जामिया छात्र आंदोलन में बाहरी लोगों की मौजूदगी पर विवाद, पुराने प्रदर्शनों से जुड़े लोगों को लेकर उठे सवाल
नई दिल्ली। दिल्ली स्थित जामिया मिल्लिया इस्लामिया विश्वविद्यालय में छात्रसंघ की बहाली की मांग को लेकर चल रहे आंदोलन के बीच बाहरी लोगों की मौजूदगी और परिसर में लिखे गए विवादित नारों को लेकर विवाद गहरा गया है। विश्वविद्यालय प्रशासन और कुछ संगठनों ने आंदोलन के दौरान हुई घटनाओं पर सवाल उठाए हैं। हालांकि, जंतर-मंतर के पहले के प्रदर्शनों में शामिल लोगों ने ही जामिया आंदोलन का माहौल बिगाड़ने की साजिश रची, इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
जामिया में 12 अक्टूबर से शुरू हुए आंदोलन में छात्र वर्ष 2006 से लंबित छात्रसंघ चुनाव बहाल करने और प्रदर्शनकारियों के खिलाफ की गई अनुशासनात्मक कार्रवाई वापस लेने की मांग कर रहे थे। आंदोलन के दौरान परिसर की दीवारों पर विवादित नारे लिखे जाने और सुरक्षा व्यवस्था को लेकर भी सवाल उठे। विश्वविद्यालय प्रशासन ने इन नारों की जांच कर जिम्मेदार लोगों की पहचान करने की बात कही थी।
इस बीच, आंदोलन में बाहरी लोगों के कथित हस्तक्षेप को लेकर भी आरोप सामने आए। विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार ने कांग्रेस सांसद इमरान प्रतापगढ़ी और इमरान मसूद के परिसर में प्रवेश तथा प्रदर्शन के दौरान हुई घटनाओं को लेकर पुलिस में शिकायत दर्ज कराई। शिकायत में कथित तौर पर परिसर में अनधिकृत प्रवेश, संपत्ति को नुकसान पहुंचाने और कर्मचारियों के साथ दुर्व्यवहार जैसे आरोप शामिल हैं। ये आरोप हैं, जिनकी पुष्टि जांच के बाद ही हो सकेगी।
छात्रों की मांगों और आंदोलन के तरीके को लेकर विश्वविद्यालय प्रशासन तथा प्रदर्शनकारियों के बीच तनाव बना रहा। प्रशासन ने कक्षाएं ऑनलाइन करने सहित सुरक्षा संबंधी कदम उठाए। बाद में विश्वविद्यालय प्रशासन और आंदोलनकारी छात्रों के बीच सहमति बनने के बाद प्रदर्शन समाप्त करने का निर्णय लिया गया। समझौते के तहत छात्रसंघ के संविधान को मंजूरी मिलने के 15 दिनों के भीतर चुनाव कराने और प्रदर्शन के दौरान जारी निलंबन व कारण बताओ नोटिस की समीक्षा करने पर सहमति बनी।
जंतर-मंतर के पुराने प्रदर्शनों और मौजूदा जामिया आंदोलन के बीच कथित संबंधों को लेकर किए जा रहे दावों पर फिलहाल कोई स्वतंत्र रूप से पुष्ट निष्कर्ष सामने नहीं आया है। ऐसे में किसी भी कथित साजिश या व्यक्ति की भूमिका को स्थापित तथ्य मानने के बजाय जांच और उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर ही निष्कर्ष निकालना उचित होगा।
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