स्टूडियो पत्रकारिता ने खबरों को बहस और शोर में बदला, तथ्य सबसे पीछे छूटे
पत्रकारिता की बदलती दिशा पर लिखे गए एक विचार लेख में कहा गया है कि स्टूडियो आधारित पत्रकारिता ने समाचारों की मूल भावना को प्रभावित किया है। लेख के अनुसार, पत्रकार और एंकर की भूमिकाएं अलग-अलग हैं। पत्रकार का दायित्व घटनास्थल पर जाकर तथ्य जुटाना और सभी पक्षों को सामने लाना है, जबकि एंकर का कार्य उन्हीं तथ्यों के आधार पर कार्यक्रम का संचालन और दर्शकों तक जानकारी पहुंचाना होता है।
लेख में कहा गया है कि जब एंकर स्वयं खबर का केंद्र बन जाता है, पूर्व निर्धारित निष्कर्षों के साथ बहस चलाता है और व्यक्तिगत विचारों को तथ्यों से ऊपर रखता है, तब पत्रकारिता की विश्वसनीयता कमजोर होने लगती है। इसमें यह भी कहा गया है कि पत्रकार होने का दावा केवल कैमरे के सामने दिखाई देने से नहीं, बल्कि पेशे की नैतिक जिम्मेदारियों का पालन करने से सिद्ध होता है।
लेख के अनुसार, पिछले कुछ वर्षों में टीवी पत्रकारिता का एक वर्ग सत्ता के पक्ष या विपक्ष में स्पष्ट झुकाव रखने के आरोपों का सामना करता रहा है। लेखक का मानना है कि पत्रकारिता का उद्देश्य किसी विचारधारा या राजनीतिक पक्ष का समर्थन या विरोध नहीं, बल्कि तथ्य आधारित निष्पक्ष जानकारी जनता तक पहुंचाना होना चाहिए।
लेख में यह भी कहा गया है कि ग्राउंड रिपोर्टर जोखिम उठाकर जानकारी जुटाते हैं, लेकिन कई बार अंतिम प्रस्तुति और नैरेटिव स्टूडियो में तय होता है। इससे मैदान में काम करने वाले पत्रकारों की मेहनत पीछे छूट जाती है और खबर की दिशा बदल सकती है।
लेख के अंत में कहा गया है कि पत्रकारिता की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए स्टूडियो और एंकरों को अपनी भूमिका की सीमाओं को समझना होगा, ग्राउंड रिपोर्टिंग का सम्मान करना होगा और किसी भी विचारधारा से ऊपर तथ्यों को प्राथमिकता देनी होगी। तभी पत्रकारिता लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में अपनी भूमिका प्रभावी ढंग से निभा सकेगी।
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