आस्था, कला और हुनर का संगम: सागर में 50 साल से बन रही दुर्गा प्रतिमाएं, देशभर में रहती है डिमांड
सागर। नवरात्रि का पर्व नजदीक आते ही शहर में मां दुर्गा की भव्य प्रतिमाओं का निर्माण तेजी से चल रहा है। सागर में दुर्गा प्रतिमाओं की खास पहचान बन चुकी है और यहां तैयार होने वाली प्रतिमाओं की मांग मध्यप्रदेश के साथ देश के कई राज्यों में रहती है। इसी परंपरा को विश्वकर्मा बंधु परिवार पिछले करीब 50 वर्षों से आगे बढ़ा रहा है।
विश्वकर्मा बंधु परिवार का छह भाइयों का समूह पीढ़ियों से मूर्तिकला की इस विरासत को संभाले हुए है। खास बात यह है कि परिवार केवल नवरात्रि के समय ही नहीं, बल्कि सालभर मां दुर्गा की प्रतिमाओं के निर्माण में जुटा रहता है। वर्ष 2015 से परिवार की युवा पीढ़ी भी इस कला से जुड़कर पारंपरिक शिल्प में आधुनिक सोच और तकनीक का मेल कर रही है।
परिवार की ओर से तैयार की जाने वाली प्रतिमाओं में पारंपरिक बंगाली और बुंदेली शैली के साथ अलग-अलग आकर्षक थीम भी देखने को मिलती हैं। पौराणिक कथाओं से लेकर समसामयिक विषयों तक को प्रतिमाओं के माध्यम से आकार दिया जाता है। पर्यावरण को ध्यान में रखते हुए प्राकृतिक रंगों और सुरक्षित सामग्रियों से प्रतिमाएं तैयार करने पर भी जोर दिया जा रहा है।
इन प्रतिमाओं की कीमत उनके आकार, भव्यता और कलात्मक बारीकियों के आधार पर तय होती है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार इनकी कीमत करीब 51 हजार रुपये से लेकर 12 लाख रुपये तक है। सागर में तैयार होने वाली ये प्रतिमाएं जलगांव, नागपुर, भोपाल, दमोह, बांदा, टीकमगढ़ और छिंदवाड़ा समेत कई शहरों तक भेजी जाती हैं।
विश्वकर्मा बंधुओं की कला अब केवल स्थानीय स्तर तक सीमित नहीं है। उनकी तैयार की गई प्रतिमाओं की तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर भी लोगों का ध्यान आकर्षित कर रहे हैं। पांच दशक से चली आ रही यह मूर्तिकला परंपरा आज आस्था के साथ सागर की कला और हुनर की पहचान भी बनती जा रही है।
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