पांच साल पुरानी तस्वीर ने पूछ लिया बड़ा सवाल—मांगें वहीं, ज्ञापन वही, बदली तो सिर्फ तारीख
गोपाल चतुर्वेदी
पत्रकारों की समस्याओं के समाधान की लड़ाई अगर ज्ञापन से शुरू होकर फिर अगले ज्ञापन पर ही खत्म हो जाए, तो सवाल उठना स्वाभाविक है—आखिर पांच साल में हासिल क्या हुआ?
सोशल मीडिया पर सामने आई 2 अक्टूबर 2021 की एक तस्वीर में उत्तर प्रदेश श्रमजीवी पत्रकार यूनियन की ओर से 11 सूत्रीय मांगों को लेकर जिलाधिकारी को ज्ञापन सौंपे जाने की खबर दिखाई दे रही है। उस समय भी पत्रकार सुरक्षा, सुविधाओं और पत्रकारों से जुड़े विभिन्न मुद्दों को लेकर आवाज उठाई गई थी।
अब जरा कैलेंडर पलटिए। 2021 से 2026 आ गया। इन पांच वर्षों में सरकारें, अधिकारी, परिस्थितियां और पत्रकारों की नई पीढ़ियां तक सामने आ गईं, लेकिन ज्ञापन संस्कृति की गाड़ी आज भी उसी प्लेटफॉर्म पर खड़ी नजर आती है। जून 2026 में भी मथुरा में पत्रकारों से जुड़े मुद्दों को लेकर 11 सूत्रीय ज्ञापन दिए जाने की खबर सामने आई।
तो सवाल यह नहीं है कि ज्ञापन क्यों दिया गया। सवाल यह है कि पिछले ज्ञापनों का हुआ क्या?
क्या उन मांगों पर कोई समयबद्ध कार्रवाई हुई? कौन-सी मांग पूरी हुई, कौन-सी लंबित है और किन मांगों पर प्रशासन या सरकार की ओर से कोई स्पष्ट जवाब मिला? और यदि पांच साल बाद भी मांगें लगभग वहीं खड़ी हैं, तो पत्रकार संगठनों ने ज्ञापन के अलावा जवाबदेही तय कराने के लिए क्या ठोस कदम उठाए?
वरना व्यवस्था भी शायद मन ही मन कहती होगी—“लो भैया, फिर ज्ञापन आ गया… रख दो फाइल में, अगली बार फिर निकाल लेंगे!”
व्यंग्य का असली मजा तो तब है, जब एक कचौरी, दो समोसे और चाय के बाद फोटो खिंच जाए, ज्ञापन सौंप दिया जाए और अगले पांच साल के लिए पत्रकारों को उम्मीद का पैकेट पकड़ा दिया जाए। लेकिन सवाल यह है कि क्या पत्रकारिता जैसी जवाबदेही वाली व्यवस्था भी सिर्फ तस्वीर और ज्ञापन तक सीमित रहनी चाहिए?
पत्रकारिता का काम केवल ज्ञापन देना और उसकी तस्वीर प्रकाशित करवाना नहीं है। असली सवाल तो उसके बाद शुरू होता है—ज्ञापन में लिखी मांगों का फॉलोअप किसने किया, प्रशासन से जवाब क्या मिला और उसका परिणाम क्या निकला?
तारीख बदलने से मांगें पूरी नहीं होतीं। ज्ञापन बदलने से व्यवस्था नहीं बदलती। और फोटो बदलने से पत्रकारों की समस्याएं खत्म नहीं होतीं।
अब वक्त शायद “ज्ञापन दो और भूल जाओ” से आगे बढ़कर “ज्ञापन दो, जवाब मांगो और परिणाम बताओ” वाली पत्रकारिता का है। क्योंकि किसी भी मांग की असली सफलता उसकी तस्वीर में नहीं, बल्कि उसके परिणाम में दिखाई देती है।
वरना पांच साल बाद फिर कोई पुरानी तस्वीर निकलेगी और सवाल वही होगा—
“भाई साहब, तब भी यही मांग थी… अब भी यही मांग है, आखिर बदला क्या?”
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