डिग्री पत्रकारिता की, ज्ञान व्हाट्सऐप का और नौकरी सत्ता की भक्ति में!
राजेन्द्र सिंह जादौन
समय के साथ पत्रकारिता बदली है। पहले पत्रकार समाज के लिए लड़ता था, सरकार से सवाल करता था और जनता की आवाज बनकर सत्ता के सामने खड़ा होता था। उस समय पत्रकारिता को नौकरी नहीं, जिम्मेदारी माना जाता था। पत्रकार खबर लिखने से पहले पढ़ता था, रिसर्च करता था, तथ्य जुटाता था, दस्तावेज खंगालता था और फिर उसकी कलम चलती थी। खबर में दम होता था, सवाल में वजन होता था और पत्रकार की पहचान उसकी कलम से होती थी।
आज पत्रकारिता के विश्वविद्यालयों ने पत्रकारों को उच्च शिक्षित तो बना दिया है, लेकिन सवाल यह है कि शिक्षा के साथ ज्ञान और विवेक कितना बढ़ा? डिग्रियां मिल गईं, प्रमाणपत्र मिल गए, बड़ी-बड़ी संस्थाओं में पढ़ाई हो गई, मगर क्या पत्रकारिता का मूल उद्देश्य भी समझ में आया? पहले पत्रकार किताबें पढ़ता था, सरकारी आदेशों का अध्ययन करता था, बजट समझता था और जनता की समस्याओं को लेकर अधिकारियों के दरवाजे खटखटाता था। आज कई पत्रकारों के लिए पढ़ने-लिखने से ज्यादा जरूरी यह हो गया है कि किस नेता का बयान चलाना है, किस विचारधारा का समर्थन करना है और किसके विरोध में बहस करनी है।
आज अंधभक्ति की डिग्री है, व्हाट्सऐप विश्वविद्यालय है, धर्म का ज्ञान है, रंगों का खेल है और पत्रकारिता के नाम पर वंदे भारत रेल है। पत्रकारिता की गाड़ी कहां जा रही है, यह पूछने वाला कोई नहीं। इंजन चमक रहा है, उद्घाटन हो रहा है, कैमरे चल रहे हैं, एंकर उत्साहित हैं और दर्शकों को बताया जा रहा है कि देश कितनी तेजी से आगे बढ़ रहा है। लेकिन कोई यह पूछने को तैयार नहीं कि आम आदमी की जिंदगी की रेल किस पटरी पर चल रही है?
अब खबर लिखने से पहले तथ्य जुटाने की जरूरत कम होती जा रही है। मोबाइल पर कोई संदेश आया, किसी ने वीडियो भेज दिया और खबर तैयार। व्हाट्सऐप पर जो लिखा है, वही ज्ञान बन गया। किसी ने सरकार की तारीफ कर दी तो उसे उपलब्धि मान लिया और किसी ने सवाल पूछ लिया तो उसकी नीयत पर सवाल उठने लगे। पहले पत्रकार खबर की पुष्टि करता था, आज कई बार खबर को अपनी विचारधारा के हिसाब से सही साबित करने की कोशिश करता है। तथ्य बाद में आते हैं, फैसला पहले हो जाता है।
पत्रकारिता के इस नए विश्वविद्यालय में पढ़ाई का तरीका भी बड़ा आसान है। संविधान पढ़ने की जरूरत नहीं, सरकारी योजनाओं का हिसाब समझने की जरूरत नहीं, बजट के आंकड़े देखने की जरूरत नहीं। बस कैमरे के सामने जोरदार आवाज में बोलना आना चाहिए। सरकार की उपलब्धियों का गुणगान करना आना चाहिए और विपक्ष के सवालों में खोट निकालना आना चाहिए। फिर आप भी पत्रकारिता के इस नए पाठ्यक्रम में उत्तीर्ण हो सकते हैं।
धर्म का ज्ञान होना गलत नहीं है। आस्था हर व्यक्ति का निजी विषय है और उसका सम्मान होना चाहिए। लेकिन जब आस्था के नाम पर सवाल पूछना बंद कर दिया जाए, तब समस्या शुरू होती है। मंदिरों में पूजा होनी चाहिए, धार्मिक आयोजन होने चाहिए, लोगों को अपनी आस्था के अनुसार जीवन जीने की स्वतंत्रता होनी चाहिए। मगर पत्रकार का काम केवल धार्मिक आयोजनों की तस्वीरें दिखाना नहीं है। उसी शहर में अस्पताल की हालत खराब है, स्कूलों में शिक्षक नहीं हैं, सड़कें टूटी हुई हैं और बेरोजगार युवा रोजगार के लिए भटक रहे हैं, तो इन सवालों को उठाना भी पत्रकारिता है।
आखिर जनता ने पत्रकार को इसलिए नहीं चुना कि वह हर दिन किसी नेता की तारीफ करे। जनता ने पत्रकार को कोई सरकारी पद नहीं दिया, लेकिन समाज ने उसे सवाल पूछने की जिम्मेदारी जरूर दी है। पत्रकार का काम सत्ता की आरती उतारना नहीं, बल्कि सत्ता से जवाब मांगना है। सरकार अच्छा काम करे तो उसकी तारीफ कीजिए, लेकिन गलत काम करे तो सवाल भी पूछिए। यही लोकतंत्र है और यही पत्रकारिता की असली पहचान है।
