दो दशक में तीन गिरफ्तारियां, फिर भी नहीं बदला शाबिर: लश्कर से जुड़कर फैलाता रहा आतंकी नेटवर्क
नई दिल्ली (आरएनआई): आतंकवाद की राह पर चलने वाला शाबिर कानून के शिकंजे और जेल की सजा के बावजूद अपनी गतिविधियों से बाज नहीं आया। पिछले दो दशकों में तीन बार गिरफ्तारी और सजा के बावजूद उसमें कोई सुधार नहीं दिखा और वह लगातार लश्कर-ए-तैयबा से जुड़कर आतंकी नेटवर्क को मजबूत करता रहा।
जांच एजेंसियों के अनुसार, शाबिर का कट्टरपंथ की ओर झुकाव वर्ष 2004-05 के दौरान शुरू हुआ, जब वह लश्कर-ए-तैयबा के संपर्क में आया। इसके बाद वह पाकिस्तान जाकर दो बार आतंकी प्रशिक्षण ले चुका है। गांदरबल के कंगन इलाके स्थित उसके घर पर लश्कर के कई कुख्यात आतंकियों—अबू हुजैफा, अबू बकर और फैसल—का आना-जाना रहता था। इन्हीं के संपर्क में आकर वह संगठन का सक्रिय सदस्य बन गया।
पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक, शाबिर को वर्ष 2007 और 2016 में भी गिरफ्तार किया गया था। 2016 में उसे जम्मू-कश्मीर के परिमपोरा इलाके से हथियारों के साथ पकड़ा गया था, उस समय उसका साथी सज्जाद गुल था। सज्जाद गुल, जो बाद में पाकिस्तान भाग गया, वर्तमान में ‘द रेजिस्टेंस फ्रंट (टीआरएफ)’ नामक संगठन का संचालन कर रहा है। उसके पाकिस्तान जाने के बाद शाबिर भारत और बांग्लादेश में उसका प्रमुख सहयोगी बन गया।
जांच में यह भी सामने आया है कि शाबिर के संपर्क 26/11 हमलों के मास्टरमाइंड हाफिज सईद और ऑपरेशन चीफ जकीउर रहमान लखवी तक थे, जिससे उसकी भूमिका और अधिक गंभीर हो जाती है।
हाल के इनपुट के मुताबिक, 2025 में पाकिस्तान में बैठे आतंकी सरगना सुमामा बाबर के निर्देश पर शाबिर ने अपनी रणनीति बदली और कश्मीर से बाहर अन्य राज्यों को निशाना बनाने की योजना बनाई। इसके तहत वह हरियाणा के गुरुग्राम में जाकर रहने लगा और वहां से अपने नेटवर्क को फैलाना शुरू किया।
बताया गया है कि उसने पश्चिम बंगाल के मालदा निवासी उमर फारूक को अपने प्रभाव में लिया, जिसने बाद में दिल्ली के सुप्रीम कोर्ट मेट्रो स्टेशन के पास देशविरोधी पोस्टर लगाए। जांच में यह भी खुलासा हुआ कि शाबिर ने कोलकाता के एक इलाके को अपना नया ठिकाना बना लिया था और वहां से आतंकी गतिविधियों को अंजाम देने की योजना बना रहा था।
एजेंसियों के मुताबिक, तमिलनाडु के तिरुपुर में अवैध रूप से रह रहे कुछ बांग्लादेशी नागरिकों को कोलकाता लाकर बड़े हमले की साजिश रची जा रही थी। दिल्ली और कोलकाता में लगाए गए पोस्टरों को भी इसी साजिश का हिस्सा माना जा रहा है। पुलिस का कहना है कि यह पूरी कार्रवाई एक तरह की ‘टेस्टिंग’ थी, जिसके जरिए यह परखा जा रहा था कि नए भर्ती किए गए लोग बिना पकड़े कितनी प्रभावी तरीके से काम कर सकते हैं।
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