मीडिया के संवैधानिक चेहरे का अभाव भारतीय लोकतंत्र व चुनावी प्रक्रिया के लिए भस्मासुर बना
शैलेन्द्र कुमार बिराणी
वर्तमान में वोट चोरी देश का सबसे बड़ा मुद्दा बना हुआ है। इसके माध्यम से चुनावी प्रक्रिया और देश के लोकतंत्र के खत्म होने की चर्चा जोरों पर है। साइंटिफिक-एनालिसिस के विज्ञान वाले तकनीकी आधार से समझें तो लोकतंत्र के खत्म होने का मुख्य कारण मीडिया का संवैधानिक चेहरा व जवाबदेही वाले अधिकार न होना है, जो इसके लिए भस्मासुर बन गया है।
यह सच्चाई हम वर्षों से बता रहे हैं और राष्ट्रपति, उच्चतम न्यायालय सहित कई संस्थानों को विधिवत रूप से भेज चुके हैं, परंतु संवैधानिक पदों पर बैठे सभी लोग इस भस्मासुर के सहभागी बन लोकतंत्र को खत्म कर रहे हैं।
भारतीय लोकतंत्र संविधान के आधार पर चलता है, परंतु संविधान की अलग-अलग मर्यादा बताकर सही पदासीन लोकतंत्र की जड़ें खोदने में सबसे आगे बने रहना चाहते हैं। वोट चोरी को लेकर इंडिया गठबंधन ने मुख्य न्यायाधीश से मिलकर ज्ञापन देने की बात कही तो उन्होंने ईमेल से जवाब देकर संवैधानिक मर्यादा को पूरा नहीं माना और मीडियाकर्मियों के सामने आकर सार्वजनिक रूप से बयान दिया। इसके विपरीत, संवैधानिक रूप से मुख्य न्यायाधीश से नीचे मुख्य चुनाव आयुक्त पर वोट चोरी का आरोप लगता है तो वह उसी संविधान की मर्यादा बताकर न तो प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हैं और न ही मीडियाकर्मियों के सामने आकर बयान देते हैं।
लोकसभा में विपक्ष के नेता कई सांसदों के साथ जब मुख्य चुनाव आयुक्त से मिलने चुनाव आयोग जाते हैं तो उन्हें रास्ते में रोक दिया जाता है। यह काम तथाकथित भारत सरकार ने कराया या चुनाव आयुक्त ने करवाया? इसके बाद चुनाव आयुक्त शाम को प्रेस नोट जारी करते हैं। जब न्यूज़ चैनल और मीडिया के माध्यम सिर्फ मनोरंजन के माध्यम हैं और इनका संवैधानिक प्रारूप नहीं है तो चुनाव आयोग के कर्मचारी और चुनाव आयुक्त ड्यूटी के समय टेलीविजन व इंटरनेट देखकर मनोरंजन क्यों कर रहे थे?
इंडियन एक्सप्रेस की खबर पर देशभर में विपक्ष का प्रतिरोध शुरू हो जाता है और जब यह बात उच्चतम न्यायालय के सामने आती है तो न्यायाधीश क्यों कहते हैं कि यह आधा सत्य भी हो सकता है? अर्थात् मीडिया का कोई भी चैनल, प्रकाशन, रेडियो या ऑनलाइन न्यूज़ पोर्टल कहीं से भी झूठ बताकर देश में बवाल और जनता को प्रदर्शन के लिए सड़कों पर लाकर आम लोगों का दैनिक जीवन दुश्वार व बर्बाद कर सकता है। इसके बाद जाँचा और परखा जाएगा कि यह सच था या झूठ। समय रहते मीडिया की एक रिपोर्ट बनने व संवैधानिक कार्यवाही शुरू होने के लिए उसका संवैधानिक चेहरा चाहिए।
चुने हुए सांसदों के माध्यम से देश की आधी जनता सड़कों पर थी तो राष्ट्रपति का राष्ट्रीय संबोधन क्यों नहीं आया? यह सिर्फ राष्ट्रीय पर्वों पर मियाँ-मिट्ठू बनने के लिए होता है। प्रधानमंत्री असंवैधानिक रूप से या झूठ की बिसात पर राष्ट्रपति के राष्ट्रीय संबोधन का अधिकार हड़पकर कई बार संबोधित कर चुके हैं तो वे जनता के वोटिंग अधिकार यानी लोकतंत्र की मूल आत्मा के लिए क्यों नहीं सामने आए? राष्ट्रपति ने जब इंडिया गठबंधन से मुलाकात की और वोट चोरी के सबूत माँगे तो प्रेस कॉन्फ्रेंस कर मीडिया में जो भी सच्चाई बताई और मरे लोगों के जिंदा होने के सबूत पर बात कराई, वह सभी बेईमानी निकली। फॉर्म 6 को लेकर प्रेस विज्ञप्ति में दिया आधिकारिक कागज व मुख्य न्यायाधीश का बयान, सब कुछ संविधान के लिए कोरे कागज हो गए।
