संत तो अनेक हैं, लेकिन 'संतत्व' विरलों में—आचार्य सुधासागर से मुलाकात ने बदली सोच

Friday, July 3, 2026 - 12:29
Updated: 2 months ago
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संत तो अनेक हैं, लेकिन 'संतत्व' विरलों में—आचार्य सुधासागर से मुलाकात ने बदली सोच

एक ऐसी छवि जिसमें कोई शुभ्र, पीत या भगवावेष धारी व्यक्ति दिखाई पड़ता है। साधु का अर्थ है आध्यात्म के किसी एक मार्ग को अपनाकर ईश्वर रूपी परमसत्य को प्राप्त करने वाले साधक। संत इसके आगे की अवस्था है। "संत" जिन्होंने ईश्वर रूपी परमसत्य का साक्षात्कार कर लिया ईश्वर को पा लिया अब चराचर जगत की बेशकीमती भौतिक वस्तुएं भी उसके लिए मिट्टी के समान हैं।

विगत दिवस जब आचार्य श्री सुधासागर जी के पूज्यपाद स्पर्श का पुण्य अवसर मिला तो उनकी जीवनचर्या से भान हुआ कि यदि धरती पर संतत्व को कोई प्राप्त करता है तो वह जैन धर्म के संत ही हैं। जब मैं आचार्य श्री के दर्शनों को बजरंगगढ़ रोड स्थित नसिया जी गया था तब रात के आठ बजे थे। दर्शन में थोड़ा समय बाकी था।

मेरे साथ जैन समाज के मित्र अंकित जैन थे। मैने उनसे पूछा आचार्य श्री कहां हैं, उन्होंने नसिया जी में बनी धर्मशाला के प्रथम तल पर बने एक अंधेरे कमरे की ओर इशारा कर बताया कि उस कमरे में ठहरे हैं। मैने पूछा कि कमरे में अंधेरा क्यों है? वह बोला हमारे संत अपने कक्ष में लाइट नहीं जलाते, पंखा भी नहीं चलाते, मच्छर से बचने अगरबत्ती ऑल आउट कुछ भी नहीं लगाते। मैं गर्मी से परेशान था अब ये सुनकर हैरान भी था।

वह आगे बोला लकड़ी के तखत पर बिना कुछ ओढ़े बिछाए सोते हैं। दस साढ़े दस बजे तक सो जाते हैं लेकिन सुबह जल्दी उठते हैं, बड़ी कठिन तपस्या है। बातों बातों में नौ बज गए। आचार्य श्री छत पर दर्शनों के लिए एक तखत पर बैठे थे। पंक्ति में लगकर मैने दर्शन किए। संतश्री के चरण स्पर्श किए तो हाथों में आई एक सुगंध ने मन मोह लिया।

अब अंकित से फिर मेरा सवाल था कि संत लोग नहाने के बाद कौन सा इत्र लगाते हैं बड़ी अच्छी खुशबू आ रही थी। वो मेरी बात सुनकर हंसा फिर बोला भैयाजी कैसी बात कर रहो हो, हमारे संत स्नान भी नहीं करते, वो भोजन पानी भी अपने संकल्प के अनुसार हाथों की अंजुली बनाकर एक बार ही करते हैं। दाढ़ी बाल जब बढ़ जाते हैं तो उन्हें भी हाथों से ही निकालते हैं।

वो तो कार्यक्रमों में भी ज्यादा लाइट चकाचौंध के लिए मना करते हैं। स्टेज पर खूब प्रोग्राम चलते रहें, वो उस और ध्यान भी नहीं देते। अपने ही ध्यान में मग्न रहते हैं। महिलाओं की ओर तो देखते तक नहीं हैं, महिलाएं उन्हें छू भी नहीं सकतीं। संत हैं उन्हें दुनिया की चमक धमक से क्या लेना देना। कल सुबह आचार्य श्री को दूसरे मंदिर जाना है सुबह ही नंगे पांव पैदल चल देंगे। 

