लोकतंत्र बचाने के लिए व्यवस्था में बदलाव जरूरी, संविधान को ग्राफिकल रूप देने का प्रस्ताव
शैलेन्द्र कुमार बिराणी
दुनिया के लोकतंत्रों के सामने बढ़ती चुनौतियों के बीच यह विचार सामने आया है कि केवल सरकारें बदलने से लोकतांत्रिक व्यवस्था की मूल समस्याओं का समाधान नहीं होगा। इसके लिए ऐसी व्यवस्था विकसित करने की जरूरत है, जिसकी कार्यप्रणाली पारदर्शी हो, कानूनों की कमियों को समय रहते पहचाना जा सके और नागरिकों की भागीदारी मजबूत हो।
इस विचार के अनुसार, अल्बानिया सहित कई देशों में राजनीतिक असंतोष और विरोध प्रदर्शनों ने शासन व्यवस्था की चुनौतियों को उजागर किया है। नेपाल, बांग्लादेश और श्रीलंका जैसे देशों में हुए जनआंदोलनों ने भी सरकारों और शासन व्यवस्था के प्रति जनता के असंतोष को सामने रखा है। हालांकि, अलग-अलग देशों में विरोध प्रदर्शनों के कारण अलग-अलग रहे हैं, इसलिए सभी घटनाओं को एक ही वजह से जोड़कर देखना उचित नहीं होगा।
इस दृष्टिकोण में कहा गया है कि किसी राजनीतिक दल की जगह दूसरे दल के सत्ता में आने से व्यवस्था की बुनियादी खामियां अपने आप समाप्त नहीं होतीं। यदि कानून बनाने, उन्हें लागू करने और संस्थाओं की जवाबदेही तय करने की प्रक्रिया में कमियां बनी रहती हैं, तो सरकार बदलने के बाद भी वही समस्याएं सामने आ सकती हैं। इसलिए लोकतंत्र को केवल चुनाव और सत्ता परिवर्तन तक सीमित न मानकर संस्थागत जवाबदेही और नागरिक अधिकारों से जोड़कर देखने की जरूरत है।

भारत में मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों को कानूनी संरक्षण देने वाला प्रावधान भी इसी बहस का हिस्सा है। मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति, सेवा शर्तों और कार्यकाल से संबंधित 2023 के कानून की धारा 16 उनके आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन से जुड़े कुछ मामलों में संरक्षण प्रदान करती है। इस प्रावधान की संवैधानिक वैधता को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है। इसकी वैधता पर अंतिम न्यायिक निर्णय के बिना इसे असंवैधानिक घोषित मानना उचित नहीं होगा।
प्रस्ताव के लेखक का दावा है कि उन्होंने वर्ष 2011 में ही लोकतांत्रिक व्यवस्था में बदलाव से जुड़ा एक वैज्ञानिक और तकनीकी दृष्टिकोण राष्ट्रपति को दस्तावेजों के साथ भेजा था। उनके अनुसार, इसका उद्देश्य लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को अधिक पारदर्शी बनाना और कानूनों में मौजूद संभावित कमियों को सामने लाना है। लेखक ने यह भी दावा किया है कि संविधान को ग्राफिकल रूप में प्रस्तुत करने का प्रारूप राष्ट्रपति सचिवालय तक पहुंचाया जा चुका है। इन दावों और प्रस्ताव की उपयोगिता का स्वतंत्र मूल्यांकन करने के लिए संबंधित दस्तावेजों और तकनीकी विवरणों की समीक्षा आवश्यक है।
प्रस्ताव में संविधान की मूल भावना और उसके प्रावधानों को बदले बिना उन्हें ग्राफिकल रूप में प्रस्तुत करने की बात कही गई है। इसके समर्थक विचार के अनुसार, ऐसा स्वरूप नागरिकों को संवैधानिक प्रक्रियाओं, संस्थाओं की जिम्मेदारियों और कानूनों के आपसी संबंधों को आसानी से समझने में मदद कर सकता है। तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता का उपयोग भी इस दिशा में सहायक हो सकता है, लेकिन इसके लिए सूचना की शुद्धता, पारदर्शिता, गोपनीयता और विशेषज्ञों की निगरानी सुनिश्चित करना जरूरी होगा। केवल ग्राफिकल प्रस्तुति से लोकतंत्र की सभी समस्याएं हल हो जाएंगी, ऐसा निष्कर्ष निकालने के लिए ठोस प्रमाण और व्यावहारिक परीक्षण आवश्यक हैं।
लेखक ने राष्ट्रपति और सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ से इस प्रस्ताव पर विचार करने की मांग की है। साथ ही स्वतंत्र संगठनों और नागरिक समूहों से आगे आकर संवैधानिक जागरूकता बढ़ाने तथा जनता की भागीदारी सुनिश्चित करने की अपील की गई है। लेखक का कहना है कि वह भूख हड़ताल या अनशन के बजाय संवाद और सामूहिक प्रयासों के माध्यम से बदलाव की दिशा में आगे बढ़ना चाहते हैं।
लोकतंत्र को मजबूत बनाने के लिए संस्थाओं की जवाबदेही, स्वतंत्र न्यायपालिका, निष्पक्ष चुनाव, पारदर्शी कानून निर्माण और नागरिकों की सार्थक भागीदारी महत्वपूर्ण हैं। संविधान को सरल और ग्राफिकल रूप में प्रस्तुत करने का विचार नागरिकों में संवैधानिक समझ बढ़ाने का एक माध्यम बन सकता है। हालांकि, इसकी वास्तविक उपयोगिता का आकलन प्रस्ताव के विस्तृत विवरण, स्वतंत्र समीक्षा, संवैधानिक परीक्षण और व्यावहारिक परिणामों के आधार पर ही किया जा सकता है।
What's Your Reaction?
Like
0
Dislike
0
Love
0
Funny
0
Wow
0
Sad
0
Angry
0
Comments (0)