नोबेल विजेता रोनाल्ड रॉस के शोध में अहम भूमिका, फिर भी गुमनाम रहे किशोरी मोहन बंद्योपाध्याय; गांव-गांव जाकर लोगों को मलेरिया से बचाव सिखाया
कोलकाता। विज्ञान के इतिहास में कई ऐसे लोगों का योगदान रहा है, जिनकी मेहनत ने बड़ी खोजों को सफल बनाने में मदद की, लेकिन उन्हें वैसी पहचान नहीं मिली। किशोरी मोहन बंद्योपाध्याय भी ऐसे ही एक भारतीय सहायक थे, जिन्होंने ब्रिटिश चिकित्सक रोनाल्ड रॉस के मलेरिया संबंधी शोध में सहयोग किया। बाद में रॉस को 1902 में चिकित्सा का नोबेल पुरस्कार मिला, जबकि किशोरी मोहन का नाम लंबे समय तक व्यापक पहचान से दूर रहा। शोध में उनकी भूमिका और उनके योगदान को पर्याप्त श्रेय न मिलने का सवाल आज भी इतिहास के इस प्रसंग से जुड़ा हुआ है।
किशोरी मोहन ने उन्नीसवीं सदी के अंतिम वर्षों में कोलकाता के प्रेसीडेंसी जनरल अस्पताल में रॉस के साथ काम किया। उस समय वैज्ञानिक यह समझने की कोशिश कर रहे थे कि मलेरिया किस तरह फैलता है और मच्छरों की इसमें क्या भूमिका है। रॉस मच्छरों के शरीर में मलेरिया परजीवी के विकास का अध्ययन कर रहे थे। इस काम में संक्रमित मरीजों और मच्छरों के नमूने जुटाना, प्रयोगों के लिए आवश्यक व्यवस्थाएं करना और सूक्ष्मदर्शी के नीचे नमूनों की जांच में सहयोग देना महत्वपूर्ण था।
किशोरी मोहन की स्थानीय भाषा और ग्रामीण इलाकों से परिचित होने की क्षमता इस शोध में उपयोगी साबित हुई। वह आसपास के गांवों में जाकर बुखार से पीड़ित लोगों की तलाश करते और उन्हें जांच के लिए तैयार करने में मदद करते थे। उस दौर में मलेरिया के मरीजों तक पहुंचना और नियमित रूप से शोध के लिए नमूने जुटाना आसान नहीं था। ऐसे में स्थानीय लोगों के साथ उनका संपर्क शोध कार्य को आगे बढ़ाने में सहायक बना।
1898 में रॉस ने पक्षियों में होने वाले मलेरिया पर प्रयोग किए। इन प्रयोगों में संक्रमित पक्षियों का खून पीने वाले मच्छरों के शरीर में परजीवी के विकास का अध्ययन किया गया। बाद में ऐसे मच्छरों के काटने से स्वस्थ पक्षियों के संक्रमित होने के प्रमाण मिले। इन प्रयोगों ने यह समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई कि मलेरिया परजीवी मच्छर के शरीर में विकसित होकर दूसरे जीव तक कैसे पहुंच सकता है। हालांकि, मलेरिया के प्रसार को समझने में रॉस के अलावा अन्य वैज्ञानिकों का योगदान भी रहा।
रॉस को 1902 में मलेरिया पर उनके शोध के लिए नोबेल पुरस्कार दिया गया। नोबेल पुरस्कार की आधिकारिक जानकारी में सम्मान रॉस को अकेले दिए जाने की पुष्टि होती है। किशोरी मोहन को इस पुरस्कार में हिस्सा नहीं मिला। ऐतिहासिक विवरणों में यह भी उल्लेख मिलता है कि रॉस की 1923 में प्रकाशित आत्मकथा में उनके भारतीय सहायक का नाम दर्ज नहीं था। इस वजह से किशोरी मोहन के योगदान और औपनिवेशिक दौर में भारतीय सहायकों को मिलने वाली पहचान पर सवाल उठे।
हालांकि, किशोरी मोहन की कहानी केवल प्रयोगशाला तक सीमित नहीं रही। उन्होंने मलेरिया के बारे में ग्रामीणों को जागरूक करने के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया। 1918 में पनिहाटी में मलेरिया-रोधी सहकारी समिति के गठन के बाद वह इसके सचिव बने। उन्होंने अपने मित्र लक्ष्मीनारायण रायचौधरी की मदद से मलेरिया और मच्छरों से जुड़ी तस्वीरों वाली स्लाइडें तैयार कराईं। इसके बाद मैजिक लैंटर्न नामक पुराने प्रोजेक्टर की मदद से गांवों में लोगों को बीमारी के फैलने और उससे बचाव के तरीकों के बारे में समझाने लगे।
उनका उद्देश्य वैज्ञानिक जानकारी को उन लोगों तक पहुंचाना था, जिनके पास चिकित्सा सुविधाओं और स्वास्थ्य संबंधी जानकारी की पहुंच सीमित थी। गांवों में सफाई, नालियों और तालाबों की देखभाल तथा मच्छरों के प्रजनन स्थलों को कम करने जैसे उपायों के जरिए मलेरिया पर नियंत्रण की कोशिशें भी की गईं। पनिहाटी में शुरू हुआ यह जनस्वास्थ्य अभियान आसपास के इलाकों में भी प्रेरणा का आधार बना।
ग्रामीणों की आर्थिक परेशानियों को देखते हुए किशोरी मोहन ने सहकारी बैंक की स्थापना में भी भूमिका निभाई। उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, 1927 में पनिहाटी को-ऑपरेटिव बैंक की स्थापना के लिए उन्होंने अपनी बचत लगाई और पत्नी के सोने के गहने तक बेच दिए। इसका उद्देश्य जरूरतमंद ग्रामीणों को साहूकारों पर निर्भर रहने के बजाय कर्ज का एक वैकल्पिक रास्ता उपलब्ध कराना था।
किशोरी मोहन बंद्योपाध्याय का निधन 1929 में हुआ। उनके जीवन की कहानी विज्ञान में सहयोग करने वाले उन लोगों की याद दिलाती है, जिनका योगदान अक्सर प्रमुख वैज्ञानिकों के नाम के पीछे छिप जाता है। रोनाल्ड रॉस को मलेरिया पर उनके शोध के लिए नोबेल सम्मान मिला, लेकिन किशोरी मोहन ने वैज्ञानिक जानकारी को आम लोगों तक पहुंचाने और ग्रामीण स्वास्थ्य सुधारने के लिए भी महत्वपूर्ण काम किया। उनका योगदान केवल एक प्रयोगशाला तक सीमित नहीं था, बल्कि जनस्वास्थ्य और सामाजिक सेवा के क्षेत्र में भी दिखाई देता है।
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