अब तो पत्रकारिता में रंगों का भी बड़ा महत्व हो गया है। खबर का रंग देखकर उसकी दिशा समझ में आने लगी है। किसकी गलती को बड़ा बनाना है और किसकी गलती को नजरअंदाज करना है, यह भी कई बार पहले से तय दिखाई देता है। सत्ता पक्ष का नेता बयान दे तो उसे बड़ी उपलब्धि की तरह दिखाया जाता है। विपक्ष सवाल उठाए तो उसके सवालों से ज्यादा उसकी नीयत पर चर्चा होने लगती है। जनता महंगाई पर सवाल करे तो उसे दूसरी बहस में उलझा दिया जाता है। बेरोजगारी का सवाल उठे तो चर्चा किसी और मुद्दे पर पहुंच जाती है।
ऐसे में पत्रकारिता और प्रचार के बीच का अंतर मिटने लगता है। पत्रकार का काम किसी पार्टी का प्रवक्ता बनना नहीं है। यदि पत्रकार को ही सरकार का पक्ष रखना है, तो फिर सरकारी सूचना विभाग और समाचार संस्थान के बीच अंतर क्या रह जाएगा? यदि हर खबर में तारीफ ही करनी है, तो फिर रिपोर्टिंग, रिसर्च और संपादन की जरूरत ही क्या है? सीधे प्रेस विज्ञप्ति उठाइए और उसे खबर बनाकर चला दीजिए।
वंदे भारत रेल की रफ्तार दिखाई जाती है, उसके उद्घाटन की खबर दिखाई जाती है और उसकी सुविधाओं पर चर्चा होती है। यह सब खबरें हैं, लेकिन क्या पत्रकारिता का काम केवल चमकती रेल दिखाना है? आम यात्री की परेशानियां, दूसरी ट्रेनों की स्थिति, टिकट की उपलब्धता और रेलवे की समस्याएं भी तो खबर हैं। विकास दिखाना जरूरी है, मगर विकास के दावों की पड़ताल करना उससे कम जरूरी नहीं। पत्रकारिता का काम इंजन की चमक दिखाने के साथ डिब्बे में बैठे यात्री की परेशानी सुनना भी है।
विडंबना देखिए, जो पत्रकार दूसरों से सवाल पूछता है, वही कई बार अपने ऊपर सवाल उठते ही नाराज हो जाता है। सरकार से जवाब मांगना उसका अधिकार है, लेकिन जब कोई उसकी खबर के तथ्य पूछ ले तो वह सवाल करने वाले की विचारधारा खोजने लगता है। मानो पत्रकारिता का नया नियम बन गया हो कि सवाल हम पूछेंगे, जवाब आप देंगे, लेकिन हमसे कोई सवाल नहीं करेगा। हमारे पास डिग्री है, माइक है, कैमरा है और हमारी विचारधारा का प्रमाणपत्र भी है।
हालांकि आज भी ऐसे पत्रकार हैं जो दबावों के बावजूद सच लिखते हैं, दस्तावेज पढ़ते हैं, तथ्यों की पुष्टि करते हैं और जनता के सवाल उठाते हैं। वे सीमित संसाधनों में काम करते हैं, आर्थिक संकट झेलते हैं और कई बार अपनी खबरों के कारण परेशानियां भी उठाते हैं। यही पत्रकारिता की उम्मीद हैं। समस्या शिक्षा या आस्था से नहीं, बल्कि उस सोच से है जिसमें सवाल पूछने के बजाय किसी का समर्थन करना ही पत्रकारिता समझ लिया जाता है।
पत्रकार को फिर से पढ़ना होगा। संविधान पढ़ना होगा, कानून समझना होगा, सरकारी आदेशों का अध्ययन करना होगा और जनता की समस्याओं को करीब से देखना होगा। पत्रकारिता का विश्वविद्यालय सड़क, अस्पताल, स्कूल, खेत, अदालत और सरकारी दफ्तर भी हैं। वहीं से असली खबरें निकलती हैं। वहां की सच्चाई समझे बिना केवल स्टूडियो में बैठकर पत्रकारिता का दावा करना आसान है, लेकिन जनता की आवाज बनना मुश्किल।
आखिर पत्रकार को भक्ति करनी है या पत्रकारिता? उसे जयकारे लगाने हैं या सवाल पूछने हैं? उसे सत्ता के दावों को दोहराना है या उन दावों की सच्चाई जनता के सामने रखनी है?
याद रखिए, पत्रकार का काम सत्ता की आरती उतारना नहीं, जनता के सवालों की मशाल जलाए रखना है। जिस दिन पत्रकार ने सवालों की जगह जयकारे को अपना धर्म बना लिया, उस दिन उसके हाथ में कलम तो रहेगी, लेकिन उसकी स्याही में लोकतंत्र की आवाज नहीं बचेगी।
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