सच लिखने वालों की सबसे बड़ी लड़ाई अब अपनी पहचान बचाने की है
जितेन्द्र भारद्वाज
पत्रकार को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है। वह दूसरों के दर्द, अन्याय और संघर्ष को समाज के सामने लाता है, लेकिन विडंबना यह है कि आज वही पत्रकार अपने अस्तित्व, सम्मान और पहचान की लड़ाई लड़ने को मजबूर है। जो दूसरों के लिए न्याय की मांग करता है, उसके अपने अधिकारों की बात करने वाला शायद ही कोई दिखाई देता है।
देश के हजारों छोटे शहरों और कस्बों में ऐसे पत्रकार काम कर रहे हैं, जिन्होंने वर्षों तक बिना किसी सुविधा के पत्रकारिता की। उन्होंने अपनी जेब से खर्च किया, दिन-रात मेहनत की, जोखिम उठाए और हर परिस्थिति में खबरों को जनता तक पहुंचाया। कई बार सच लिखने की कीमत धमकियों, मुकदमों और सामाजिक दबाव के रूप में भी चुकाई। फिर भी उन्होंने अपने कर्तव्य से समझौता नहीं किया।
दुर्भाग्य यह है कि जिन संस्थानों को उन्होंने मजबूत बनाया, उन्हीं संस्थानों में कई बार उन्हें सबसे कम महत्व मिला। खबरें भी उन्हीं से चाहिए, विज्ञापन भी वही लाएं, लेकिन बदले में न तय मानदेय, न सामाजिक सुरक्षा और कई मामलों में तो वर्षों तक कोई आधिकारिक पहचान तक नहीं।
आज जब फर्जी पत्रकारों के खिलाफ कार्रवाई की बात होती है, तब सबसे पहले शक की निगाह उन्हीं लोगों पर पड़ती है जो वर्षों से ईमानदारी से काम कर रहे हैं। सवाल यह नहीं है कि फर्जी पत्रकारों पर कार्रवाई हो या नहीं—कार्रवाई जरूर होनी चाहिए। लेकिन क्या कभी उन संस्थानों की भी जवाबदेही तय होगी जिन्होंने अपने संवाददाताओं से वर्षों तक काम लिया, पर उन्हें बुनियादी पहचान और अधिकार तक नहीं दिए?
सोशल मीडिया ने हालात कुछ बदले हैं। अब पत्रकार अपनी बात सीधे लोगों तक पहुंचा सकते हैं। लेकिन इससे एक नई चुनौती भी सामने आई है। असली और नकली के बीच की रेखा धुंधली होती जा रही है। ऐसे समय में जरूरत है कि ईमानदार पत्रकारों की पहचान सुरक्षित रहे और उनकी विश्वसनीयता पर बिना कारण सवाल न उठाए जाएं।
यह भी स्वीकार करना होगा कि पत्रकारिता के नाम पर ब्लैकमेलिंग, वसूली और निजी स्वार्थ साधने वालों ने इस पेशे को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया है। ऐसे लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी ही चाहिए। लेकिन कुछ लोगों की गलतियों की सजा पूरे पत्रकार समाज को नहीं मिलनी चाहिए।
आज आवश्यकता केवल फर्जी पत्रकारों की पहचान करने की नहीं, बल्कि असली पत्रकारों को उनका अधिकार दिलाने की भी है। वर्षों से काम कर रहे संवाददाताओं को पहचान पत्र, उचित मानदेय, बीमा, सामाजिक सुरक्षा और सम्मान मिलना चाहिए। यह कोई विशेष सुविधा नहीं, बल्कि उनके श्रम और योगदान का न्यूनतम सम्मान है।
जब सच लिखने वाला व्यक्ति ही अपने अस्तित्व को साबित करने में समय लगाने लगे, तब लोकतंत्र की बुनियाद कमजोर होने लगती है। इसलिए अब समय आ गया है कि पत्रकारों के वास्तविक मुद्दों पर गंभीर चर्चा हो और व्यवस्था ऐसे बदलाव की ओर बढ़े, जहां ईमानदार पत्रकार को अपनी पहचान साबित न करनी पड़े, बल्कि उसके काम से ही उसकी पहचान हो।
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