कानपुर-लखनऊ एक्सप्रेसवे की गुणवत्ता पर सवाल, हाईटेक तकनीक के बावजूद सड़क धंसी; मानवीय निगरानी पर उठे सवाल
कानपुर-लखनऊ एक्सप्रेसवे के उद्घाटन के कुछ समय बाद बारिश में सड़क के क्षतिग्रस्त होने और एक हिस्से के धंसने से इसकी निर्माण गुणवत्ता पर सवाल खड़े हो गए हैं। करीब 63 किलोमीटर लंबे इस एक्सप्रेसवे को आधुनिक तकनीक से तैयार किया गया है, लेकिन शुरुआती खामियों ने निर्माण और गुणवत्ता नियंत्रण की व्यवस्था पर बहस छेड़ दी है।
एक्सप्रेसवे के निर्माण में पहली बार बड़े स्तर पर 3डी ऑटोमेटेड मशीन गाइडेंस (एएमजी) तकनीक का इस्तेमाल किया गया। इसके अलावा संचालन के लिए एआई आधारित निगरानी कैमरे, एडवांस ट्रैफिक मैनेजमेंट सिस्टम और बैरियरलेस टोलिंग जैसी आधुनिक व्यवस्थाएं भी शामिल की गई हैं।
इसके बावजूद बारिश के बाद सड़क की परत उखड़ने और एक हिस्से के धंसने की घटना सामने आई। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जब निर्माण के दौरान मशीनें सड़क की ऊंचाई, चौड़ाई और ढलान को निर्धारित मानकों के अनुसार नियंत्रित कर सकती हैं, तो निर्माण गुणवत्ता में कमी कैसे रह गई।
क्या तकनीक के साथ मानवीय निगरानी कमजोर पड़ी?
विशेषज्ञों के मुताबिक, 3डी एएमजी तकनीक निर्माण में सटीकता बढ़ाने में मदद करती है, लेकिन यह अपने आप सड़क की पूरी गुणवत्ता सुनिश्चित नहीं कर सकती। तकनीक मुख्य रूप से सड़क की सतह की ऊंचाई, चौड़ाई और ढलान को नियंत्रित करने में मदद करती है।
वहीं सड़क की मजबूती के लिए मिट्टी की प्रकृति, नमी, अलग-अलग परतों की मोटाई, कम्पैक्शन और निर्माण सामग्री की गुणवत्ता जैसे कई कारक महत्वपूर्ण होते हैं। जल निकासी की व्यवस्था और बारिश जैसे मौसमी प्रभाव भी सड़क की मजबूती पर असर डाल सकते हैं।
3डी एएमजी कैसे करती है काम?
3डी एएमजी सिस्टम में सड़क के डिजिटल इंजीनियरिंग मॉडल को निर्माण मशीन के कंप्यूटर सिस्टम से जोड़ा जाता है। मशीन पर लगे सेंसर और रिसीवर वास्तविक स्थिति की जानकारी देते हैं, जिसे डिजिटल मॉडल से मिलाया जाता है। इसके आधार पर मशीन को मिट्टी काटने या भरने जैसे कामों में निर्धारित स्तर और ढलान बनाए रखने में मदद मिलती है।
इससे पारंपरिक तरीके से बार-बार सर्वे और मैनुअल मार्किंग की जरूरत कम हो जाती है। हालांकि, यह तकनीक निर्माण सामग्री की गुणवत्ता या मिट्टी की मजबूती की जांच नहीं करती।
विशेषज्ञों का कहना है कि आधुनिक तकनीक निर्माण प्रक्रिया को अधिक सटीक जरूर बना सकती है, लेकिन साइट पर इंजीनियरों की निगरानी, सामग्री की जांच, फील्ड टेस्ट और गुणवत्ता नियंत्रण की भूमिका खत्म नहीं होती। कानपुर-लखनऊ एक्सप्रेसवे की घटना ने इसी संतुलन को लेकर सवाल खड़े किए हैं कि क्या हाईटेक निर्माण के साथ मानवीय इंजीनियरिंग निगरानी भी उतनी ही मजबूत रखी गई थी।
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