संपादकीय: योगी की सौगातों का हिसाब दो, मथुरा पूछ रहा है—करोड़ों की घोषणाओं से कितना बदला शहर?
गोपाल चतुर्वेदी
मथुरा। जन्माष्टमी मथुरा के लिए सिर्फ भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव का पर्व नहीं है। हर साल इस अवसर पर विकास की नई घोषणाएं, परियोजनाओं के लोकार्पण और शिलान्यास भी चर्चा में रहते हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ कई बार जन्माष्टमी के अवसर पर मथुरा पहुंच चुके हैं और इस दौरान करोड़ों-अरबों रुपये की परियोजनाओं की सौगातों का ऐलान हुआ है। लेकिन अब सवाल घोषणाओं की संख्या का नहीं, उनके जमीन पर उतरने का है।
2019 में करीब 236 करोड़ रुपये की परियोजनाओं की चर्चा हुई। 2018 से 2022 के बीच करीब 400 करोड़ रुपये की 102 परियोजनाएं स्वीकृत होने और इनमें लगभग 75 प्रतिशत के पूरा होने का दावा किया गया। 2022 की जन्माष्टमी पर करीब 5 करोड़ रुपये की लागत से अन्नपूर्णा भवन का लोकार्पण हुआ। 2024 में अलग-अलग रिपोर्टों में 583 करोड़ से लेकर 1037 करोड़ रुपये तक की परियोजनाओं के आंकड़े सामने आए। वहीं 2025 में 646 करोड़ रुपये की 118 परियोजनाओं के लोकार्पण और शिलान्यास के साथ ब्रज के समग्र विकास के लिए 30 हजार करोड़ रुपये की कार्ययोजना की घोषणा की गई।
ये आंकड़े निश्चित रूप से बड़े हैं। लेकिन इतने बड़े निवेश और घोषणाओं के बाद स्वाभाविक सवाल उठता है कि मथुरा की तस्वीर वास्तव में कितनी बदली? कितनी परियोजनाएं पूरी हो चुकी हैं, कितनी निर्माणाधीन हैं और कितनी ऐसी हैं जिनका लाभ जनता को अभी मिलना बाकी है?
मथुरा के विकास का सबसे बड़ा पैमाना यमुना को माना जाना चाहिए। घाटों का सौंदर्यीकरण, रोशनी और प्रवेश द्वार अपनी जगह महत्वपूर्ण हैं, लेकिन यमुना की स्थिति अब भी सवाल खड़े करती है। जन्माष्टमी जैसे बड़े आयोजनों के दौरान जाम, पार्किंग, यातायात, सीवर, सफाई और सार्वजनिक सुविधाओं को लेकर बार-बार अस्थायी व्यवस्थाओं की जरूरत पड़ती है। ऐसे में यह जानना जरूरी है कि स्थायी परियोजनाओं का असर आम नागरिक के रोजमर्रा के जीवन में कितना दिखाई दे रहा है।
यमुना क्रूज परियोजना भी इसी सवाल को और गंभीर बनाती है। जिस परियोजना को धार्मिक पर्यटन के लिए नया आकर्षण बताया गया था, उसके संचालन को लेकर बाद में सवाल उठे। यदि किसी बड़ी पर्यटन परियोजना का नियमित संचालन नहीं हो पाता, तो केवल निर्माण और लोकार्पण पर्याप्त नहीं माने जा सकते। योजना, संचालन, रखरखाव और निगरानी—हर स्तर पर जवाबदेही तय होना जरूरी है।
आज एक तरफ ब्रज के समग्र विकास के लिए 30 हजार करोड़ रुपये की कार्ययोजना का लक्ष्य सामने है, वहीं दूसरी तरफ जनता पिछली घोषणाओं और परियोजनाओं का हिसाब चाहती है। सवाल सीधा है—2019 के 236 करोड़ रुपये की परियोजनाओं की वर्तमान स्थिति क्या है? 2018 से 2022 के बीच स्वीकृत 102 परियोजनाओं में कितनी पूरी हुईं और कितनी अभी बाकी हैं? 2024 में सामने आए 583 करोड़ और 1037 करोड़ रुपये के अलग-अलग आंकड़ों में वास्तविक सरकारी आंकड़ा कौन-सा है? 2025 की 646 करोड़ रुपये की 118 परियोजनाओं में कितनी पूरी हो चुकी हैं? और 30 हजार करोड़ रुपये की कार्ययोजना में अब तक जमीन पर क्या दिखाई दे रहा है?
ये सवाल किसी सरकार का विरोध करने के लिए नहीं, बल्कि जनता के पैसे और उसके अधिकार का हिसाब जानने के लिए हैं। सरकारें योजनाएं घोषित करें, मुख्यमंत्री मथुरा आएं और विकास परियोजनाएं दें—इसका स्वागत होना चाहिए। लेकिन लोकतंत्र में घोषणा के साथ मूल्यांकन भी उतना ही जरूरी है।
घोषणा विकास नहीं होती, शिलान्यास परिणाम नहीं होता और उद्घाटन सफलता की गारंटी नहीं होता। किसी परियोजना की असली सफलता तभी है, जब वह समय पर पूरी हो, उसका सही संचालन हो और उसका लाभ आम जनता तक पहुंचे।
मथुरा को अब केवल शिलान्यास और लोकार्पण की पट्टिकाएं नहीं चाहिएं। उसे 365 दिन दिखाई देने वाला विकास चाहिए। जन्माष्टमी के कुछ दिनों की चमक से आगे बढ़कर शहर को बेहतर यातायात, स्वच्छ यमुना, मजबूत सीवर व्यवस्था, पर्याप्त पार्किंग, साफ-सफाई और ऐसी पर्यटन सुविधाएं चाहिएं जो पूरे साल चलें।
अगली जन्माष्टमी पर यदि फिर कोई नई सौगात घोषित होती है तो उसके साथ पिछली परियोजनाओं की प्रगति रिपोर्ट भी जनता के सामने रखी जानी चाहिए। कितना स्वीकृत हुआ, कितना जारी हुआ, कितना खर्च हुआ, क्या बना, क्या चालू है और क्या अब भी अधूरा है—इन सभी सवालों का स्पष्ट जवाब मिलना चाहिए।
क्योंकि अब मथुरा यह नहीं पूछ रहा कि कितने करोड़ रुपये की सौगात मिली।
मथुरा पूछ रहा है—उन करोड़ों रुपये से मथुरा कितना बदला?
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