गुना में महर्षि महेश योगी संस्कृत विद्यालय की जमीन बिकने की चर्चा, भूमाफियाओं की नजर
गुना (आरएनआई) बजरंगगढ़ रोड स्थित महर्षि महेश योगी संस्कृत विद्यालय/आश्रम की जमीन बिकाऊ है। यह चर्चा आम होते ही गुना शहर के साथ साथ आसपास के जिलों के भूमाफिया, कॉलोनाइजर, दलाल इसके आसपास मंडराने लगे हैं। जब महर्षि महेश योगी भारत में जगह जगह ऐसे आश्रम, स्कूल, विश्वविद्यालय बना रहे थे तब किसी ने सोचा भी नहीं था कि उनके अवसान के कुछ समय बाद ही ये संस्थान न केवल बंद होने लगेंगे बल्कि जमीनें तक बिकने की कगार पर पहुंच जाएंगी।
1918 में जन्मे महर्षि महेश योगी का जीवन एक साधारण शुरुआत से लेकर वैश्विक आध्यात्मिक गुरु बनने और फिर विवादों के साये में 2008 में खामोश हो जाने तक का एक अत्यंत रोचक सफर रहा है। वे 'ट्रांसेंडेंटल मेडिटेशन' (भावातीत ध्यान) तकनीक के जनक के रूप में दुनिया भर में प्रसिद्ध हुए, जिसने 60 और 70 के दशक में पश्चिमी दुनिया में ध्यान की लहर ला दी थी।
महेश योगी ने ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती के अनुयायी बनने के बाद 13 वर्ष तक वेदों और ध्यान योग का गहरा अध्ययन किया। उत्तरकाशी की गुफाओं में समय बिताया और 1955 में हिमालय से निकलकर सामान्य लोगों को ध्यान सिखाने का फैसला किया, जिसे उन्होंने 'ट्रांसेंडेंटल मेडिटेशन' (TM) नाम दिया। 60-70 के दशक में उनका डंका दुनिया भर में बज रहा था
1958 में उन्होंने अपना पहला विश्व दौरा शुरू किया था। 1968 में, मशहूर बैंड 'द बीटल्स' (The Beatles) और अन्य हस्तियों के उनके ऋषिकेश आश्रम में आने से वे रातों-रात वैश्विक हस्ती बन गए। देश के साथ साथ विदेशी मीडिया में उन्हें खूब प्रचार मिला और लोग उन्हें "गीगलिंग गुरु" (हंसने वाले गुरु) के रूप में जानने लगे।
ख्याति बढ़ने के साथ ही विवादों से भी महेश योगी का नाम जुड़ा। ऋषिकेश प्रवास के दौरान, यौन दुराचार के आरोपों के बाद बीटल्स, विशेषकर जॉन लेनन) ने महर्षि से रिश्ता तोड़ लिया। आश्रम में मिया फैरो सहित कुछ महिलाओं के साथ महर्षि पर अनुचित व्यवहार का आरोप लगा, हालांकि इन आरोपों को पूरी तरह सिद्ध नहीं किया गया और कुछ ने इसे ड्रग्स से जोड़कर भी देखा।
1960 के दशक में भारतीय संसद में यह आरोप भी लगा कि महर्षि विदेशी जासूसों को अपने आश्रम में पनाह दे रहे हैं, जिसे उन्होंने बेबुनियाद बताया था। लगातार विवादों में नाम आने के बाद, महर्षि ने भारत छोड़ दिया और 1990 में नीदरलैंड के वलोड्रोप चले गए। वहां उन्होंने 'ग्लोबल कंट्री ऑफ वर्ल्ड पीस' का गठन किया और खुद को एक एकांतवासी व्यक्तित्व के रूप में स्थापित किया।
अपने जीवन के अंतिम वर्षों में, वे जनता के बीच बहुत कम आते थे और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए ही संवाद करते थे। उन्होंने 2008 में अपनी अंतिम सांस लेने से कुछ दिन पहले ही पूरी तरह खामोशी ले ली थी। इससे पहले उन्होंने भारत में ध्यान योग वैदिक शिक्षा और संस्कृत के प्रचार के उद्देश्य से जगह जगह आश्रम/ स्कूल स्थापित किए थे।
गुना से पांच किमी दूर बजरंगगढ़ रोड पर भी करीब 152 बीघा जमीन खरीदकर उसमें करोड़ों रुपए की लागत से भवन बनवाए गए थे। तब यहां एक नई दुनिया दिखाई पड़ती थी। इस भवन में शुरुआती दिनों में स्कूल संचालित किया गया। बाद में आश्रम में विद्वान आचार्य, बटुकों को संस्कृत और वेद का अध्ययन कराने लगे।
अब ये जमीन बिकने को है। जिसे खरीदने के लिए भूमाफिया कॉलोनाइजर दलाल भोपाल और नोएडा तक के चक्कर काट काटकर चकरघिन्नी हुए जा रहे हैं। सौदा बड़ा होने से और भविष्य में मोटा मुनाफा मिलने के आसार होने से लालच में इस जमीन का सौदा सांप नेवला भी मिलकर करने को मरे जा रहे हैं।
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