पुस्तक पंजीयन कानून को मुंह चिढ़ाती पीडीएफ प्रथा! बिना पंजीयन के अखबार और विज्ञापन का कारोबार?

राजेन्द्र सिंह जादौन

Friday, October 16, 2026 - 11:23
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पुस्तक पंजीयन कानून को मुंह चिढ़ाती पीडीएफ प्रथा! बिना पंजीयन के अखबार और विज्ञापन का कारोबार?

कलेक्टर साहब! मंत्री, सांसद और विधायकों की जी-हुजूरी से कभी फुर्सत मिल जाए तो अपने जिले में निकलने वाले अखबारों की कुंडली भी खंगाल लीजिए। पता चल जाएगा कि आपके जिले में पत्रकारिता हो रही है या अखबार के नाम पर विज्ञापन का कारोबार!

आजकल सोशल मीडिया का जमाना है। कंप्यूटर पर कुछ खबरें तैयार कीजिए, एआई की मदद लीजिए, पीडीएफ बनाइए और घोषणा कर दीजिए कि हमारा अखबार निकलता है। न छापाखाने की जरूरत, न अखबार छपने का झंझट और न ही वितरण की चिंता। मोबाइल पर पीडीएफ भेजकर अखबार का रुतबा भी हासिल कर लीजिए और सरकारी विज्ञापनों की कतार में खड़े होने का रास्ता भी तलाश लीजिए!

वाह रे डिजिटल पत्रकारिता! कागज पर अखबार छापने वालों को कानून, पंजीयन और दूसरी औपचारिकताओं का हिसाब रखना पड़े, लेकिन पीडीएफ की फाइल लेकर घूमने वालों से कोई यह पूछने वाला नहीं कि भाई साहब, आपके प्रकाशन की कानूनी हैसियत क्या है?

सवाल तकनीक का नहीं है। पीडीएफ में अखबार प्रकाशित करना अपने आप में अपराध नहीं है। सवाल यह है कि जिस प्रकाशन के लिए कानून के तहत पंजीयन जरूरी है, क्या वह पंजीकृत है? क्या वह संबंधित नियमों का पालन कर रहा है? और यदि नहीं, तो फिर अखबार के नाम पर विज्ञापन हासिल करने की कोशिश किस आधार पर की जा रही है?

कलेक्टर साहब, अखबार की पीडीएफ तो दिख रही है, उसका पंजीयन कहां है? देश में प्रेस और पत्र-पत्रिकाओं के पंजीयन की कानूनी व्यवस्था है। अब प्रेस एवं पत्र-पत्रिका पंजीकरण अधिनियम, 2023 और उससे संबंधित नियम लागू हैं। इसलिए यह देखना जरूरी है कि कौन-सा प्रकाशन किस कानूनी श्रेणी में आता है और उस पर कौन-सी शर्तें लागू होती हैं। हर डिजिटल प्रकाशन पर प्रिंट अखबार वाले नियम लागू मान लेना उचित नहीं होगा, लेकिन जहां पंजीयन अनिवार्य है, वहां उसका पालन भी अनिवार्य होना चाहिए।

जिले में प्रकाशित होने वाले समाचार पत्रों की वैधानिक स्थिति की जांच करने में जिला प्रशासन और संबंधित अधिकारियों की भूमिका महत्वपूर्ण है। कलेक्टर कार्यालय तथा जनसंपर्क विभाग को अपने-अपने अधिकार क्षेत्र और निर्धारित प्रक्रियाओं के अनुसार यह देखना चाहिए कि सरकारी विज्ञापन, मान्यता अथवा दूसरी सुविधाओं के लिए प्रस्तुत दस्तावेज सही हैं या नहीं।

