बहरीन में हवाई हमले का अलर्ट, सायरन बजे; ईरानी हमलों में अब तक 140 अमेरिकी सैनिक घायल
पश्चिम एशिया (आरएनआई)। पश्चिम एशिया में जारी युद्ध लगातार गंभीर होता जा रहा है। ईरान, अमेरिका और इज़राइल के बीच बढ़ते सैन्य टकराव के बीच संघर्ष अब बारहवें दिन में प्रवेश कर चुका है। क्षेत्र में मिसाइल और ड्रोन हमलों का दौर जारी है और कई खाड़ी देशों में सुरक्षा अलर्ट बढ़ा दिया गया है। इसी बीच बहरीन में संभावित हवाई हमले के खतरे के चलते सायरन बजाए गए।
140 अमेरिकी सैनिक घायल
पेंटागन ने मंगलवार को बताया कि ईरानी हमलों में अब तक करीब 140 अमेरिकी सैनिक घायल हो चुके हैं। पेंटागन के प्रवक्ता शॉन पार्नेल के अनुसार अधिकांश सैनिकों की हालत गंभीर नहीं है और कई उपचार के बाद फिर से ड्यूटी पर लौट चुके हैं।
ईरान ने अमेरिका पर लगाए आरोप
ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता एसमाईल बघाई ने अमेरिका की कार्रवाई की कड़ी आलोचना करते हुए कहा कि हालिया सैन्य हमलों के पीछे असली मकसद ईरान के तेल संसाधनों पर नियंत्रण स्थापित करना है। उन्होंने व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव कैरोलाइन लिविट के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि अमेरिका और इज़राइल की आक्रामकता के पीछे आर्थिक हित साफ दिखाई देते हैं।
होर्मुज जलडमरूमध्य बना चिंता का केंद्र
संघर्ष के कारण होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास जहाजों की आवाजाही प्रभावित होने लगी है। यह दुनिया के सबसे अहम ऊर्जा समुद्री मार्गों में से एक है, जहां से बड़ी मात्रा में तेल और गैस वैश्विक बाजारों तक पहुंचती है।
कतर के विदेश राज्य मंत्री मोहम्मद बिन अब्दुलअजीज अल-खुलैफी ने इस मार्ग की सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंता जताई है और कहा कि यदि हालात नहीं सुधरे तो वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर बड़ा असर पड़ सकता है।
भारतीय जहाजों को लेकर सरकार सतर्क
इस बीच भारत सरकार भी तेजी से बदलते हालात पर नजर रखे हुए है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, क्षेत्र में फंसे भारतीय तेल टैंकरों की सुरक्षा के लिए जरूरत पड़ने पर भारतीय नौसेना के युद्धपोत भेजने के विकल्प पर विचार किया जा रहा है। हालांकि इस पर अभी कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है।
समुद्र में ईरानी नौकाएं नष्ट करने का दावा
अमेरिका ने दावा किया है कि उसकी सैन्य कार्रवाई में ईरान की 16 ऐसी नौकाओं को नष्ट किया गया है जिनका इस्तेमाल समुद्र में बारूदी सुरंगें बिछाने के लिए किया जा सकता था। यह कार्रवाई भी होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास की गई।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह संघर्ष लंबा चलता है तो न केवल पश्चिम एशिया बल्कि पूरी दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति, व्यापार और वैश्विक राजनीति पर गहरा असर पड़ सकता है।
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