एससी-एसटी एक्ट के तहत दर्ज केस पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी, बैंक अधिकारियों के खिलाफ एफआईआर रद्द
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने कर्ज और बैंकिंग विवाद में अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के इस्तेमाल से जुड़े एक मामले में अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) के अधिकारियों के खिलाफ दर्ज एफआईआर और उससे जुड़ी आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया। शीर्ष अदालत ने कहा कि बैंक के कर्ज खाते एनपीए होने और पुनर्वास पैकेज नहीं मिलने जैसे विवादों को अपने आप जातिगत अत्याचार का मामला नहीं माना जा सकता।
न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने 12 अक्टूबर 2026 को चव्हाण धर्मेंद्र एवं अन्य बनाम तेलंगाना राज्य एवं अन्य मामले में यह फैसला सुनाया। मामला एक लघु औद्योगिक कंपनी को दिए गए बैंक ऋण से जुड़ा था। कंपनी के खाते वर्ष 2016 में गैर-निष्पादित परिसंपत्ति (एनपीए) घोषित हो गए थे। इसके बाद कंपनी के निदेशक ने बैंक अधिकारियों पर जातिगत भेदभाव, कथित फर्जी दस्तावेजों और पुनर्वास पैकेज देने से इनकार करने जैसे आरोप लगाए थे।
शिकायत में आरोप लगाया गया था कि बैंक अधिकारियों ने भारतीय रिजर्व बैंक के दिशा-निर्देशों का पालन नहीं किया और कंपनी को राहत देने के बजाय उसके खिलाफ कार्रवाई की। इस आधार पर अधिकारियों के खिलाफ एससी-एसटी एक्ट के तहत मामला दर्ज कराया गया था। तेलंगाना हाईकोर्ट ने पहले आपराधिक कार्यवाही में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया था, जिसके बाद बैंक अधिकारियों ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।
सुप्रीम कोर्ट ने मामले के तथ्यों और शिकायत में मौजूद विसंगतियों पर विचार करते हुए कहा कि आरबीआई के दिशा-निर्देशों का कथित उल्लंघन, पुनर्वास पैकेज नहीं मिलना या कर्ज वसूली से जुड़ा विवाद अपने आप एससी-एसटी एक्ट के तहत आपराधिक अभियोजन का आधार नहीं बन सकता। अदालत ने पाया कि शिकायत में ऐसा कोई विशिष्ट आरोप नहीं था, जिससे यह स्पष्ट हो कि बैंक अधिकारियों ने शिकायतकर्ता पक्ष के निदेशकों को उनकी जाति के आधार पर अपमानित किया था।
पीठ ने यह भी कहा कि केवल कंपनी के निदेशकों के अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति से होने के आधार पर बैंकिंग विवाद को जातिगत अपराध नहीं माना जा सकता। शिकायत में कंपनी के प्रबंधन को लेकर भी विसंगति पाई गई। अदालत ने स्पष्ट किया कि ऋण खाते, कथित गलत दस्तावेजों, आरबीआई के दिशा-निर्देशों और पुनर्वास पैकेज से जुड़े विवादों को उचित मंच पर उठाया जा सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए वर्ष 2019 में हैदराबाद में दर्ज एफआईआर और उससे जुड़ी आपराधिक कार्यवाही रद्द कर दी। हालांकि, अदालत ने कंपनी के ऋण और वसूली से संबंधित दावों पर अंतिम निर्णय नहीं दिया और उन्हें उचित मंच, जैसे ऋण वसूली न्यायाधिकरण (डीआरटी), के समक्ष उठाने का रास्ता खुला रखा।
फैसले में अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि एससी-एसटी एक्ट के तहत कार्रवाई के लिए संबंधित अपराध के कानूनी तत्वों का मौजूद होना जरूरी है। यह निर्णय इसी मामले के तथ्यों और शिकायत में लगाए गए आरोपों के आधार पर दिया गया है; इसे जातिगत भेदभाव की वास्तविक शिकायतों पर सामान्य रोक के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
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