटर तक, कितना जरूरी है जरूरत के हिसाब से पानी को शुद्ध करना?
पहले घरों में वाटर फिल्टर आया। लोगों को बताया गया कि यह पानी में मौजूद बैक्टीरिया और दूसरी अशुद्धियों से बचाने में मदद करेगा। इसके बाद आरओ का चलन बढ़ा और यह कहा गया कि जो वायरस और बैक्टीरिया सामान्य फिल्टर से नहीं छन पाते, उन्हें आरओ की तकनीक से हटाया जा सकता है।
समय के साथ आरओ सिस्टम में यूवी और अलग-अलग तरह की झिल्लियां यानी मेंब्रेन भी जुड़ती गईं। इनके जरिए पानी को और अधिक शुद्ध करने का दावा किया गया। इसके बाद एल्कलाइन वाटर और एल्कलाइन फिल्टर बाजार में आए। आरओ से अत्यधिक शुद्ध किए गए पानी में दोबारा मिनरल्स मिलाने की तकनीक भी सामने आई। इसके बाद कंगेन वाटर और दूसरे तरह के एल्कलाइन वाटर की चर्चा शुरू हुई।
इसी बीच पानी को जरूरत से ज्यादा फिल्टर करने को लेकर भी सवाल उठने लगे। तर्क दिया जाने लगा कि पानी से जरूरत से ज्यादा खनिज और अन्य तत्व निकाल देना भी उचित नहीं हो सकता। खास तौर पर बहुत कम टीडीएस वाले पानी को लंबे समय तक पीने को लेकर कई तरह के दावे किए जाते हैं। इन दावों में यह भी कहा जाता है कि बहुत कम टीडीएस वाला पानी शरीर के लिए नुकसानदायक हो सकता है और इसका असर हड्डियों, दांतों तथा शरीर की अन्य व्यवस्थाओं पर पड़ सकता है।
दावा यह भी किया जाता है कि कम टीडीएस वाला पानी, जैसा कि आरओ या बोतलबंद पानी में पाया जाता है, लंबे समय तक इस्तेमाल करने पर शरीर को आवश्यक खनिजों से वंचित कर सकता है। इसी आधार पर आरओ बेचने वाली कंपनियों की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए जाते हैं कि उपभोक्ता के घर में आने वाले पानी की वास्तविक गुणवत्ता जाने बिना उसे जरूरत से ज्यादा फिल्ट्रेशन वाला सिस्टम बेच दिया जाता है।
शहरों में बढ़ते प्रदूषण के कारण सीधे नल का पानी पीना भी कई लोगों के लिए चिंता का विषय बन गया है। पानी के स्रोत और आसपास की स्थिति के आधार पर उसमें अलग-अलग तरह की अशुद्धियां हो सकती हैं। ऐसे में समस्या यह है कि उपभोक्ता को अक्सर यह पता नहीं होता कि उसके घर के पानी में वास्तव में किन चीजों को हटाने की जरूरत है और कौन से तत्व पानी में बने रहने चाहिए।
यही वजह है कि पानी को लेकर सबसे जरूरी सवाल केवल यह नहीं होना चाहिए कि उसे कितना ज्यादा फिल्टर किया जाए, बल्कि यह भी होना चाहिए कि उस पानी में क्या मौजूद है और उसे वास्तव में किस स्तर तक शुद्ध करने की जरूरत है। जरूरत से ज्यादा फिल्ट्रेशन के बाद पानी में मिनरल्स दोबारा मिलाने वाली तकनीकों का इस्तेमाल भी इसी सवाल को सामने लाता है।
इस पूरे मामले में एक बात पर विशेष ध्यान देने की जरूरत बताई जाती है कि जिस तरह किसी बीमारी के इलाज से पहले जांच कराई जाती है, उसी तरह घर में आरओ या कोई अन्य फिल्टर लगाने से पहले पानी की जांच करानी चाहिए। पानी की गुणवत्ता और उसमें मौजूद तत्वों की जानकारी मिलने के बाद उसी के अनुसार फिल्ट्रेशन सिस्टम का चुनाव किया जाना चाहिए, न कि केवल ज्यादा फिल्टर वाले महंगे सिस्टम को ही बेहतर मान लिया जाए।
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