पार्टी में फूट पड़े तो नाम और चुनाव चिह्न कैसे तय होता है? टीएमसी से पहले भी हो चुके हैं ऐसे विवाद
नई दिल्ली। किसी राजनीतिक दल में फूट के बाद पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न पर अधिकार को लेकर विवाद अक्सर चुनाव आयोग तक पहुंचता है। तृणमूल कांग्रेस के मामले में भी दोनों गुटों की ओर से पार्टी पर दावा किए जाने के बाद आयोग ने फिलहाल अलग-अलग नाम और चुनाव चिह्न आवंटित किए हैं। इससे पहले भी कई राजनीतिक दलों में नाम और चुनाव चिह्न को लेकर विवाद सामने आ चुके हैं।
पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस के भीतर पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न को लेकर विवाद गहरा गया है। ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट और बागी गुट के बीच जारी खींचतान अब चुनाव आयोग तक पहुंच चुकी है। 17 सितंबर को आयोग ने अंतरिम आदेश जारी करते हुए दोनों गुटों को आगामी उपचुनाव में ‘ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ नाम और उसके आरक्षित ‘फूल और घास’ चुनाव चिह्न के इस्तेमाल से रोक दिया।
ममता बनर्जी ने आयोग के इस फैसले पर नाराजगी जताते हुए इसे असंवैधानिक बताया है। वहीं, दोनों गुटों को आगामी उपचुनाव के लिए अलग-अलग नाम और चुनाव चिह्न आवंटित किए गए हैं। आयोग ने स्पष्ट किया है कि यह व्यवस्था अंतिम निर्णय होने तक अंतरिम रूप से लागू रहेगी।
ऐसे में सवाल उठता है कि तृणमूल कांग्रेस में विवाद की शुरुआत कैसे हुई, चुनाव आयोग ने क्या फैसला लिया, चुनाव चिह्न का आवंटन कौन करता है और किसी पार्टी में फूट के बाद आयोग किस आधार पर तय करता है कि नाम और चुनाव चिह्न किस गुट को मिलेगा। साथ ही, इससे पहले किन राजनीतिक दलों में नाम और चुनाव चिह्न को लेकर विवाद हो चुका है।
तृणमूल कांग्रेस में विभाजन की स्थिति मई में पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में पार्टी की हार के बाद सामने आई। 3 जून को 58 बागी विधायकों ने पार्टी के विधायी दल पर अपना दावा पेश किया और ऋतब्रत बनर्जी को अपना नेता चुना। विधानसभा अध्यक्ष ने भी इस दावे को मान्यता दी। इसके बाद बागी गुट ने पार्टी के संगठन और नेतृत्व पर भी अपना दावा पेश कर दिया।
22 जून को ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले बागी गुट ने ममता बनर्जी को हटाकर अरूप रॉय को पार्टी का अध्यक्ष घोषित कर दिया और समानांतर संगठनात्मक ढांचा पेश किया। इसे तृणमूल कांग्रेस के 28 साल के इतिहास में पहली बड़ी टूट के तौर पर सामने आया।
इसके बाद दोनों गुटों ने खुद को असली तृणमूल कांग्रेस बताते हुए पार्टी के संगठन, नाम और चुनाव चिह्न पर अपना दावा पेश किया। मामला चुनाव आयोग पहुंचा, जहां दोनों पक्षों की दलीलें और दस्तावेज सुने गए। इसके बाद 17 सितंबर को आयोग ने अंतरिम आदेश जारी करते हुए दोनों गुटों को अलग-अलग नाम और चुनाव चिह्न आवंटित कर दिए।
What's Your Reaction?
Like
0
Dislike
0
Love
0
Funny
0
Wow
0
Sad
0
Angry
0
Comments (0)