गुना में आदिवासी जमीन की खरीद-फरोख्त और प्लॉट रजिस्ट्री पर उठे सवाल, कलेक्ट्रेट के कर्मचारियों व कॉलोनाइजर की भूमिका की जांच की मांग

Tuesday, October 13, 2026 - 16:20
Updated: 12 hours ago
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गुना में आदिवासी जमीन की खरीद-फरोख्त और प्लॉट रजिस्ट्री पर उठे सवाल, कलेक्ट्रेट के कर्मचारियों व कॉलोनाइजर की भूमिका की जांच की मांग

गुना। जिले में आदिवासी समुदाय की जमीन के हस्तांतरण और कॉलोनी विकास की अनुमति से जुड़े मामले में कलेक्ट्रेट के कर्मचारियों तथा कॉलोनाइजर के कथित संबंधों को लेकर सवाल उठाए गए हैं। उपलब्ध कराए गए विवरण और रजिस्ट्री से संबंधित जानकारी के आधार पर विनोद तेकाम, सुधीर कुमार संत और कॉलोनाइजर अखिलेश जैन की भूमिका की जांच की मांग की गई है। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि और संबंधित पक्षों का जवाब सामने आना अभी बाकी है।

आरोप है कि बोरखेड़ागिर्द क्षेत्र की सहरिया आदिवासी समुदाय से जुड़ी जमीन के लेन-देन में विनोद तेकाम की मां सुखवती तेकाम के नाम पर कुछ भूमि की रजिस्ट्री कराई गई। इसके बाद मुख्तारनामा के माध्यम से जमीन के कुछ हिस्से संत श्री सुधासागर बिल्डर्स एंड डेवलपर्स को हस्तांतरित किए जाने की बात कही गई है। इस पूरे लेन-देन में अखिलेश जैन की भूमिका को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। मामले से जुड़े दस्तावेजों की जांच के बाद ही जमीन के हस्तांतरण की वास्तविक प्रक्रिया और सभी पक्षों की भूमिका स्पष्ट हो सकेगी।

उपलब्ध जानकारी के अनुसार, संबंधित जमीन पर कॉलोनी विकास की अनुमति 14 जुलाई 2020 को जारी किए जाने का उल्लेख है। वहीं, आरोप लगाया गया है कि इससे पहले 12 जून 2020 को विनोद तेकाम के नाम 800 वर्गफीट के प्लॉट की रजिस्ट्री कराई गई थी। इस क्रम को लेकर सवाल उठाया जा रहा है कि क्या प्लॉट की रजिस्ट्री और जमीन के लेन-देन के बीच कोई संबंध था। इसकी पुष्टि के लिए रजिस्ट्री दस्तावेजों, अनुमति संबंधी रिकॉर्ड और अन्य साक्ष्यों की निष्पक्ष जांच जरूरी है।

मामले में तत्कालीन कलेक्ट्रेट रीडर रहे सुधीर कुमार संत पर भी जमीन और प्लॉट से जुड़े लेन-देन को लेकर आरोप लगाए गए हैं। आरोपों में कहा गया है कि आदिवासी भूमि से संबंधित सौदों में प्रशासनिक पदों पर रहे लोगों की भूमिका की पड़ताल की जानी चाहिए। फिलहाल, इन आरोपों के संबंध में किसी आधिकारिक जांच के निष्कर्ष या संबंधित व्यक्तियों का पक्ष उपलब्ध नहीं है। इसलिए आरोपों को प्रमाणित तथ्य मानने के बजाय जांच के दायरे में आने वाले दावों के रूप में देखा जाना चाहिए।

इस प्रकरण में प्रशासन से मांग की गई है कि जमीन के मूल स्वामित्व, रजिस्ट्री, मुख्तारनामे, कॉलोनी विकास की अनुमति और संबंधित वित्तीय लेन-देन की जांच कराई जाए। यदि किसी नियम के उल्लंघन या पद के दुरुपयोग के प्रमाण मिलते हैं, तो नियमानुसार कार्रवाई की जानी चाहिए। साथ ही, आदिवासी भूमि से जुड़े कानूनों और कॉलोनी विकास संबंधी नियमों के पालन की भी जांच आवश्यक है।

जमीन खरीदने वालों से भी सावधानी बरतने की अपील की गई है। किसी भी प्लॉट की खरीद से पहले भूमि के मूल स्वामित्व, राजस्व रिकॉर्ड, भूमि की प्रकृति, हस्तांतरण की वैधता और कॉलोनी की आवश्यक अनुमतियों की पुष्टि करना जरूरी है। केवल विक्रेता के मौखिक आश्वासन या निजी दस्तावेजों के आधार पर निवेश करने से भविष्य में विवाद पैदा हो सकता है।

अब इस मामले में प्रमुख सवाल यह है कि संबंधित भूमि के हस्तांतरण और कॉलोनी विकास की अनुमति की प्रक्रिया नियमों के अनुरूप हुई या नहीं। दस्तावेजों की निष्पक्ष जांच और सभी संबंधित पक्षों का पक्ष सामने आने के बाद ही पूरे प्रकरण की वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।

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