दुर्गा पूजा: बेटी के मायके लौटने का उत्सव, मां उमा के स्वागत से लेकर विदाई तक जुड़ी हैं भावनाएं
कोलकाता। बंगाल, बिहार और झारखंड में दुर्गा पूजा केवल धार्मिक आस्था का पर्व नहीं, बल्कि बेटी के मायके लौटने की खुशी और उसकी विदाई की भावुक परंपरा से भी जुड़ा है। खासकर बंगाली संस्कृति में मां दुर्गा को मां उमा के रूप में देखा जाता है, जो भगवान शिव और अपने बच्चों लक्ष्मी, सरस्वती, गणेश और कार्तिकेय के साथ अपने मायके आती हैं। उनके आगमन को परिवार में बेटी के लौटने जैसी खुशी के रूप में मनाया जाता है।
इस परंपरा की भावनात्मक शुरुआत महालया से जुड़ी मानी जाती है। पितृपक्ष की समाप्ति और देवीपक्ष के आरंभ के साथ ही दुर्गोत्सव की तैयारियां तेज हो जाती हैं। महालया की सुबह चंडीपाठ, भक्ति संगीत और पारंपरिक आगमनी गीतों के जरिए मां दुर्गा के आगमन का स्वागत किया जाता है। पश्चिम बंगाल के कई परिवारों में रेडियो पर प्रसारित होने वाला ‘महिषासुरमर्दिनी’ कार्यक्रम भी इस परंपरा का अहम हिस्सा है। <Cite refs={["turn103695search8","turn103695search1"]}/>
बंगाली लोकपरंपरा में आगमनी गीत मां उमा के मायके आने की खुशी और उनके माता-पिता के स्नेह को व्यक्त करते हैं। मान्यता के अनुसार, हिमालयराज और माता मेनका की पुत्री पार्वती विवाह के बाद भगवान शिव के साथ कैलाश में रहती हैं और दुर्गा पूजा के अवसर पर अपने मायके आती हैं। इस कथा में देवी के शक्तिशाली स्वरूप के साथ उनके बेटी वाले रूप को भी विशेष स्थान दिया गया है। <Cite refs={["turn103695search3","turn103695search10"]}/>
मां के आगमन के साथ घरों और पूजा पंडालों में उत्सव का माहौल बन जाता है। षष्ठी से नवमी तक पूजा-अर्चना, सांस्कृतिक कार्यक्रम, पारंपरिक संगीत, खानपान और पंडालों में दर्शन का सिलसिला चलता है। मां दुर्गा की प्रतिमा के साथ उनके बच्चों की उपस्थिति भी इस उत्सव को पारिवारिक स्वरूप देती है। कोलकाता की दुर्गा पूजा को उसकी धार्मिक, कलात्मक और सामुदायिक परंपराओं के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान मिली है। <Cite refs={["turn103695search3","turn103695search9"]}/>
उत्सव का सबसे भावुक पल विजयादशमी पर आता है, जब मां दुर्गा को विदाई दी जाती है और प्रतिमाओं का विसर्जन होता है। बंगाली परंपरा में सिंदूर खेला और देवी को विदा करने की रस्में इस अवसर का हिस्सा हैं। यह विदाई उस भाव से जुड़ी है, जैसे माता-पिता अपनी बेटी को कुछ दिनों के मायके प्रवास के बाद वापस ससुराल विदा करते हैं। इसी दौरान श्रद्धालुओं के बीच ‘आशछे बछोर आबार हॉबे’ यानी ‘अगले साल फिर होगा’ का भाव गूंजता है।
इस तरह दुर्गा पूजा में शक्ति की आराधना, बेटी के प्रति प्रेम, पारिवारिक अपनापन और विदाई की उदासी एक साथ दिखाई देती है। मां दुर्गा का आगमन खुशियां लेकर आता है और उनकी विदाई अगले वर्ष फिर स्वागत करने की उम्मीद छोड़ जाती है।
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