यूपी में उच्च शिक्षा की ‘मंडी’ बना राजभवन? गोरखपुर पर उंगली, अपने फैसलों पर खामोशी

Monday, August 10, 2026 - 21:15
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यूपी में उच्च शिक्षा की ‘मंडी’ बना राजभवन? गोरखपुर पर उंगली, अपने फैसलों पर खामोशी

उत्तर प्रदेश के विश्वविद्यालयों की बदहाली पर सवाल उठ रहे हैं, लेकिन अब सवाल विश्वविद्यालयों की चारदीवारी से निकलकर राजभवन तक पहुंच गया है। राज्यपाल आनंदीबेन पटेल ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के गृह जनपद गोरखपुर में उच्च शिक्षा की स्थिति पर चिंता जताई है, लेकिन उनके अपने करीब सात साल के कार्यकाल में कुलपतियों को लेकर लिए गए फैसले भी अब सवालों के घेरे में हैं।

सवाल यह नहीं है कि राजभवन ने किसी कुलपति के खिलाफ कार्रवाई की या नहीं। कार्रवाई हुई है। असली सवाल यह है कि कार्रवाई की कसौटी क्या रही? एक कुलपति पर वित्तीय और प्रशासनिक अनियमितताओं के आरोप लगे तो उन्हें पद से हटा दिया गया और जांच बैठा दी गई। वहीं दूसरे कुलपति के खिलाफ एफआईआर दर्ज हुई, एसटीएफ जांच हुई और मामला सीबीआई तक पहुंचा, फिर भी वे पद पर बने रहे और बाद में राजभवन की ओर से सम्मानित भी किए गए।

विनय कुमार पाठक का मामला इसी विरोधाभास को सामने लाता है। 29 अक्टूबर 2022 को उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज हुई थी। शिकायत में आगरा विश्वविद्यालय में परीक्षा संबंधी कार्यों के बकाये बिलों को मंजूर कराने के बदले कथित तौर पर एक करोड़ 41 लाख रुपये की कमीशन राशि मांगने का आरोप लगाया गया था। मामले की जांच एसटीएफ को सौंपी गई और बाद में उत्तर प्रदेश सरकार ने सीबीआई जांच की सिफारिश की। जनवरी 2023 में सीबीआई ने भी एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने उनकी एफआईआर रद्द करने की याचिका भी खारिज कर दी थी।

यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि एफआईआर या जांच किसी व्यक्ति को दोषी साबित नहीं करती। दोष साबित करने का अधिकार अदालत का है। लेकिन सवाल यह है कि इतनी गंभीर जांच के दौरान राजभवन ने उनके मामले को किस कसौटी पर देखा।

मामला तब और चर्चा में आया जब मई 2023 में तत्कालीन राज्यपाल आनंदीबेन पटेल ने डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम प्राविधिक विश्वविद्यालय में पाठक के पुराने कार्यकाल से जुड़ी एक विश्वविद्यालयीय जांच को रद्द कर दिया। राजभवन का तर्क था कि विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलपति को अपने पूर्व कुलपति के खिलाफ ऐसी जांच शुरू करने का अधिकार नहीं था और यह अधिकार कुलाधिपति के पास था।

इसके बाद दिसंबर 2023 में छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय को नैक से ए++ ग्रेड मिलने पर पाठक और उनकी टीम को सम्मानित किया गया। अदालत में चल रही आपराधिक प्रक्रिया और विश्वविद्यालयीय जांच को अलग-अलग कानूनी संदर्भों में देखा जाना चाहिए, लेकिन राजभवन के इस रवैये ने जरूर यह सवाल खड़ा किया कि गंभीर आरोपों और जांचों के बीच किसी कुलपति के प्रति संस्थागत व्यवहार की कसौटी क्या होनी चाहिए।

अब आगरा विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलपति अशोक कुमार मित्तल का मामला देखिए। जुलाई 2021 में वित्तीय और प्रशासनिक अनियमितताओं की शिकायतों के बाद आनंदीबेन पटेल ने उन्हें उनके सभी दायित्वों से अलग कर दिया था। उनके खिलाफ तीन सदस्यीय जांच समिति भी गठित की गई, जिसकी अध्यक्षता सेवानिवृत्त उच्च न्यायालय के न्यायाधीश को सौंपी गई थी। राजभवन की ओर से जिन आरोपों का उल्लेख किया गया, उनमें नियमों को दरकिनार कर नियुक्तियां, ऑडिट आपत्तियों की अनदेखी, अदालत में लंबित मामलों में पर्याप्त कार्रवाई न करना और कर्मचारियों को अतिरिक्त समय का भुगतान जैसे मामले शामिल थे।

मित्तल ने इन आरोपों को गलत बताते हुए अदालत का दरवाजा खटखटाया था। यानी यहां भी अंतिम न्यायिक दोषसिद्धि नहीं हुई थी। इसके बावजूद राजभवन ने जांच पूरी होने तक उन्हें पद से अलग कर दिया।

यहीं से सवाल और गंभीर हो जाता है। एक तरफ प्रशासनिक और वित्तीय शिकायतों के आधार पर कुलपति को पद से हटाकर जांच बैठाई गई, दूसरी तरफ एफआईआर, एसटीएफ और सीबीआई जांच का सामना कर रहे कुलपति पद पर बने रहे और बाद में राजभवन के मंच से सम्मानित भी हुए।

किसी को दोषी या निर्दोष घोषित करना इस लेख का उद्देश्य नहीं है। सवाल केवल इतना है कि क्या दोनों मामलों में राजभवन की कसौटी समान थी?

