गुना में ईस्टर के नाम पर धर्मांतरण का आरोप, अंधविश्वास और ‘चंगाई’ के दावों पर उठे सवाल

Tuesday, April 7, 2026 - 12:10
Updated: 6 months ago
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गुना में ईस्टर के नाम पर धर्मांतरण का आरोप, अंधविश्वास और ‘चंगाई’ के दावों पर उठे सवाल

मध्यप्रदेश के गुना जिले के मोहनपुर खुर्द गांव से एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने धर्मांतरण, अंधविश्वास और प्रशासन की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जिला मुख्यालय से करीब 22 किलोमीटर दूर इस गांव में ईस्टर के अवसर पर आयोजित एक कार्यक्रम को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। आरोप है कि इस आयोजन में बड़ी संख्या में गरीब आदिवासियों को इकट्ठा कर उन्हें भोज के साथ-साथ धार्मिक संदेश दिए गए और “प्रार्थना से बीमारी ठीक होने” जैसे दावे किए गए।

स्थानीय लोगों के अनुसार कार्यक्रम में सैकड़ों ग्रामीणों को बुलाया गया, जहां बकरे और मुर्गों का भोज कराया गया और साथ ही “चंगाई” यानी प्रार्थना के जरिए बीमारियों से राहत मिलने की बात कही गई। कुछ ग्रामीणों ने बताया कि वे पहले झाड़-फूंक जैसे पारंपरिक तरीकों से इलाज करवा चुके थे, लेकिन जब वहां से राहत नहीं मिली तो उन्हें यहां आने की सलाह दी गई। इस तरह एक आस्था से दूसरी आस्था की ओर झुकाव का मामला सामने आ रहा है, जिस पर अब बहस तेज हो गई है।

ग्रामीणों के बीच यह भी कहा गया कि कई बीमार लोगों को डॉक्टर के पास ले जाने के बजाय प्रार्थना के जरिए ठीक होने का भरोसा दिलाया गया। इस पर सवाल उठ रहे हैं कि क्या यह लोगों को वैज्ञानिक चिकित्सा से दूर करने जैसा नहीं है। वहीं आयोजन से जुड़े लोगों का कहना है कि वे धर्म परिवर्तन नहीं बल्कि “मन परिवर्तन” की बात करते हैं और किसी पर दबाव नहीं डाला जाता।

मामले में एक और पहलू यह सामने आया है कि कुछ स्थानीय युवा, जिन्होंने मिशनरी स्कूलों में पढ़ाई की है, अब गांव-गांव जाकर इसी तरह के धार्मिक संदेश फैलाने का काम कर रहे हैं। इससे यह चर्चा भी शुरू हो गई है कि क्या यह एक सुनियोजित प्रक्रिया का हिस्सा है या फिर व्यक्तिगत आस्था का विस्तार।

इस पूरे घटनाक्रम के बीच सबसे बड़ा सवाल प्रशासन की भूमिका को लेकर उठ रहा है। मध्यप्रदेश में धर्म स्वातंत्र्य कानून लागू है, जिसमें प्रलोभन या दबाव के जरिए धर्मांतरण को अपराध माना गया है। इसके बावजूद इतने बड़े स्तर पर कार्यक्रम होने के बावजूद स्थानीय प्रशासन की ओर से कोई स्पष्ट कार्रवाई सामने नहीं आई है।

सामाजिक जानकारों का कहना है कि इस तरह के मामलों को केवल धर्मांतरण के नजरिए से नहीं, बल्कि क्षेत्र की मूल समस्याओं से जोड़कर भी देखना चाहिए। गांव में स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी, गरीबी और बेरोजगारी जैसी समस्याएं लोगों को ऐसे आयोजनों की ओर आकर्षित करती हैं। जब शासन बुनियादी जरूरतें पूरी नहीं कर पाता, तब बाहरी या वैकल्पिक व्यवस्थाएं अपनी जगह बना लेती हैं।

फिलहाल यह मामला जांच और बहस का विषय बना हुआ है। प्रशासन की चुप्पी और स्थानीय परिस्थितियों के बीच यह देखना अहम होगा कि आने वाले समय में इस पर क्या कदम उठाए जाते हैं और क्या वास्तव में कानून के अनुसार कार्रवाई होती है या नहीं।

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