सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: हाईकोर्ट खुद से सजा नहीं बढ़ा सकता, आरोपी की अपील पर बढ़ाई गई उम्रकैद भी रद्द
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने आपराधिक मामलों में सजा बढ़ाने को लेकर महत्वपूर्ण कानूनी स्थिति स्पष्ट की है। अदालत ने कहा कि हाईकोर्ट किसी आरोपी की अपील पर स्वत: संज्ञान लेते हुए उसकी सजा नहीं बढ़ा सकता। सजा बढ़ाने का अधिकार तभी इस्तेमाल किया जा सकता है, जब राज्य, पीड़ित या शिकायतकर्ता की ओर से सजा बढ़ाने की मांग वाली अपील दायर की गई हो।
जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस विजय बिश्नोई की पीठ ने मद्रास हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें आरोपी को मिली उम्रकैद की सजा को उसके शेष प्राकृतिक जीवन तक जेल में रखने की सजा में बदल दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस मामले में राज्य, पीड़ित या शिकायतकर्ता की ओर से सजा बढ़ाने के लिए कोई अपील नहीं की गई थी।
आरोपी की अपील पर सजा बढ़ाना क्यों गलत?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अपील करना आरोपी का महत्वपूर्ण वैधानिक और संवैधानिक अधिकार है। अगर कोई आरोपी अपनी सजा के खिलाफ अपील करता है और उसी अपील की सुनवाई के दौरान उसकी सजा और बढ़ा दी जाती है, तो वह सिर्फ अपील करने के कारण ही और खराब स्थिति में पहुंच जाएगा।
अदालत ने स्पष्ट किया कि आरोपी की अपील पर हाईकोर्ट उसकी सजा कम कर सकता है, लेकिन उसे बढ़ा नहीं सकता। सजा बढ़ाने के लिए संबंधित पक्ष की ओर से अलग से अपील या प्रक्रिया जरूरी है।
उम्रकैद की सजा को लेकर भी सुप्रीम कोर्ट ने स्थिति स्पष्ट की। अदालत ने संविधान पीठ के मुथुरामलिंगम फैसले का हवाला देते हुए कहा कि एक ही मुकदमे में कई अपराधों के लिए दी गई उम्रकैद की सजाएं सामान्य तौर पर लगातार नहीं, बल्कि साथ-साथ चलेंगी। यही सिद्धांत तब भी लागू होगा, जब उम्रकैद के साथ निश्चित अवधि की सजा भी दी गई हो।
इस फैसले के साथ सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया कि आरोपी की अपील को आधार बनाकर उसकी सजा में स्वत: बढ़ोतरी नहीं की जा सकती। सजा बढ़ाने की मांग करने वाले पक्ष को कानून के मुताबिक उचित अपील या प्रक्रिया अपनानी होगी।
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