कुमोरटुली की ‘दशभुजा’: जिसे घर ने कहा ‘नहीं चाहिए’, उसी के हाथों से आज बनती है मां दुर्गा

Friday, September 18, 2026 - 19:43
0
कुमोरटुली की ‘दशभुजा’: जिसे घर ने कहा ‘नहीं चाहिए’, उसी के हाथों से आज बनती है मां दुर्गा

कोलकाता। उत्तर कोलकाता की गंगा किनारे बसी कुमोरटुली की संकरी गलियों में इन दिनों काम की रफ्तार बढ़ गई है। महालया नजदीक है और मूर्तिकार देवी की आंखें बनाने की तैयारी में जुटे हैं। मिट्टी, पुआल, लकड़ी और रंगों के बीच यहां हर साल मां दुर्गा की हजारों प्रतिमाएं आकार लेती हैं। लेकिन इस मशहूर मूर्तिकार बस्ती की कहानी केवल देवी की प्रतिमाओं की नहीं, बल्कि उन महिलाओं की भी है, जिन्होंने पुरुषों के वर्चस्व वाले इस काम में अपनी जगह बनाई।

इन्हीं महिलाओं में एक नाम चायना पाल का है। बंगाली में ‘चाई ना’ का अर्थ है ‘नहीं चाहिए’। चायना ने 2016 की एक बातचीत में बताया था कि उनकी मां ने यह नाम इसलिए रखा था क्योंकि वह परिवार की चौथी बेटी थीं और उम्मीद की गई थी कि अब घर में और बेटी न हो। लेकिन समय ने उसी नाम को पहचान बना दिया। कुमोरटुली के साथी कारीगर उन्हें ‘दशभुजा’ कहते हैं, यानी दस हाथों वाली मां दुर्गा।

कुमोरटुली का अर्थ कुम्हारों की बस्ती से है। यहां की संकरी गलियों में सैकड़ों छोटे-छोटे कारखाने हैं, जहां कारीगर दिन-रात मूर्तियां गढ़ते हैं। गंगा किनारे से आने वाली मिट्टी इन प्रतिमाओं को आकार देती है। यूनेस्को ने 2021 में कोलकाता की दुर्गा पूजा को मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर की सूची में शामिल किया था। परंपरा के अनुसार महालया के दिन देवी की आंखें बनाई जाती हैं और पूजा के बाद प्रतिमाएं उसी नदी में विसर्जित कर दी जाती हैं, जहां से मिट्टी आती है।

लंबे समय तक कुमोरटुली में मूर्ति बनाने का काम मुख्य रूप से पुरुषों तक सीमित रहा। 2017 की एक रिपोर्ट में बताया गया था कि उस समय पूरी बस्ती में महिला कारीगरों की संख्या बेहद कम थी। कई परिवारों में बेटियों और बहुओं को इस काम में आने के लिए प्रोत्साहित नहीं किया जाता था।

चायना पाल की कहानी 1994 में बदल गई। उनके पिता और प्रसिद्ध मूर्तिकार हेमंत पाल का निधन हुआ। उस समय चायना स्कूल में पढ़ती थीं। पिता नहीं चाहते थे कि बेटी कारखाने में काम करे, लेकिन जीवन के अंतिम वर्षों में उन्होंने उसे अपने साथ बैठाकर मूर्ति बनाना सिखाना शुरू कर दिया था। पिता के निधन के बाद उनके दोनों भाइयों ने पारिवारिक काम संभालने से इनकार कर दिया। बहनों की भी इसमें रुचि नहीं थी। ऐसे में चायना ने पिता का कारखाना संभालने का फैसला किया।

उनकी उम्र उस समय स्कूल में पढ़ने की थी। पिता से मिली ट्रेनिंग भी पूरी नहीं हुई थी और ग्राहकों को भी संदेह था कि एक लड़की उनके लिए पहले जैसी मूर्तियां बना पाएगी या नहीं। चायना ने काम करते हुए बाकी कला सीखी। उन्होंने कहा था कि लगन हो तो इंसान बहुत कुछ सीख सकता है, हालांकि इसके लिए समय लगता है।

कारोबार में भी उन्हें मुश्किलों का सामना करना पड़ा। बड़े पूजा आयोजकों से भुगतान मिलने में देरी होती थी। इसके बाद उन्होंने घरेलू पूजा के ऑर्डर पर अधिक ध्यान देना शुरू किया, जहां भुगतान अपेक्षाकृत समय पर मिलता था। वह अपने पिता और दादा की तरह पारंपरिक एकचाला प्रतिमाएं बनाती रहीं, जिनमें मां दुर्गा और उनका परिवार एक ही संरचना में होता है।

