“जंगल छूटा, जमीन गई… सहरिया सिर्फ वोट बनकर रह गया!”
कल 9 अगस्त रविवार को विश्व आदिवासी दिवस मनाया जाएगा। मंचों पर आदिवासी संस्कृति के गीत बजेंगे, नेताओं के गले में मालाएँ पड़ेंगी और विज्ञापनों में विकास मुस्कराएगा। मगर शिवपुरी की सहरिया बस्तियों में यही दिन प्रश्न लेकर आता है जिस समुदाय के नाम पर दशकों से योजनाएँ और बजट चल रहे हैं, उसके घर भरपेट भोजन, साफ पानी, बिजली, इलाज और न्याय क्यों नहीं पहुँचा?
कभी सहरिया का जीवन जंगल, जल और जमीन से जुड़ा था। वह महुआ, शहद, तेंदूपत्ता, जड़ी-बूटियों और खेती के सहारे दुनिया चलाता था। कथित आधुनिक विकास ने जंगल से उसका रिश्ता तोड़ा, लेकिन सुरक्षित आजीविका नहीं दी। सड़क और मोबाइल तो आया, पर खेत पर अधिकार, बच्चे के लिए पोषण और बीमार के लिए अस्पताल भी दूर हैं। आदिम कहे जाने वाले दौर से डिजिटल युग तक साधन बदले, शोषण की शक्ल भर बदली है।
शिवपुरी की सहरिया बस्तियों में कुपोषण बीमारी नहीं, व्यवस्था का बयान है। बच्चों की पसलियाँ, खून की कमी से जूझती माताएँ और टीबी सहित अनेक रोगों से टूटते शरीर सरकारी पोषण योजनाओं की हकीकत बताते हैं। आँगनवाड़ी के रजिस्टर भरे जा सकते हैं, लेकिन खाली पेट आँकड़ों से नहीं भरता। किसी बच्चे की मौत पर अधिकारी बीमारी का नाम बताते हैं; कोई नहीं बताता कि बीमारी से पहले उसके घर कितने दिन चूल्हा नहीं जला था।
ग्वालियर-चंबल संभाग में आदिवासी उत्थान के नाम पर गैर-सरकारी संगठन आए। देसी-विदेशी फंड से सर्वे हुए, कार्यशालाएँ लगीं, तस्वीरें खिंचीं और रिपोर्टें बनीं। कुछ संस्थाओं ने ईमानदार काम किया होगा, लेकिन प्रश्न है—सहरिया के नाम पर आया धन उस तक कितना पहुँचा? यदि काम हुआ है तो उसका सामाजिक अंकेक्षण ग्रामसभा के सामने क्यों नहीं? बस्तीवार खर्च और परिणाम सार्वजनिक क्यों नहीं हैं?
राजनीति ने सहरिया को अधिकारों वाला नागरिक कम, उपयोग की वस्तु अधिक समझा। चुनावी रैलियों में वह भीड़ का साधन है, मतदान के दिन ईवीएम का बटन दबाने वाला वोट और फिर पाँच वर्ष तक भुला दिया गया चेहरा। पात्रता के बावजूद राशन न मिलने, बिजली-पानी के लिए भटकने और मजदूरी में शोषण की शिकायतें आम हैं। दबंगों ने परिवारों की जमीनों पर कब्जे जमा रखे हैं। असली मालिक खसरा-खतौनी लेकर पटवारी, तहसील और कलेक्टर कार्यालय के चक्कर काटता है, जबकि कब्जेदार बेखौफ रहता है।
सबसे खतरनाक हमला शराब के रास्ते हो रहा है। बस्तियों के आसपास अवैध शराब बिकने और प्रशासन द्वारा आँखें फेर लेने के आरोप गंभीर हैं। मजदूरी शराब में बहती है, शरीर टूटता है, परिवार उजड़ते हैं और असमय मौतें होती हैं। समुदाय को जानबूझकर समाप्त करने का आरोप जाँच का विषय हो सकता है, लेकिन अवैध कारोबार पर सरकारी चुप्पी इस आशंका को मजबूत करती है। यह केवल नशा नहीं, गरीबी को स्थायी बनाने वाला शोषण दिखाई देता है।
ठेकेदार को सस्ता मजदूर, साहूकार को कर्जदार, दलाल को योजना का हिस्सा और नेता को वोट चाहिए। जिसे अवसर मिलता है, वह सहरिया की गरीबी और अशिक्षा को लूट का रास्ता बना लेता है। व्यवस्था उसे अधिकार देने के बजाय निर्भर बनाए रखना चाहती है।
इस अँधेरे में सहरिया क्रांति आंदोलन उम्मीद की किरण है। आंदोलन के कार्यकर्ता बस्तियों में जनजागृति, नशामुक्ति, भूमि अधिकार और सरकारी योजनाओं की जानकारी पहुँचाने में जुटे हैं। यह प्रयास बताता है कि सहरिया अब मौन रहने को तैयार नहीं।
इस विश्व आदिवासी दिवस पर भाषण नहीं, हिसाब चाहिए—पोषण का स्वतंत्र ऑडिट, राशन की सार्वजनिक निगरानी, अवैध शराब पर कार्रवाई, जमीनों से कब्जे हटाने की समयसीमा और एनजीओ तथा सरकारी फंड का खुला लेखा। सहरिया को उत्सव का मुखौटा नहीं; रोटी, जमीन, पानी, शिक्षा, इलाज और सम्मान चाहिए। इनके बिना विश्व आदिवासी दिवस व्यवस्था के पाखंड का वार्षिक समारोह है।
Best Headline I
What's Your Reaction?
Like
0
Dislike
0
Love
0
Funny
0
Wow
0
Sad
0
Angry
0
Comments (0)