उच्चतम न्यायालय के तीन न्यायाधीश न्यायपालिका को बचाने के लिए जब हाथ जोड़कर मीडिया के माध्यम से जनता के सामने आए थे, तब ये लोग मीडिया की रिपोर्ट को झूठ के नज़रिए से देखते हैं और संवैधानिक रूप से कानूनी नहीं मानते। तो यह सब सड़कों पर रायता फैलाना ही माना जाएगा।
देश में कोई भी भारतीय मीडिया नहीं है। जो हैं, वे निजी कंपनियाँ और सरकारी तौर पर ट्रस्ट हैं। इसलिए चुनाव से पहले चुनाव आयोग की प्रेस कॉन्फ्रेंस, राष्ट्रपति का संबोधन, मुख्य न्यायाधीश का मीडिया में वक्तव्य व बयान देना, यह सब एक दिखावा है, ताकि देश व देशवासी झूठ के गुब्बार में उलझकर, फँसकर, चिल्ला-चिल्लाकर बर्बाद होते रहें और पदासीन लोग ऐशो-आराम की ज़िंदगी जीते रहें। मीडिया के माध्यम से स्वतः कोई कानूनी व संवैधानिक प्रक्रिया शुरू नहीं होती है तो बुद्धिजीवियों, सेवानिवृत्त कर्मचारियों व अनुभवी और सम्मानित लोगों का मीडिया में आकर बोलना व लिखना सब कुछ नौटंकी और तमाशा है।
मीडिया को भारतीय नाम, संवैधानिक चेहरा और जवाबदेही वाले अधिकार दिए जाएँ तो वोट चोरी जैसे गंभीर आरोप के बाद भी देश की सड़कों की रफ्तार, करोड़ों-अरबों रुपये के बाज़ार का नुकसान, मेट्रो-ट्रेनों जैसी मूलभूत सुविधाएँ बाधित व पंगु नहीं हो सकतीं। इससे कोई भी संवैधानिक मर्यादा का चोला ओढ़कर मीडिया के माध्यम से जनता के सवालों से नहीं बच सकता।
मीडिया का संवैधानिक चेहरा क्या है? वह किस तरह से गठित होता है, काम कैसे करेगा, यह सब हम पहले ही विस्तार से स्टेप-बाय-स्टेप बता चुके हैं। समय रहते तुरंत यह नहीं किया गया तो भारतवासी झूठ के गुब्बार में उलझकर, लड़कर, सड़कों पर संघर्ष और सार्वजनिक माध्यमों के अवरुद्ध होने से खत्म हो जाएँगे और देश का लोकतंत्र खत्म हो जाएगा।
कई न्यूज़ चैनल व प्लेटफॉर्म पहले दिन से मुख्य चुनाव आयुक्त से प्रेस कॉन्फ्रेंस करने की बात कर रहे हैं, ताकि सारी समस्याएँ खत्म हो जाएँ। मीडिया से जुड़े लोग मानसिक रूप से गुलाम हैं। ये आपस में ‘मैं पहले, मैं पहले’ के नाम पर एक-दूसरे की टाँग खींचकर गिरा सकने के अलावा कुछ नहीं कर सकते। इनमें राष्ट्रीयता, पत्रकारिता के प्रति समर्पण, संविधान व लोकतंत्र के प्रति श्रद्धा होती और अपने साथी लोगों के प्रति इंसानियत होती तो उन्हें पुलिस के अत्याचार का भोग न बनाकर संगठित होकर कहते कि यदि मुख्य चुनाव आयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं करते तो वे भविष्य में चुनाव आयोग की किसी भी प्रेस कॉन्फ्रेंस को कवर नहीं करेंगे और न ही दिखाएँगे, चाहे वह किसी चुनाव से ही संबंधित क्यों न हो। मीडिया के संवैधानिक चेहरे के बाद इस तरह के बहिष्कार की जरूरत नहीं पड़ेगी। जब राष्ट्रीयता व मानवता ही नहीं हो तो मीडिया का संवैधानिक चेहरा व जवाबदेही का अधिकार लेकर भी देश, लोकतंत्र, संविधान और आज़ादी को बनाए रखने के लिए कुछ नहीं कर सकते।
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