काम की जिम्मेदारियां बढ़ती गईं। कारखाना संभालना, कारीगरों के साथ काम करना, सामान खरीदना, ग्राहकों से संपर्क और घर की जिम्मेदारी—इन सबके बीच साथी कारीगरों ने उन्हें ‘दशभुजा’ कहना शुरू कर दिया।

2015 में चायना ने एक ऐसी प्रतिमा बनाई जिसने उन्हें व्यापक पहचान दिलाई। उत्तर कोलकाता की जय मित्र स्ट्रीट में एक पूजा समिति ने ट्रांसजेंडर समुदाय के संगठन के साथ मिलकर अर्धनारीश्वर रूप में मां दुर्गा की प्रतिमा बनाने का फैसला किया। आयोजकों की इच्छा थी कि इसे कोई महिला कलाकार बनाए। जब दूसरे कारीगरों ने यह जिम्मेदारी लेने से इनकार किया, तब चायना ने इसे स्वीकार किया।

प्रतिमा को लेकर कुछ स्थानीय लोगों ने आपत्ति भी जताई, लेकिन चायना ने कहा कि पूजा करने का अधिकार सभी को है और जब उनसे प्रतिमा बनाने को कहा गया तो वह मना नहीं कर सकती थीं। बाद में उन्होंने इस विरोध को लेकर भी अपनी चिंता जाहिर नहीं की।

2018 की एक रिपोर्ट के मुताबिक चायना अपने काम के सिलसिले में चीन गई थीं और उनकी दो प्रतिमाएं वहां के एक संग्रहालय में रखी गईं। अंग्रेजी में उनका नाम ‘China Pal’ लिखा जाता है। जिस नाम में बचपन में ‘नहीं चाहिए’ का भाव था, वही नाम बाद में उनकी पहचान बनकर विदेश तक पहुंचा।

चायना अकेली महिला कारीगर नहीं हैं। माला पाल ने भी पिता के निधन के बाद कारखाने की जिम्मेदारी संभाली। 2022 की एक रिपोर्ट के अनुसार, उनके पिता उनके कारखाने में आने के खिलाफ थे, लेकिन बाद में उन्होंने अपना काम जारी रखा। माला छोटी और मोड़कर डिब्बे में रखी जा सकने वाली दुर्गा प्रतिमाएं बनाती हैं। 2017 की रिपोर्ट के मुताबिक उनकी बनाई प्रतिमाएं यूरोप, ऑस्ट्रेलिया और कनाडा तक जाती थीं, जहां बसे बंगाली परिवार दुर्गा पूजा करते हैं।

माला अपने काम के सिलसिले में शिकागो, दुबई और जर्मनी तक जा चुकी हैं। उन्होंने मिट्टी के काम का एक स्कूल भी शुरू किया, जहां पहले बच्चों को छोटे जानवर बनाना सिखाया जाता है और फिर धीरे-धीरे प्रतिमा निर्माण की ओर ले जाया जाता है। उनके अनुसार, उनके शुरुआती कई विद्यार्थी आज कुमोरटुली में ही काम कर रहे हैं।

माला हर साल सोचती हैं कि अब यह काम छोड़ देंगी। लेकिन उनके लिए साथ काम करने वाले कारीगर परिवार जैसे हैं। सरस्वती पूजा के बाद जब ऑर्डर बढ़ने लगते हैं तो उनका उत्साह फिर लौट आता है और काम छोड़ने का फैसला पीछे रह जाता है।

काकोली पाल की कहानी भी संघर्ष से भरी है। नदिया जिले से शादी के बाद कुमोरटुली आईं। पति की अचानक मौत के बाद दो बेटियों की जिम्मेदारी उनके कंधों पर आ गई। मूर्ति बनाने की कोई औपचारिक ट्रेनिंग नहीं थी। फिर भी उन्होंने मिट्टी का काम शुरू किया ताकि परिवार का गुजारा चल सके। 2017 की रिपोर्ट के अनुसार, उस समय उन्हें स्थायी कारखाना तक नहीं मिला था और वह एक संकरी गली में अस्थायी जगह पर प्रतिमाएं बनाती थीं।

काकोली ने उस दौर को याद करते हुए कहा था कि उनके पति मुश्किल से पांच-सात प्रतिमाएं बना पाते थे, जबकि उन्हें एक साल में 22 प्रतिमाओं का काम पूरा करना था। उन्होंने काम सीखा, उसे आगे बढ़ाया और बेटियों के लिए घर चलाने का सहारा बनाया।

