छाता में लक्ष्मी नारायण चौधरी के सामने नया राजनीतिक चक्रव्यूह, क्या इस बार शुगर मिल का आंदोलन बनेगा बड़ी चुनौती?
गोपाल चतुर्वेदी
मथुरा। छाता विधानसभा क्षेत्र की राजनीति में शुगर मिल को दोबारा शुरू कराने की मांग एक बार फिर केंद्र में है। वर्षों से बंद पड़ी चीनी मिल को चालू कराने की मांग को लेकर चल रहा धरना अब केवल स्थानीय समस्या तक सीमित नहीं दिख रहा, बल्कि इसने कैबिनेट मंत्री और छाता विधायक लक्ष्मी नारायण चौधरी के सामने भी एक अहम राजनीतिक चुनौती खड़ी कर दी है। सवाल यह है कि क्या मंत्री अपने राजनीतिक गढ़ में उठ रहे विरोध के स्वर को शांत कर पाएंगे या फिर यह आंदोलन आने वाले समय में बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन जाएगा।
छाता में शुगर मिल को दोबारा शुरू कराने की मांग कोई नई नहीं है। अलग-अलग समय में किसान संगठनों और स्थानीय लोगों की ओर से मिल को लेकर धरना-प्रदर्शन होते रहे हैं। शुगर मिल संघर्ष समिति से जुड़े प्रतिनिधि भी लंबे समय से मिल को चालू कराने के लिए प्रयास करते रहे हैं। वर्ष 2026 में शुरू हुआ मौजूदा आंदोलन भी इसी लंबे संघर्ष की अगली कड़ी माना जा रहा है।
लक्ष्मी नारायण चौधरी छाता की राजनीति के पुराने और प्रभावशाली चेहरों में शामिल हैं। वह 2017 और 2022 में लगातार विधानसभा चुनाव जीत चुके हैं और इससे पहले भी क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। यही वजह है कि उनके विधानसभा क्षेत्र में चल रहा मौजूदा आंदोलन सामान्य राजनीतिक विरोध से अलग महत्व रखता है।
छाता विधानसभा क्षेत्र में अतीत में भी किसानों और स्थानीय संगठनों ने अलग-अलग मुद्दों को लेकर धरना-प्रदर्शन किए हैं। कई बार लोगों ने सड़क से लेकर तहसील तक अपनी आवाज उठाई, लेकिन इन आंदोलनों के बावजूद लक्ष्मी नारायण चौधरी चुनावी राजनीति में अपना प्रभाव बनाए रखने में सफल रहे। उनके समर्थक इसे उनकी राजनीतिक पकड़ और परिस्थितियों को अपने पक्ष में करने की क्षमता के तौर पर देखते हैं।
लेकिन इस बार परिस्थितियां कुछ अलग हैं। मौजूदा आंदोलन उस नेता के विधानसभा क्षेत्र में हो रहा है, जो प्रदेश सरकार में गन्ना और चीनी मिल से जुड़े विभाग के कैबिनेट मंत्री भी हैं। ऐसे में आंदोलनकारी जिस बंद पड़ी मिल को दोबारा शुरू कराने की मांग कर रहे हैं, उसके समाधान को लेकर मंत्री की भूमिका पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
मंत्री की ओर से सितंबर में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा शिलान्यास और अगले पेराई सत्र तक परियोजना तैयार होने की बात कही गई है। आंदोलन कर रहे पूर्व सैनिकों को भी परियोजना के आगे बढ़ने का भरोसा दिया गया है। हालांकि, अब लोगों की नजर केवल घोषणाओं पर नहीं, बल्कि जमीन पर होने वाले काम और उसके परिणाम पर है।
यही स्थिति इस आंदोलन को लक्ष्मी नारायण चौधरी के लिए राजनीतिक परीक्षा बना रही है। सवाल उठ रहे हैं कि क्या शिलान्यास तय समय पर होगा? क्या परियोजना का निर्माण जमीन पर तेजी से दिखाई देगा? क्या अगली गन्ने की फसल तक मिल शुरू हो पाएगी? और सबसे अहम सवाल यह है कि वर्षों से बंद पड़ी चीनी मिल में वास्तव में उत्पादन कब शुरू होगा?
इन सवालों के जवाब आने वाले समय में तय करेंगे कि मौजूदा धरना भी पिछले आंदोलनों की तरह आश्वासन के बाद समाप्त हो जाता है या फिर यह छाता विधानसभा की राजनीति में बड़ा मुद्दा बनता है। यदि परियोजना समय पर पूरी होती है और मिल दोबारा चलती है, तो इसका श्रेय मंत्री लक्ष्मी नारायण चौधरी की राजनीतिक उपलब्धि के तौर पर भी लिया जा सकता है। दूसरी ओर, यदि घोषणाओं और शिलान्यास के बावजूद मिल शुरू नहीं हो पाती, तो आंदोलन उनके लंबे राजनीतिक सफर के सामने एक कठिन सवाल बन सकता है।
फिलहाल छाता में राजनीतिक चक्रव्यूह तैयार है। एक तरफ लक्ष्मी नारायण चौधरी की वर्षों पुरानी राजनीतिक पकड़ है तो दूसरी तरफ शुगर मिल को लेकर लंबे समय से चली आ रही जनता और किसानों की मांग। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि इस बार आंदोलन का अंत किस रूप में होता है।
छाता का सवाल अब केवल यह नहीं है कि धरना हुआ या नहीं। असली सवाल यह है कि धरने के बाद शुगर मिल चली या एक बार फिर आश्वासन ही चलता रहा। यही तय करेगा कि यह आंदोलन इतिहास की पुनरावृत्ति है या छाता की राजनीति में एक नई कहानी की शुरुआत।
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