चुनाव आयोग के हलफनामे पर रितिका चोपड़ा के सवाल, 14 आपत्तियों पर जवाब नहीं मिलने का दावा
नई दिल्ली। भारतीय निर्वाचन आयोग की ओर से सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे को लेकर ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की पत्रकार रितिका चोपड़ा ने कई सवाल उठाए हैं। उन्होंने अपनी रिपोर्ट में आयोग के जवाब का बिंदुवार विश्लेषण करते हुए कहा कि हलफनामे में आयोग के दो चुनाव आयुक्तों की ओर से दर्ज की गई 14 आपत्तियों का स्पष्ट खंडन नहीं किया गया है। ये आपत्तियां पिछले 10 महीनों के दौरान मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) और आयोग के कामकाज से जुड़े विभिन्न फैसलों को लेकर दर्ज की गई थीं।
चुनाव आयोग ने अपने हलफनामे में कहा है कि एसआईआर से जुड़े प्रमुख फैसले तीनों सदस्यों की सहमति से लिए गए थे। आयोग के अनुसार, किसी चुनाव आयुक्त की ओर से दर्ज की गई टिप्पणी या सुझाव अपने आप में आयोग का अंतिम फैसला नहीं होता, बल्कि यह निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा है। हालांकि, रितिका चोपड़ा के विश्लेषण के मुताबिक, हलफनामे में उन परिस्थितियों का विस्तृत जवाब नहीं दिया गया है, जिनमें चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने कुछ फैसलों की जानकारी उन्हें बाद में मिलने पर आपत्तियां दर्ज की थीं।
फॉर्म-6 को लेकर आयोग ने स्पष्ट किया कि एसआईआर के लिए इस्तेमाल किया गया घोषणा-पत्र अलग दस्तावेज था और वैधानिक फॉर्म में संशोधन नहीं किया गया था। हालांकि, आयोग ने यह भी स्वीकार किया कि ऑनलाइन आवेदन में घोषणा-पत्र को जिस तरह प्रदर्शित किया गया, उससे फॉर्म-6 में बदलाव होने का आभास हो सकता था। आयोग के मुताबिक, इस व्यवस्था में सुधार की जरूरत थी और 21 अक्टूबर को ऑनलाइन प्रक्रिया में फॉर्म-6 तथा एसआईआर घोषणा-पत्र को अलग-अलग कर दिया गया। रितिका चोपड़ा ने सवाल उठाया कि ऑनलाइन फॉर्म में यह बदलाव किसके निर्देश पर किया गया और पहले दर्ज की गई आपत्तियों के बावजूद इसे लागू कैसे किया गया।
पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची में नाम शामिल किए जाने के खिलाफ दायर अपीलों के मामले में आयोग ने कहा कि ये अपीलें राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय के अधिकारियों ने दाखिल की थीं और आयोग के समक्ष ये मामले नहीं लाए गए थे। रिपोर्ट के अनुसार, यह स्पष्टीकरण चुनाव आयुक्त संधू की पहले दर्ज टिप्पणी से जुड़े सवालों का पूरी तरह समाधान नहीं करता। इसी तरह, गोवा में मतदाता सूची से बाहर रह गए 97 लोगों के मामले में आयोग ने बताया कि उनमें से 88 ने बाद में फॉर्म-6 के जरिए आवेदन किया। पत्रकार ने सवाल उठाया कि इससे पहले सॉफ्टवेयर ने निर्वाचक पंजीकरण अधिकारियों के फैसलों को लागू करने में बाधा क्यों डाली थी।
हलफनामे में आयोग ने यह भी पुष्टि की कि एक वरिष्ठ अधिकारी की ओर से कामकाज के पुनर्वितरण का आदेश जारी किया गया था, जिसे दोनों चुनाव आयुक्तों के हस्तक्षेप के बाद लागू नहीं किया गया। हालांकि, रिपोर्ट के अनुसार, इस आदेश को जारी करने की परिस्थितियों और संबंधित अधिकारियों की भूमिका पर हलफनामे में विस्तृत जानकारी नहीं दी गई है।
रितिका चोपड़ा के विश्लेषण का मुख्य सवाल यह है कि यदि आयोग के फैसले सर्वसम्मति से लिए गए थे, तो दोनों चुनाव आयुक्तों को कुछ फैसलों की जानकारी उनके लागू होने के बाद क्यों मिली। वहीं, चुनाव आयोग ने अपने हलफनामे में निर्णय प्रक्रिया का बचाव करते हुए कहा है कि प्रमुख फैसले सामूहिक सहमति से लिए गए। इस मामले में आयोग की कार्यप्रणाली, पारदर्शिता और आंतरिक निर्णय प्रक्रिया से जुड़े सवालों पर सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
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