अमेरिका से दूरी के बीच भारत-कनाडा व्यापार समझौते की तैयारी तेज, 2026 में डील की उम्मीद
भारत और कनाडा के बीच व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौते (सीईपीए) को लेकर बातचीत तेज हो गई है। दोनों देश इस साल के अंत तक समझौते पर सहमति बनाने का लक्ष्य लेकर चल रहे हैं। कनाडा की ओर से करीब 300 कारोबारियों और अधिकारियों का प्रतिनिधिमंडल भारत पहुंचा है। तीन दशक से अधिक समय में यह कनाडा का भारत में सबसे बड़ा व्यापार प्रतिनिधिमंडल बताया जा रहा है। इस पहल का उद्देश्य दोनों देशों के बीच व्यापार, निवेश और आर्थिक सहयोग को बढ़ावा देना है।
अमेरिका की व्यापार नीतियों और आयात शुल्क को लेकर बढ़ती अनिश्चितता ने कनाडा को अपने व्यापारिक साझेदारों में विविधता लाने के लिए प्रेरित किया है। कनाडा अपनी अर्थव्यवस्था की अमेरिकी बाजार पर निर्भरता कम करना चाहता है और भारत जैसे बड़े बाजार में कारोबार के नए अवसर तलाश रहा है। कनाडा की सरकार ने अगले दशक में अमेरिका के अलावा अन्य देशों के साथ व्यापार दोगुना करने का लक्ष्य रखा है। भारत के साथ द्विपक्षीय व्यापार को 2030 तक सालाना 70 अरब कनाडाई डॉलर तक पहुंचाने की महत्वाकांक्षा भी जताई गई है।
भारत के लिए भी यह समझौता निर्यात और निवेश के नए अवसर खोल सकता है। भारतीय कंपनियों को कनाडा में दवाइयों, इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों, कपड़ों, रसायनों, इंजीनियरिंग सामान, समुद्री उत्पादों और सूचना प्रौद्योगिकी सेवाओं के लिए बेहतर बाजार पहुंच मिलने की संभावना है। वहीं कनाडा भारत को दालों, लकड़ी की लुगदी, खनिज ईंधन, ऊर्जा और अन्य संसाधनों की आपूर्ति बढ़ाने के अवसर के रूप में देखता है। दोनों देश स्वच्छ ऊर्जा, परमाणु ऊर्जा, महत्वपूर्ण खनिजों और तकनीक के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने पर भी काम कर रहे हैं।
व्यापार के मौजूदा आंकड़े बताते हैं कि दोनों अर्थव्यवस्थाओं के बीच संबंध पहले से ही महत्वपूर्ण हैं। कनाडा सरकार के अनुसार, 2025 में दोनों देशों के बीच वस्तुओं और सेवाओं का कुल व्यापार 30.4 अरब अमेरिकी डॉलर रहा। इसमें केवल वस्तुओं का व्यापार 13.6 अरब अमेरिकी डॉलर था। कनाडा ने भारत को 3.9 अरब अमेरिकी डॉलर का सामान निर्यात किया, जबकि भारत से उसका आयात 9.7 अरब अमेरिकी डॉलर रहा। सेवाओं के क्षेत्र में कनाडा का भारत को निर्यात 15.2 अरब अमेरिकी डॉलर और भारत से सेवाओं का आयात 4.5 अरब अमेरिकी डॉलर था। इन आंकड़ों से वस्तुओं के व्यापार में भारत के निर्यात की मजबूत स्थिति और सेवाओं में कनाडा की बड़ी हिस्सेदारी सामने आती है।
सीईपीए के तहत दोनों देश वस्तुओं के आयात-निर्यात पर शुल्क घटाने, सेवाओं के व्यापार को आसान बनाने, निवेश के नियम स्पष्ट करने और कारोबार से जुड़ी बाधाओं को कम करने पर चर्चा कर रहे हैं। यदि समझौता होता है, तो कंपनियों को बाजार तक पहुंच और नियमों की स्पष्टता मिल सकती है। इससे कुछ उत्पादों की लागत घटने, नए निवेश आने और रोजगार के अवसर बढ़ने की संभावना है। हालांकि, वास्तविक लाभ इस बात पर निर्भर करेगा कि अंतिम समझौते में किन उत्पादों और सेवाओं को कितनी छूट मिलती है।
समझौते के रास्ते में चुनौतियां भी कम नहीं हैं। भारत अपने किसानों, डेयरी क्षेत्र और छोटे कारोबारियों के हितों को सुरक्षित रखना चाहता है। दूसरी ओर कनाडा ने भी स्पष्ट किया है कि वह अपने डेयरी, पोल्ट्री और अंडा क्षेत्र की मौजूदा संरक्षण व्यवस्था में अतिरिक्त बाजार पहुंच देने के लिए तैयार नहीं है। कृषि उत्पादों पर शुल्क, खाद्य सुरक्षा मानक, निवेश सुरक्षा, सेवाओं में बाजार पहुंच और श्रम एवं पर्यावरण से जुड़े नियमों पर दोनों पक्षों को सहमति बनानी होगी। हाल के वर्षों में दोनों देशों के बीच रहे राजनयिक तनाव को भी आर्थिक संबंधों की पृष्ठभूमि में नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
क्या समझौता 2026 में ही पूरा होगा? इसकी संभावना बनी हुई है, क्योंकि दोनों सरकारों ने साल के अंत तक बातचीत पूरी करने का लक्ष्य दोहराया है। हालांकि, लक्ष्य तय होना और समझौते का अंतिम रूप से पूरा हो जाना अलग-अलग बातें हैं। कई जटिल मुद्दों पर सहमति, कानूनी समीक्षा और घरेलू प्रक्रियाओं के कारण समय बढ़ सकता है। इसलिए फिलहाल इसे संभावित समयसीमा के रूप में देखना चाहिए, न कि तय हो चुकी डील के रूप में।
कुल मिलाकर, भारत-कनाडा व्यापार समझौता दोनों देशों को नए बाजारों तक पहुंच, निवेश और आर्थिक सहयोग बढ़ाने का अवसर दे सकता है। कनाडा के लिए यह अमेरिकी बाजार पर निर्भरता कम करने की रणनीति का हिस्सा है, जबकि भारत के लिए इसका महत्व निर्यात, सेवाओं और ऊर्जा एवं महत्वपूर्ण खनिजों में सहयोग बढ़ाने से जुड़ा है। अंतिम तस्वीर इस बात से तय होगी कि दोनों देश अपने संवेदनशील क्षेत्रों की सुरक्षा करते हुए कितनी व्यापक व्यापारिक रियायतों पर सहमत हो पाते हैं।
What's Your Reaction?
Like
0
Dislike
0
Love
0
Funny
0
Wow
0
Sad
0
Angry
0
Comments (0)