कांची पाल की कहानी इससे एक पीढ़ी पीछे जाती है। उनके पिता नृसिंह पाल के निधन के बाद उनकी मां अर्चना पाल ने कारखाना संभाला और फिर बेटी को यह कला सिखाई। एक शोध-पत्र के मुताबिक कांची ने करीब पांच साल की उम्र से मिट्टी के साथ काम करना शुरू कर दिया था। आज वह कुमोरटुली की नई पीढ़ी की प्रमुख महिला कारीगरों में गिनी जाती हैं। उनके पति कुवैत में काम करते हैं और कारखाने का संचालन, कारीगरों की जिम्मेदारी और हिसाब-किताब कांची संभालती हैं।

मीनाक्षी पाल ने भी 2011 में पिता के निधन के बाद काम संभाला। उन्होंने बताया था कि वह अपने पिता का नाम जिंदा रखने के लिए इस पेशे में बनी रहीं।

इन कहानियों में एक समान धागा दिखाई देता है। चायना के लिए पिता के जाने के बाद कारखाने का दरवाजा खुला, माला के लिए भी पिता के निधन के बाद जिम्मेदारी आई, मीनाक्षी ने पिता की विरासत संभाली और काकोली ने पति के निधन के बाद मिट्टी के काम को अपना सहारा बनाया। अर्चना पाल ने पति के बाद कारखाना संभाला और फिर अपनी बेटी कांची को वही हुनर सिखाया।

2017 में कुमोरटुली मृत्शिल्पी संस्कृति समिति के तत्कालीन पदाधिकारी बाबू पाल ने बताया था कि करीब दो दशक पहले बस्ती में सिर्फ एक महिला कारीगर थी, जबकि बाद में यह संख्या बढ़कर लगभग दस हो गई थी। वरिष्ठ कारीगर दिलीप पाल ने भी कहा था कि नई पीढ़ी के कई पुरुष इस पेशे में नहीं आना चाहते और महिलाओं का आगे आना सकारात्मक संकेत है।

इस साल भी कुमोरटुली के सामने अपनी चुनौतियां हैं। कारीगरों ने बेले माटी की कमी की बात कही है, जबकि दुर्गा पूजा से पहले प्रतिमाओं को पूरा करने का समय तेजी से कम हो रहा है। इसके बावजूद कारखानों में काम जारी है। प्रतिमाएं तैयार हो रही हैं, रंग चढ़ रहे हैं और जल्द ही देवी की आंखें बनाई जाएंगी।

चायना ने एक बातचीत में कहा था कि जब उनकी बनाई मूर्तियां कारखाने से पंडाल के लिए चली जाती हैं तो उन्हें वैसा ही लगता है जैसे घर की बेटी विदा हो रही हो। शायद यही इस पूरी कहानी का सबसे मानवीय पक्ष है। जिन हाथों को कभी इस गली में काम करने के लिए जगह नहीं दी गई, उन्हीं हाथों से आज शहर अपनी देवी बनवाता है।

और चायना की कहानी का सबसे खूबसूरत हिस्सा शायद यह है कि जिस मां ने उन्हें ‘चाई ना’ यानी ‘नहीं चाहिए’ नाम दिया था, जीवन के अंतिम वर्षों में वही मां अपनी बेटी के साथ रहीं। चायना कारखाने और रसोई की जिम्मेदारी संभालने के साथ अपनी बुजुर्ग मां की देखभाल भी करती थीं।

दुर्गा पूजा की तैयारियों के बीच कुमोरटुली में हर साल देवी की आंखें बनती हैं। उन आंखों में शक्ति की कल्पना होती है। लेकिन उन प्रतिमाओं को गढ़ने वाली महिलाओं की अपनी जिंदगी भी किसी कहानी से कम नहीं है। उन्होंने विरासत में मिली अधूरी सीख को पूरा किया, परिवार की जिम्मेदारी उठाई, नए ग्राहक बनाए, अगली पीढ़ी को हुनर सिखाया और उस पेशे में अपनी जगह बनाई, जिसे कभी पुरुषों का काम माना जाता था।

कुमोरटुली की इन महिलाओं की कहानी सिर्फ मिट्टी की प्रतिमाओं की कहानी नहीं है। यह उस दरवाजे की कहानी है, जो बेटियों के लिए लंबे समय तक बंद रहा और जब खुला, तो उन्होंने उसे दोबारा बंद नहीं होने दिया।

What's Your Reaction?

Like Like 0
Dislike Dislike 0
Love Love 0
Funny Funny 0
Wow Wow 0
Sad Sad 0
Angry Angry 0
RNI News

Reportage News International (RNI) is India's growing news website which is an digital platform to news, ideas and content based article. Destination where you can catch latest happenings from all over the globe Enhancing the strength of journalism independent and unbiased.

Comments (0)

User