खाली कुर्सी और लंबित मुकदमों का पहाड़: सिर्फ आश्वासन से नहीं चलेगा काम, न्यायाधिकरण सुधार बिल जड़ पर प्रहार
देश के न्यायाधिकरणों में बढ़ते लंबित मामलों और खाली पड़े पदों ने न्याय व्यवस्था के सामने बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है। एक समान कार्यकाल, तय सेवानिवृत्ति आयु और योग्यता आधारित चयन की व्यवस्था ही ऐसे न्यायाधिकरणों में सक्षम लोगों को आकर्षित करने और उन्हें लंबे समय तक बनाए रखने का रास्ता हो सकती है।
एवीजे हाइट्स के फ्लैट मालिक वर्षों से एक आदेश का इंतजार कर रहे हैं। उनके बिल्डर एवीजे डेवलपर्स के खिलाफ 2019 में दिवाला प्रक्रिया शुरू हुई थी। लेनदारों ने 4 जुलाई 2024 को पुनरुद्धार योजना को मंजूरी दी। इसके आठ दिन बाद योजना राष्ट्रीय कंपनी विधि अधिकरण के सामने पहुंच गई, लेकिन करीब दो साल बाद भी मामला लंबित रहा।
अप्रैल 2026 में सुप्रीम कोर्ट की नजर इस मामले पर पड़ी तो मामला केवल एक आवासीय परियोजना तक सीमित नहीं रहा। अदालत ने देशभर के आंकड़े मंगाए। इससे पता चला कि एनसीएलटी की विभिन्न पीठों के सामने पुनरुद्धार योजनाओं की मंजूरी से जुड़े 383 आवेदन लंबित थे। इन मामलों में देरी 48 दिन से लेकर 738 दिन तक थी। जबकि दिवाला एवं दिवालियापन संहिता में ऐसे मामलों के लिए 330 दिनों की अधिकतम समयसीमा तय है।
यह स्थिति कानून की कमी से ज्यादा न्यायाधिकरणों की क्षमता से जुड़ी समस्या को दिखाती है। कानून ने समयसीमा तय कर दी, लेकिन उसे लागू करने के लिए पर्याप्त संस्थागत क्षमता उपलब्ध नहीं है।
समस्या का पैमाना भी बड़ा है। लोकसभा में दिए गए जवाब के अनुसार, 2025 में 16 प्रमुख न्यायाधिकरणों में करीब 5.36 लाख मामले लंबित थे। इनमें सबसे ज्यादा 2.45 लाख मामले ऋण वसूली अधिकरणों में थे।
सवाल यह नहीं है कि न्यायाधिकरण पूरी तरह सफल हैं या विफल। असली कसौटी यह है कि जिन संस्थाओं को अदालतों का बोझ कम करने और विशेषज्ञ तरीके से मामलों का निपटारा करने के लिए बनाया गया था, क्या वे अपने उद्देश्य को पूरा कर पा रही हैं। मौजूदा आंकड़े कई मामलों में इसका जवाब नकारात्मक देते हैं।
अक्सर एक खाली कुर्सी से शुरू होती है देरी
न्यायाधिकरणों में रिक्तियां केवल प्रशासनिक समस्या नहीं हैं। पर्याप्त सदस्यों के बिना पीठ का गठन नहीं हो सकता और पीठ उपलब्ध नहीं होने पर मामलों की सुनवाई भी आगे नहीं बढ़ती। ऐसे में किसी पद का खाली रहना सीधे तौर पर लंबित मामलों की संख्या बढ़ा सकता है।
सरकार की ओर से इन पदों को भरने में देरी पर सुप्रीम कोर्ट भी सवाल उठा चुका है। ऐसे में केवल नए आश्वासन पर्याप्त नहीं होंगे। जरूरत ऐसी व्यवस्था की है जिसमें रिक्तियों और नियुक्तियों में होने वाली देरी स्पष्ट रूप से दिखाई दे, जिम्मेदारी तय हो और समय पर सुधार किया जा सके।
न्यायाधिकरण सुधार विधेयक, 2026 इसी समस्या के मूल कारणों को दूर करने की कोशिश करता है। विधेयक में पांच साल का कार्यकाल तय करने और अध्यक्ष के लिए 70 वर्ष तथा सदस्य के लिए 67 वर्ष की सेवानिवृत्ति आयु निर्धारित करने का प्रस्ताव है।
ये प्रावधान मद्रास बार एसोसिएशन से जुड़े मामलों में सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय किए गए मानकों के अनुरूप बताए गए हैं। नवंबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट चार वर्ष के कार्यकाल और 50 वर्ष की न्यूनतम आयु से जुड़े प्रावधानों को रद्द कर चुका है।
तय सेवानिवृत्ति आयु के साथ पांच साल का कार्यकाल विशेषज्ञों के लिए न्यायाधिकरणों को अधिक स्थिर करियर विकल्प बना सकता है। इससे ऐसे पेशेवरों को भी न्यायाधिकरणों में आने का अवसर मिलेगा, जो इसके लिए अपनी मौजूदा प्रैक्टिस या नौकरी छोड़ने पर विचार करते हैं।
विधेयक में चयन प्रक्रिया को भी लगातार चलने वाली व्यवस्था बनाने का प्रस्ताव है। इसके लिए एक स्थायी सचिवालय रिक्तियों पर नजर रखेगा, पदों का विज्ञापन करेगा और उम्मीदवारों की पात्रता की जांच करेगा। महत्वपूर्ण बात यह है कि संबंधित प्रशासनिक मंत्रालय, जो कई बार उन्हीं न्यायाधिकरणों के सामने पक्षकार होता है, इस जांच प्रक्रिया से बाहर रहेगा।
न्यायाधिकरणों की व्यवस्था तभी प्रभावी हो सकती है, जब कुर्सियां समय पर भरें, सक्षम लोगों का चयन हो और उन्हें पर्याप्त कार्यकाल मिले। न्याय मिलने में देरी को केवल आश्वासनों से नहीं, बल्कि संस्थागत सुधारों से दूर किया जा सकता है। यही न्यायाधिकरण सुधार विधेयक, 2026 की सबसे बड़ी जरूरत और चुनौती है।
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