मध्यप्रदेश में कई जिला जनसंपर्क अधिकारी पत्रकारों से उनके अखबार के पंजीयन संबंधी प्रमाणपत्र मांग रहे हैं। यह अच्छी पहल है। दस्तावेज मांगने में बुराई नहीं है, बल्कि यह व्यवस्था की पारदर्शिता के लिए जरूरी है। लेकिन सवाल यह है कि जांच का दायरा केवल उन पत्रकारों तक सीमित क्यों रहे, जो सरकारी कार्यालयों में पहुंचते हैं? उन प्रकाशनों की भी जांच होनी चाहिए, जो पीडीएफ के नाम पर अखबार चलाने का दावा करते हैं और जिनके पंजीयन की स्थिति संदिग्ध है।

आखिर नियमों की जांच केवल उसी की होगी, जो सामने आकर दस्तावेज दिखाएगा? जो सामने नहीं आएगा, वह अपने आप पाक-साफ मान लिया जाएगा?

छोटे पत्रकारों के सपनों पर भारी विज्ञापन का खेल!

गांवों और कस्बों में काम करने वाले छोटे पत्रकार बड़ी मुश्किल से अपनी पत्रकारिता चलाते हैं। कोई अपनी मोटरसाइकिल में पेट्रोल भरवाने के लिए परेशान है, कोई खबर भेजने के लिए मोबाइल का रिचार्ज कराने के पैसे जुटाता है और कोई महीनों तक बिना किसी आर्थिक लाभ के जनता की समस्याएं उठाता रहता है।

इन ग्रामीण पत्रकारों को उम्मीद होती है कि किसी स्थापित अखबार से जुड़कर उनकी खबरों को जगह मिलेगी, उनकी पहचान बनेगी और वे जनता की आवाज बन सकेंगे। लेकिन जब अखबार के नाम पर केवल पीडीएफ चलाकर बाजार में विज्ञापन हासिल करने की होड़ शुरू होती है, तो ईमानदारी से काम करने वाले पत्रकारों के सामने प्रतिस्पर्धा की एक असमान स्थिति पैदा हो सकती है।

जिसे अखबार छापने, वितरित करने और अपना प्रकाशन व्यवस्थित ढंग से चलाने में खर्च करना पड़ता है, उसकी तुलना उस व्यक्ति से कैसे होगी, जो केवल पीडीएफ तैयार करके खुद को अखबार का संचालक बताता है? यदि कोई व्यक्ति कानूनी औपचारिकताओं से बचकर विज्ञापन पाने की कोशिश कर रहा है, तो इसका नुकसान उन लोगों को भी हो सकता है, जो नियमों का पालन करके पत्रकारिता कर रहे हैं।

यहां सवाल हर पीडीएफ प्रकाशित करने वाले का विरोध करने का नहीं है। सवाल उन लोगों की जवाबदेही का है, जो अखबार के नाम का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन जहां जरूरी हो वहां निर्धारित पंजीयन और दूसरी कानूनी शर्तों का पालन नहीं करते।

पत्रकारिता या विज्ञापन जुटाने का धंधा?

आज पत्रकारिता के सामने सबसे बड़ा संकट यह है कि खबरों की विश्वसनीयता से ज्यादा महत्व कहीं-कहीं विज्ञापन जुटाने को दिया जाने लगा है। अखबार का उद्देश्य जनता की समस्याओं को सामने लाना, सत्ता से सवाल पूछना और व्यवस्था की खामियों को उजागर करना होना चाहिए। लेकिन यदि किसी प्रकाशन का मुख्य उद्देश्य केवल विज्ञापन हासिल करना बन जाए, तो फिर पत्रकारिता की मूल भावना कहां बचेगी?