मैने पंच कल्याणक महोत्सव के बारे में पूछा कि कितने पैसे इकट्ठा हुए होंगे। उसने बताया कि करोड़ों रुपए इकट्ठा हुए हैं। महाराज श्री के कारण पैसा खिंचा चला आता है। सारा पैसा यहीं रह जाएगा। समाज का ट्रस्ट एक एक पैसे का हिसाब रखता है। मंदिर धर्मशाला की व्यवस्था में उस पैसे का उपयोग होगा। अब आचार्य श्री के सानिध्य में गुना में पांच मंदिरों में भगवान की प्राण प्रतिष्ठा हो गई है इसलिए रोज भगवान का अभिषेक अनिवार्य रूप से करना ही होगा। 

मैने फिर पूछा बरसात सिर पर है आचार्य श्री पैदल आगे जाएंगे तो रास्ते में सभी जगह समाज की धर्मशाला तो पड़ेगी नहीं, क्यों न समाज के लोग एक वैन में कमरा बनवा दें, वैन साथ साथ चले, जहां रुकना हो आचार्य श्री उसमें रुक जाएं। वो बोला कि उन्हें ये ही तो नहीं करना है,, फिर मतलब ही क्या रह जाएगा,, वो तो रास्ते में सरकारी स्कूल के कमरे में रुकना पसंद करेंगे लेकिन सुख सुविधाएं नहीं चाहिए।

आर्थिक रूप से अत्यंत सक्षम समाज के आचार्यश्री को पैसे का कोई मोह नहीं है, न ही उन्हें पैसे की कोई जरूरत है। तन पर वस्त्र नहीं है। भोजन के लिए थाली नहीं है। भगवान के भोग के लिए बनाई गई छप्पन भोग की प्रसादी पाने का कोई बहाना नहीं है। सोने चांदी का सिंहासन नहीं हैं। कंधे पर बिठाने के लिए आतुर लाखों अनुयायियों के होते हुए भी कोई रत्न जड़ित पालकी नहीं है। 

करोड़ों अरबों मूल्य के सुविधा संपन्न निजी आश्रम-मठ नहीं है। उन पर कब्जे को लेकर कोई विवाद नहीं है। किसी का विवादित पट्टाभिषेक नहीं है। राजसी अंदाज में किसी घाट पर स्नान की जिद को लेकर कोई विवाद नहीं है। किसी राजनैतिक दल पर कोई टीका टिप्पणी नहीं है। महंगी विदेशी गाड़ियां तो दूर पैरों में खड़ाऊं तक नहीं है। किसी से राग नहीं है। किसी से द्वेष नहीं है। अपने ज्ञान का कोई अहंकार नहीं है। 

और सबसे बड़ी बात कि धर्म का रक्षक, संरक्षक या बड़ा संत होने का कोई घमंड नहीं है। यही तो संतत्व है। संतत्व जिसमें खुद को समाज कल्याण के लिए बिना किसी अपेक्षा के पूरी तरह न्यौछावर कर देना है, जिसमें खुद के लिए कोई चाह नहीं है, जिसमें सिर्फ ईश्वर प्रदत्त ज्ञान और दिशा देने का भाव है। जिनमें ये गुण हैं वही संत हैं। 

ऐसे संत से मिलकर मुझे तो संत का व्यवहारिक अर्थ समझ में आ गया और अब संत के वेष में घूम रहे कई लोग जिनमें ये गुण हैं ही नहीं जो भोगविलास, अहंकार, सुख सुविधा, लक्जरी गाड़ी, आलीशान आश्रम, रंग बिरंगी पोशाकें, खुद के कल्याण के लिए तमाम नग नगीने धारण किए दिखाई देते हैं वो सब व्यापारी नज़र आने लगे हैं। 

ईश्वर मुझ मूढ़मति को सद्बुद्धि प्रदान करे।

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