वंदे मातरम के सभी छह अंतरे अनिवार्य करने पर सुप्रीम कोर्ट ने मांगा जवाब
नई दिल्ली। राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम’ के सभी छह अंतरों को गाने या बजाने की अनिवार्यता को चुनौती देने वाली दो याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया। याचिकाकर्ताओं ने गृह मंत्रालय के 28 जनवरी और 9 जुलाई 2026 के आदेशों को चुनौती देते हुए धार्मिक स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की आजादी और धर्मनिरपेक्षता के संवैधानिक सिद्धांतों का हवाला दिया है। अदालत ने मामले की अगली सुनवाई 30 नवंबर को निर्धारित की है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने बौद्ध सामाजिक कार्यकर्ता बीडी बोरकर और केरल के पूर्व आईएएस अधिकारी बालकृष्णन सत्यभामा मावोजी की याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए केंद्र से जवाब मांगा। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि गृह मंत्रालय के आदेशों के जरिए राष्ट्रगीत के सभी छह अंतरों को निर्धारित सरकारी आयोजनों में अनिवार्य करना नागरिकों के मौलिक अधिकारों को प्रभावित कर सकता है।
पहले दो और छह अंतरों वाले संस्करण में क्या अंतर है?
याचिकाकर्ताओं के अनुसार, स्वतंत्रता के बाद राष्ट्रीय समारोहों में आमतौर पर ‘वंदे मातरम’ के पहले दो अंतरे गाए जाते रहे हैं। इन अंतरों में मातृभूमि की प्राकृतिक सुंदरता और उसके प्रति सम्मान का वर्णन है। वहीं, गीत के विस्तृत संस्करण के बाद के चार अंतरों में दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती जैसी हिंदू देवियों का उल्लेख मिलता है। ये अंतरे बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय के उपन्यास ‘आनंदमठ’ में शामिल हैं।
याचिकाकर्ताओं ने दलील दी है कि सभी छह अंतरों को अनिवार्य करने से उन नागरिकों की धार्मिक मान्यताओं और अंतरात्मा की स्वतंत्रता पर असर पड़ सकता है, जो इन धार्मिक संदर्भों से सहमत नहीं हैं। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि क्या केंद्र सरकार कार्यकारी आदेशों के माध्यम से राष्ट्रगीत के प्रचलित स्वरूप और उसके गायन की व्यवस्था में इस तरह बदलाव कर सकती है।
क्या किसी नागरिक को राष्ट्रगीत गाने के लिए मजबूर किया जा सकता है?
याचिकाकर्ताओं ने संविधान के अनुच्छेद 19(1)(क) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, अनुच्छेद 25 के तहत धर्म और अंतरात्मा की स्वतंत्रता तथा अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और गरिमा के अधिकार का हवाला दिया है। उनका कहना है कि किसी व्यक्ति को उसकी अंतरात्मा या धार्मिक मान्यताओं के विरुद्ध राष्ट्रगीत गाने के लिए बाध्य नहीं किया जाना चाहिए और ऐसा करने से इनकार करने पर दंडित भी नहीं किया जाना चाहिए।
इससे पहले कर्नाटक संगीत के गायक टी.एम. कृष्णा ने भी राष्ट्रगीत के सभी छह अंतरों को अनिवार्य करने और इससे जुड़े दंडात्मक प्रावधानों को चुनौती दी थी। उस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अंतरात्मा के आधार पर राष्ट्रगीत नहीं गाने वाले व्यक्ति के अधिकारों पर विचार करने की बात कही थी।
फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से जवाब मांगा है, लेकिन याचिकाओं में उठाए गए तर्कों पर अंतिम फैसला नहीं सुनाया है। अब अगली सुनवाई में यह महत्वपूर्ण होगा कि सरकार इन आदेशों का कानूनी आधार और नागरिकों के मौलिक अधिकारों से जुड़े सवालों पर क्या पक्ष रखती है।
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