सरकारी विज्ञापन जनता के पैसे से दिए जाते हैं। इसलिए उनके वितरण में पारदर्शिता, पात्रता और निर्धारित नियमों का पालन होना चाहिए। किसी प्रकाशन को केवल इसलिए पात्र नहीं मान लिया जाना चाहिए कि उसने अपना नाम अखबार रख लिया है। उसी तरह किसी वैध डिजिटल प्रकाशन को केवल पीडीएफ प्रारूप में होने के कारण गलत भी नहीं ठहराया जा सकता।

जांच का आधार स्पष्ट होना चाहिए—कानून क्या कहता है, पंजीयन कहां जरूरी है, दस्तावेज सही हैं या नहीं और विज्ञापन के लिए निर्धारित पात्रता पूरी होती है या नहीं।

अगर कोई प्रकाशन नियमों के विरुद्ध काम कर रहा है, तो जांच करके उचित कार्रवाई कीजिए। अगर कोई पत्रकार वैधानिक रूप से काम कर रहा है, तो उसे अनावश्यक परेशान मत कीजिए। कानून का उद्देश्य पत्रकारिता को कुचलना नहीं, बल्कि व्यवस्था में जवाबदेही सुनिश्चित करना होना चाहिए।

कलेक्टर साहब, एक सूची इनकी भी बनवा दीजिए!

जिले में कौन-कौन से समाचार पत्र प्रकाशित हो रहे हैं? किनका पंजीयन है? कौन-से प्रकाशन केवल डिजिटल माध्यम से खबरें प्रसारित करते हैं? किसे किस श्रेणी में रखा जाना चाहिए? और सरकारी विज्ञापन प्राप्त करने के लिए कौन-से नियम लागू होते हैं? इन सवालों के जवाब प्रशासन के पास स्पष्ट होने चाहिए।

जहां पंजीयन अनिवार्य है, वहां उसका सत्यापन किया जाए। जहां विज्ञापन के लिए पात्रता निर्धारित है, वहां उसकी जांच हो। और जहां कानून का उल्लंघन मिलता है, वहां निष्पक्ष कार्रवाई हो। यह काम किसी पत्रकार को निशाना बनाकर नहीं, बल्कि एक समान प्रक्रिया के तहत होना चाहिए।

पत्रकार साथियों से भी निवेदन है कि वे जिस अखबार से जुड़ रहे हैं, उसकी पंजीयन संबंधी स्थिति जरूर जांचें। केवल आईडी कार्ड, पदनाम, लोगो या मोबाइल पर आने वाली पीडीएफ देखकर किसी प्रकाशन की वैधानिकता पर भरोसा न करें। संबंधित आधिकारिक अभिलेखों में जानकारी की पुष्टि करें और समझें कि उस प्रकाशन पर कौन-से नियम लागू होते हैं।

आखिर पत्रकारिता केवल अखबार का नाम लिख देने से नहीं होती। इसके लिए विश्वसनीयता, जिम्मेदारी और कानून के प्रति सम्मान भी जरूरी है।

कलेक्टर साहब, आप जिले की कानून-व्यवस्था संभालते हैं। अब जरा अखबारों की व्यवस्था पर भी नजर डालिए। कहीं ऐसा न हो कि नियमों का पालन करने वाला पत्रकार प्रमाणपत्रों की फाइल लेकर दफ्तरों के चक्कर लगाता रहे और दूसरी तरफ कोई पीडीएफ लेकर विज्ञापन की दुनिया में अपनी दुकान चमकाता रहे।

क्योंकि सवाल पीडीएफ का नहीं, उस पीडीएफ के नाम पर चल रहे कारोबार का है। सवाल पत्रकारिता का नहीं, पत्रकारिता की आड़ में नियमों को दरकिनार करने का है।

और हां साहब, अगर कानून सबके लिए बराबर है, तो जांच भी सबकी होनी चाहिए। वरना अखबार छापने वाले नियमों का पालन करते रहेंगे और विज्ञापन के बाजार में केवल पीडीएफ बेचने वाले बाजी मारते रहेंगे!

मेरा आखिरी सवाल यही है—जिले में असली पत्रकारिता की जांच होगी या केवल दस्तावेज दिखाने वाले पत्रकारों की?

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