छाता में एथनॉल प्लांट का विरोध, किसानों ने चीनी मिल शुरू कराने की मांग उठाई; तथ्यों के आधार पर फैसला लेने की अपील
गोपाल चतुर्वेदी
छाता। मथुरा के छाता क्षेत्र में बंद पड़ी चीनी मिल को दोबारा शुरू कराने की मांग को लेकर किसानों का आंदोलन जारी है। किसान प्रस्तावित एथनॉल प्लांट से पहले चीनी मिल को शुरू कराने की मांग कर रहे हैं। वहीं प्रदेश सरकार ने बंद मिल परिसर में एथनॉल प्लांट स्थापित करने की योजना को मंजूरी दी है। इसे लेकर क्षेत्र में किसान हित, रोजगार, विकास और पर्यावरण से जुड़े मुद्दों पर बहस तेज हो गई है।
प्रस्तावित परियोजना की लागत 200 करोड़ रुपये से अधिक बताई जा रही है। योजना के तहत पहले चरण में एथनॉल उत्पादन शुरू करने और गन्ने की उपलब्धता बढ़ने के बाद चीनी उत्पादन की व्यवस्था किए जाने की बात सामने आई है। इसके बाद बिजली उत्पादन की योजना भी बताई गई है। एथनॉल उत्पादन में गन्ने के शीरे के साथ मक्का और धान जैसे कच्चे माल के इस्तेमाल की भी जानकारी सामने आई है।
एथनॉल प्लांट को लेकर क्षेत्र में कैंसर और प्रदूषण संबंधी आशंकाएं भी जताई जा रही हैं। हालांकि, किसी भी औद्योगिक परियोजना से स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभाव का आकलन वैज्ञानिक तथ्यों, प्रदूषण नियंत्रण व्यवस्था और अपशिष्ट प्रबंधन के आधार पर किया जाना चाहिए। केवल एथनॉल प्लांट के नाम के आधार पर उसे कैंसर का कारण बताना उचित नहीं होगा। यदि परियोजना से प्रदूषण या अनुपचारित अपशिष्ट निकलने की आशंका है तो उसकी स्वतंत्र और वैज्ञानिक जांच कराई जानी चाहिए।
इसी तरह चीनी मिल के संचालन से जुड़े बॉयलर का धुआं, राख और अपशिष्ट जल भी पर्यावरणीय निगरानी के दायरे में आते हैं। इसलिए क्षेत्र के लोगों की चिंताओं को दूर करने के लिए हवा, पानी और मिट्टी की नियमित जांच तथा उसके परिणाम सार्वजनिक करना जरूरी होगा।
किसानों की चीनी मिल दोबारा शुरू कराने की मांग को भी गंभीरता से देखा जाना चाहिए। गन्ने की खरीद, किसानों की आय, स्थानीय रोजगार और क्षेत्र की आर्थिक गतिविधियां इससे सीधे जुड़ी हैं। वहीं सरकार की प्रस्तावित परियोजना से मिलने वाले संभावित रोजगार और औद्योगिक लाभों की जानकारी भी जनता के सामने पारदर्शी तरीके से रखी जानी चाहिए।
छाता में विकास को लेकर अंतिम फैसला किसानों और ग्रामीणों की चिंताओं, पर्यावरणीय सुरक्षा और क्षेत्र की आर्थिक जरूरतों को ध्यान में रखकर होना चाहिए। सरकार को परियोजना से जुड़ी पूरी जानकारी और प्रदूषण नियंत्रण की व्यवस्था स्पष्ट करनी चाहिए, जबकि किसानों की आशंकाओं का समाधान वैज्ञानिक रिपोर्ट और तथ्यों के आधार पर किया जाना चाहिए। क्षेत्र को अफवाह और भय के बजाय पारदर्शिता, संवाद और जवाबदेही की जरूरत है।
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