प्रोफेसर पीके मिश्रा का मामला भी इसी बहस को आगे बढ़ाता है। फरवरी 2023 में आनंदीबेन पटेल ने उन्हें कुलपति पद से हटाकर दूसरे विश्वविद्यालय से संबद्ध कर दिया था। बाद में उन्होंने इस्तीफा दे दिया। यह कहना तथ्य से आगे जाना होगा कि उनका हटाया जाना केवल पाठक प्रकरण के कारण हुआ, लेकिन घटनाक्रम यह जरूर दिखाता है कि उसी दौर में राजभवन ने अलग-अलग कुलपतियों के मामलों में अलग-अलग तरह के हस्तक्षेप किए।

अब मामला किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय की कुलपति प्रोफेसर सोनिया नित्यानंद के दूसरे कार्यकाल का है। उन्हें तीन साल का दूसरा कार्यकाल दिया गया है, जो विश्वविद्यालय के इतिहास में किसी कुलपति को मिला पहला दूसरा कार्यकाल बताया जा रहा है।

यहां भी सवाल उनकी योग्यता पर नहीं है। सवाल उनके पहले कार्यकाल के दौरान उठे विवादों के राजभवन द्वारा किए गए मूल्यांकन पर है।

किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय में 112 शिक्षकों की नियुक्तियों में आरक्षण रोस्टर को लेकर सवाल उठे और मामला उत्तर प्रदेश विधानमंडल की संयुक्त समिति तक पहुंचा। समिति ने विश्वविद्यालय से दस्तावेज मांगे और कुलपति समेत अधिकारियों को अपना पक्ष रखना पड़ा। इसे अभी भर्ती घोटाला कहना जल्दबाजी होगी, क्योंकि अंतिम जांच निष्कर्ष सामने आना बाकी है। लेकिन इतना जरूर है कि मामला इतना गंभीर था कि विधानमंडलीय समिति को इसकी पड़ताल करनी पड़ी।

इसी कार्यकाल में रमीजुद्दीन प्रकरण भी सामने आया, जिसमें एक महिला चिकित्सक ने यौन उत्पीड़न और धर्म परिवर्तन के दबाव जैसे गंभीर आरोप लगाए। इन आरोपों के आधार पर सोनिया नित्यानंद को दोषी ठहराना उचित नहीं होगा, लेकिन किसी कुलपति के प्रशासनिक कार्यकाल का मूल्यांकन करते समय ऐसे विवादों को पूरी तरह नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता।

यही वजह है कि दूसरा कार्यकाल दिए जाने का आधार सार्वजनिक बहस का विषय बन गया है। क्या राजभवन ने 112 नियुक्तियों से जुड़े विवाद, आरक्षण रोस्टर पर उठे सवाल और विश्वविद्यालय की आंतरिक प्रक्रियाओं का पूरा मूल्यांकन किया? यदि किया, तो उस मूल्यांकन के आधार क्या थे? और यदि जांच अभी निर्णायक निष्कर्ष तक नहीं पहुंची थी, तो दूसरा कार्यकाल देने के पीछे राजभवन ने किन मानकों को प्राथमिकता दी?

उत्तर प्रदेश में उच्च शिक्षा की बदहाली कोई नई समस्या नहीं है। लेकिन राज्यपाल के अपने कार्यकाल के फैसलों को लेकर सवाल इसलिए ज्यादा महत्वपूर्ण हैं क्योंकि यहां तुलना किसी दूसरे शासनकाल से नहीं, बल्कि एक ही राजभवन द्वारा लिए गए अलग-अलग फैसलों से हो रही है।

एक ही राजभवन के सामने किसी कुलपति के खिलाफ शिकायत आई तो जांच बैठी और पद से हटाया गया। किसी के खिलाफ विश्वविद्यालयीय जांच शुरू हुई तो उसे अधिकार क्षेत्र के आधार पर रद्द कर दिया गया। किसी के खिलाफ एफआईआर, एसटीएफ और सीबीआई जांच तक पहुंची, फिर भी वह पद पर बना रहा और बाद में सम्मानित हुआ। अब एक अन्य कुलपति को विवादों और जांच के बीच दूसरा कार्यकाल मिल गया।

कुलपति दोषी हैं या निर्दोष, यह अदालत तय करेगी। लेकिन कुलपति की नियुक्ति, उसके कामकाज का मूल्यांकन और उसके कार्यकाल का विस्तार अदालत नहीं, राजभवन तय करता है।

इसलिए सवाल अदालत से पहले राजभवन से है।

आखिर एक ही राज्यपाल के सामने कुलपतियों के लिए तराजू एक ही है, या नाम बदलते ही बाट भी बदल जाते हैं?

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